शनिवार, 21 दिसंबर 2024

मनुष्य का कर्म ही मनुष्य का भविष्य का शुख शांती निर्धारित करता है।

प्रत्येक मनुष्य का अपना पूर्व और वर्तमान कर्म ही भविष्य का शूख दुःख का निर्णय करता है। मेरे बात को सच्च मानो तो मनुष्य का पाप कर्म उस मनुष्य से बहुत क्रूर प्रतिशोध लेता है। एक दिन में यूट्यूब पर विडियोज़ स्क्रॉल कर रहा था। तो मेरी नजर में एक वीडियो दिखा । जिसमें दो जोड़े (पति और पत्नी) अपने नवजात शिशु को उठाकर अपने मां बाप के पास दे आते है और ऐसा बोलते है कि ये बच्चा ये आपके वजह से हुआ है तो आप ही लोग संभालों। जब मैंने पूरा वीडियो को समझने का प्रयत्न किया तो मुझे ये समझ आया कि ये वीडियो इस विषय पर है कि। आज की युवा पीढ़ी बच्चे पैदा नहीं करना चाहते हैं और उनकी जिम्मेदारियां भी नहीं उठाना चाहते हैं। उस जोड़े के जो माँ बाप थे उन्होंने उनसे वंश बढ़ाने की बात की होगी और उन पर दबाव बनाया होगा। मां बाप को उनके बच्चे से ज्यादा पोता और पोती से प्यार होता है। वो कहते हैं ना मूल धन से ज्यादा शुद का धन प्यार होता है। लेकिन आज की युवा पीढ़ी को शादी तो करनी है पर बच्चे पैदा नहीं करनी है। आज की युवा पीढ़ी ये विचार रखती है कि बच्चे की जिम्मेदारी बहुत है। पढ़ना लिखना बहुत खर्चा वाला काम है। आज के समय में पति पत्नी दोनों ही नौकरी करती हैं और दोनों ही परिवार चलाती हैं। किस बात का खर्चा बढ़ जाएगा ? अगर में 20 से 30 साल पीछे जाकर लोगों को देखता हूं तो उस समय लोग बहुत कमी में रहते थे । परिवार में एक आदमी रोजगार करता था पूरा परिवार खाता था और बच्चे पढ़ाई करते थे। आज परिवार में रोजगार और नौकरी करने वालों की संख्या बढ़ गई है और पहले से ज्यादा सुविधा और सहूलियत उपलब्ध हैं। आज की युवा पीढ़ि सिर्फ शादी करना चाहती है ताकि सिर्फ अपनी शारीरिक आवश्यकता को पूरी कर सके । लेकिन संसार की नियम है कि शादी एक नए जीवन को उत्पन करने के लिए किया जाता है । स्त्री और पुरुष इसलिए शादी करते हैं कि पृथ्वी पर जीवन चक्र चलता रहे। शारीरिक आवश्यकता तो वैश्या के पास जाकर भी पूरी की जा सकती है। लेकिन आज की युवा पीढ़ी ये तर्क भी देता है कि क्या शादी सिर्फ बच्चे पैदा करने के लिया किया जाता है। तो मेरा मानना है, हां विवाह करना ही संसार में जीवन चक्र चलाने का पहला लक्ष है। सनातन हिंदु शास्त्र कहते हैं। अगर कोई मनुष्य निःसंतान होकर मरता है तो उसकी जीव आत्म की कभी भी सद्गति नहीं हो पाएगी । क्योंकि परिवार में एक सन्तान होने से मनुष्य को बहुत सारे ऋण से मुक्ति मिल जाती है। जैसे कि देव ऋण, पितृ ऋण, पृथ्वी ऋण आदि और अगर वो सन्तान धार्मिक प्रवृति का होता है और धर्म कर्म करता है तो उनकी सात पीढ़ियों की सद्गति और उधार हो जाता है। देवता जन्म हुए बच्चे से हवन और तर्पण की इच्छा रखते हैं, पितृ लोक में पितृ अपने गोत्र और कुल में जन्मे संतान से पिंड और तर्पण की इच्छा रखते है। जिससे उनकी जीव आत्म उर्ध्व लोक और उर्ध्व योनि में जन्म लाभ करते हैं। जन्म हुए संतान से धरती माता ये अपेक्षा करती है कि वह संतान इस पृथ्वी लोक में धर्म की स्थापन करते रहे और जीवन चक्र सुगमता से चलती रहे। मनुष्य को ये जरूर सोचना चाहिए कि उसके मृत्यु से पहले ये सभी प्रकार के ऋण से मुक्त हो जाए । अन्यथा देव, पितृ , पृथ्वी उस मनुष्य को श्राप देते है। पृथ्वी लोक में शांति नहीं मिलती है। वृद्ध अवस्था में भी पश्चाताप होगी । अभी युवा है, भोग भोगने की शक्ति है, बुद्धिमानी से अपने विरोधी से तर्क वितर्क