हिन्दू धर्म के प्राचीन ग्रंथो मे ये लिखा है की मनुष्य अपने जीवन को सफल बनाना चाहता है तो उसे चार जिजो को पाने का लक्ष्य रखना चाहिए । वो चार प्रकार के लक्ष्य हैं -धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष । इन चारों में से धर्म का पहला स्थान है । धर्म का अर्थ है की मनुष्य को अपनी जिंदगी में क्या चीज़ करनी चाहिए और क्या चीज़ नहीं करनी चाहिए । इन सबका ज्ञान एक ही सास्त्र मे लिखा है । उस शास्त्र का नाम नीति शास्त्र है । जैसे ही इस शास्त्र का नाम कहा गया है । नीति का अर्थ होता है । कर्तव्य या नियम, इससे साधारण मनुष्य को भी ये ज्ञान हो जाता है की उसे अपने जीवन काल मे क्या करनी चाहिए और क्या नही करनी चाहिए । नीति शास्त्र के अनुसार अगर काम किया जाये तो उसे किसी प्रकार का पाप का दोष नहीं लगता। नीति शास्त्र मे भी केइ प्रकार के है । महाभारत और रामायण मे भी नीति शास्त्र का उलेख्य किया गया है । चाणक्य का नीति शास्त्र, बिदूर का नीति शास्त्र और शुक्र नीति शास्त्र के वर्णन मिलते है। नीति शास्त्रो में किंन परिस्थितियों में युद्ध करनी चाहिए या नहीं करनी चाहिए । उन सबका वर्णन मिलता है। महाभारत में जब अर्जुन अपने संबंधियों को अपने प्रतिद्वंदी के रूप में अपने सामने देखकर व्याकुल हो जाता है । उस समय भगवान कृष्ण उसे नीति ज्ञान के बारे में बताया था। श्री मद् भगवत गीता एक पूर्ण नीति शास्त्र ही है। इसमें मनुष्य को अपने जीवन में क्या करनी चाहिए ओर क्या नहीं करनी चाहिए उन सबका ज्ञान भरा हुआ है। अर्जुन कृष्ण से पूछता है । है प्रभु में अपने ही सगे और सम्भधियों का बध कैसे करूँ। ये तो नीति के विरुद्ध है। तब कृष्ण कहते है अर्जुन तु ज्ञानीयो के भाति वचनो को केहत है पर तु वास्तविकता से अनजान हैं। नीति सास्त्र केहता है। जो भी मनुष्य धर्म के विरुद्ध हो और अधर्म पर आरूढ़ हो वो कितना भी पुण्य आत्मा हो या सगा हो उसका साथ नही देना चाहिए। अगर युद्ध करना पड़े भी तो उनके साथ युद्ध करनी चाहिए। दुशरी तरफ वो सब तेरे सत्रु हैं। अगर तु उन्हें नहीं मारेगा तो वे तुझे मार देंगे। अतः तु नीति युक्त होकर धर्म आरूढ़ हो। तुझे किसी प्रकार का पाप नही लगेगा।
नीति शास्त्र में युद्ध नीति के बारे मे भी बताया गया है। युद्ध नीति मे ये बताया गया है की कब युद्ध करनी चाहिये और कब युद्ध नहीं करनी चाहिए। किस से युद्ध करना है और किस से युद्ध नहीं करना चाहिए। सबसे महत्व पूर्ण बात ये है की ये नीति शास्त्र किसीको नपुंसक और कायर नहीं बनाता है । जिस तरह से आज के बुद्धि जिविओं ने अहिंषा का परिभाषा बताते हैं । उसे जानकर कर कोई भी नपुंशक और कायरत्व को प्राप्त निश्चित होगा। वो अपनी और अपनी परिवार की रक्षा तक करनेमे भी असमर्थ होगा। नीति शास्त्र का अगर सही तरह से अनुशरण किया जाये तो जीवन में प्रत्येक क्षेत्र में सफलता आवश्य ही प्राप्त होगी। बिना अस्त्र और शास्त्र के अपने सत्रु का विनाश करने में सक्षम हो जाएंगे। नीति शास्त्र को जानने बाला कभी दुखी नहीं होता।
ऐसा नहीं है की झूट बोलना नहीं चाहिए पर कांह झूट बोलना चाहिए और कांहा झूट नहीं बोलना हैं। इसकी जानकारी नीति शास्त्र को जानने वाला बखूबी जानता है। महाभारत में एक प्रसंग आता है की सत्यबादि युधिस्ठिर को झूट बोल ने को कहा जाता है और युधिस्ठिर किसी भी तरहा का झूठ बोलने से मना कर देते हैं। फिर भगवान कृष्ण उन्हें समझाते है की अगर हम धर्म के रहा पर हैं तो नीति शास्त्र के अनुशार झूठ बोलने में कोई पाप नहीं हैं।
मंगलवार, 6 दिसंबर 2016
नीति शास्त्र का परीचय
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