मैं ऐसे ही कुछ लोगों के समूहों में था और आध्यात्मिक चर्चा चल रहा था। जिसमें सभी लोग अपनी अपनी आध्यामिक मार्ग के बारे में बता रहे थे। सहसा एक युवा व्यक्ति उठा उस लोगों की समूह से और बोलने लगा कि भक्ति मार्ग ही श्रेष्ठ मार्ग है और कृष्ण नाम ही सर्वोच्च नाम है। उस व्यक्ति ने थोड़ी सी भी हिच किचाहट नहीं दिखाई की इस समूह में इतने वयस्क और ज्ञानी गुणी लोग बैठे हुए हैं और थोड़ा में उनकी भी तर्क सुन लूँ। सहसा मेरे मन में प्रश्न उठने लगा कि इस व्यक्ति से दो चार आध्यात्मिक प्रश्न लूं। फिर भी मैने स्वयं को नियंत्रित रखा। परंतु मेरे मन में कुछ समय के पश्चात तेज आंधी सी उठने लगी । जैसे कि स्वयं भगवान कृष्ण मेरे अन्तर मन में मुझमें उत्साह भर रहे हों कि इसके अहंकार को तोड़ दो। अनजाने में ही मेरे मुंह से प्रश्न निकल गया कि अगर भक्ति ही सर्वोच्च मार्ग है । तो भगवान कृष्ण ने श्रीमद भागवत गीता में केवल भक्ति का ही उपदेश क्यों नहीं दिया। अन्य मार्ग का उपदेश व्यर्थ में ही क्यों बता रहे थे अर्जुन को। इस प्रकार अन्य मार्ग का उपदेश करने से अनुयायियों में भ्रम उत्पन होता है। फिर कुछ समय के बात पता चल की अभी अभी उस युवा पीढ़ी का लड़के ने एक प्रसिद्ध वैष्णव सम्प्रदाय से दिक्षा ग्रहण किया है । मैने फिर से पूछ लिया कि आप तो भक्ति कर रहे हैं क्या आपने भगवान कृष्ण के दर्शन हुए है। कृपया आप हमे बताएं। वो युवा व्यक्ति ने पहला प्रश्न का कुछ भदा सा उत्तर दिया । जो मुझे क्या उस सभा समूह में उपस्थित किसी भी व्यक्ति को नहीं समझ आया। दूसरे प्रश्न का उत्तर उस युवा व्यक्ति ने मुझे ना में उत्तर दिया और कहा नहीं अभी तक उसे भगवान कृष्ण का दर्शन नहीं हुए हैं। फिर मैंने उसे कहा जब तुम्हे ईश्वर के दर्शन ही नहीं हुए है तो इस प्रकार का प्रवचन देना, इस प्रकार का पाखंड रचना आपको शोभा नहीं देता है। क्योंकि अमृत का स्वाद वोही बता सकता है । जिसने अमृत का सेवन किया हुआ हो। भक्ति भी कुछ ऐसे ही अमृत का नाम है। भक्ति तो आध्यात्मिकता रूपी सीढ़ी की पहली कदम है। भक्ति मार्ग में पहले बाहरी रूप से हरि नाम कीर्तन, हरि भजन और हरि नाम चलता है। ये बाहरी भक्ति है। फिर धीरे धीरे मन एकाग्र होता है भगवान के स्वरूप में। फिर मन का चीत शांत होता है भगवान के रूप, गुण, माधुर्य और प्रेम में। जब भगवान से मन जुड़ता है तब भाव का जन्म होता है। जैसे जैसे भाव प्रगाढ़ होता है । वैसे वैसे रस प्रकट होता है। जैसे जैसे रस प्रकट होगा वैसे वैसे भगवान की कृपा से दिव्य ज्ञान प्रकट होता है। भक्त को यत्र तत्र सर्वत्र भगवान का दर्शन होता है। भक्ति रस चखने पर भी भक्त की सांसारिक दुःख, पीड़ा, दर्द, जलन, चिंता, भय, चंचलता, लोभ, मोह, शुद्ध अशुद्ध के भाव, पवित्र अपवित्रता, ऊंच नीच, कर्म बंधन, ईर्षा, सांसारिक बंधन आदि के भाव समाप्त नहीं होते हैं। ये सब नष्ट दिव्य ज्ञान के प्रकट होने के पश्चात ही होते हैं। अगर किस भक्त ने सिर्फ ईश्वरीय भाव रस का सेवन किया है तो भी उस भक्त का उद्धार नहीं हो सकता । क्योंकि भक्त जब तक सांसारिक बंधन लोभ, मोह, ईर्षा, जलन, भय, शुद्ध अशुद्ध, पवित्र अपवित्रता आदि से मुक्त नहीं होगा । तब तक उस भक्त की मुक्ति असम्भव ही हो जाता है। उस घृत दीपक का कोई अर्थ नहीं है जो प्रकाशवान ना हो । अगर भक्ति से दिव्य ज्ञान प्राप्त नहीं होगा तो पूरा भक्ति ही व्यर्थ चली जाएगी। इसमें कोई संदेह नहीं है कि भक्ति भी एक उत्तम मार्ग है । ईश्वर प्राप्ति में लेकिन भक्ति ही सर्वोतम मार्ग है। ये तर्क संगत नहीं है। सभी जीव और सभी मनुष्य भक्ति नहीं कर सकते क्योंकि सभी का गुण स्वभाव भी अलग अलग ही होता है।
कोई भक्त अपने पांच उंगलियों में कौन सी उंगली महत्व पूर्ण है या मनुष्य शरीर का कौन सा अंग महत्वपूर्ण है। ये नहीं बता सकता । उसी तरह संसार में कोई भी जीव ये नहीं बता सकता कि ईश्वर प्राप्ति में कौनसा मार्ग सर्वोत्तम है।
जय जगन्नाथ🙏🙏🙏🙏