भी कर लेते है, आप अपने मर्जी के मालिक हो, ज्ञानी गुणियों की बात चुभेगी। मगर जब ये शरीर वृद्ध होगा, शक्तिहीन हो जाएगा, पत्नी या पतीका मृत्यु हो जाएगा, जब अकेलापन कटेगा । तभी बिस्तर पर पड़े पड़े ये सोचना की एक बच्चा पैदा कर लेता तो शायद वृद्ध अवस्था में भी उसे देखते देखते खुश होता और वृद्ध अवस्था भी सुगमता से गुजर जाता। अगर वो सुपुत्र या सुपुत्री होती तो मेरा जन्म सार्थक हो जाता । मेरे जीवन का लक्ष वोही होता और शायद मेरे बुढ़ापे की लाठी बनता। मैं सारे ऋण से मुक्त ही जाता ।
मुझे ये मानने में भी कोई शंका या लज्जा नहीं है कि जिन लोगों ने बच्चे को जन्म दिया है । उनकी बुढ़ापा भी अच्छी नहीं गुजरी है। बच्चों ने उनके वृद्ध माँ बाप को मरने के लिए रस्ते पर, आश्रम में या तो फिर गांव में छोड़कर विदेशों में अपने पत्नी और बच्चों के साथ रह रहे हैं। उनका भी बहुत बुरा समय आएगा। क्योंकि ऐसे बच्चों के मां बाप ने तो अपने जीवन के अच्छे कर्म किए कि अपने बच्चे को पालन और शिक्षित बनाया । लेकिन बच्चा सिर्फ अपनी स्वार्थ और भोग के लिए माँ बाप को छोड़कर दूर रहते हैं तो वह कर्म भी उन बच्चों को उनके वृद्ध अवस्था में भोगना पड़ेगा। मैं तो कहता हूं उसे भी बुरा जितने उसके माँ बाप ने अपने बुढ़ापे में भुगता है। कर्म तो तभी प्रतिशोध लेता है । जब पाप कर्मों के कर्ता शक्तिहीन हो, सामर्थ्य हीन हो, दिन हीन की अवस्था हो, तभी मनुष्य के अतीत के कर्म सामने आते हैं। फिर भी वह मनुष्य अपने अतीत के पाप कर्म को स्वीकार नहीं करता और ईश्वर को ऐसे दुःखी जीवन के लिए श्रेय देता है। वो नहीं जानता कि ऐसे दुःख और शोक युक्त जीवन का रचयिता वो स्वयं है। वो कहते हैं ना जैसी करनी वैसी भरनी। ये सत्य है सत्य है सत्य है। आज कल की युवा पीढ़ी बहुत तर्कवादी है और कुछ ज्यादा ही शिक्षित है। परंतु इन सब पुस्तकी ज्ञान को नहीं मानती । आज के भारतीय युवा जितनी तकनीकी शिक्षा में आगे जा रहे हैं । उतनी ही नीति, नैतिक और संस्कार से उतना ही पीछे जा रहे हैं। एक अच्छा समाज गठन करने में तकनीकी ज्ञान का होना जितना आवश्यक है। उतना ही आवश्यक नीति, नैतिक और संस्कार रूपी ज्ञान का होना। प्राचीन काल के गुरुकुल में तकनीकी ज्ञान जैसे आयुर्वेद, ज्योतिष, खेती, रसायन, युद्ध शास्त्र आदि पढ़ाया जाता था और उसी के साथ नीति शास्त्र, नैतिकता और संस्कार वर्धक कहानी भी पढ़ाई जाती थी। आज के विद्यालय और महाविद्यालयों में सिर्फ तकनीकी शिक्षा पर ही जोर दिया जाता है। 
जैसे कि मैने ऊपर बताया कि में यूट्यूब पर वीडियो स्क्रॉल कर रहा था और एक वीडियो पर नजर पड़ी। उसी वीडियो के एक कॉमेंट को में पढ़ रहा था तो देखा कि । एक विवाहिता शिक्षित स्त्री ने ये वीडियो देखकर ये लिखा था कि "मैं अपने बच्चे को मेरे बुढ़े सास ससुर को छूने तक नहीं देती हूं और उनको मेरे बच्चे से दूर रखती हूं "
मुझे एक और पाप की गंध आने लगी। मैने उसे उसके कमेंट पर लिखा कि "एक माँ बाप की सबसे बड़ी खुशी उसके बच्चे ही होते हैं और उनसे बढ़कर उनकी खुशी उनके नाती पोते होते हैं। जिनके सहारे वह अपने बच्चे की बच्चपन जो उनके युवा अवस्था में देखा था। उसे याद करते हैं और खुश होते हैं। ये खुशी और शुकून आप उन से छीन रही हो। जिस प्रकार मूलधन से ज्यादा ऋण धन प्यार होता है। उसी तरह माँ बाप को अपने बच्चे से ज्यादा नाती पोते प्यारे होते हैं। ये आपका कर्म पाप से भरा हुआ है"
तब उस स्त्री ने मेरे कमेंट पर ये लिखा कि "मेरा बच्चा छोटा है और उसकी दादा दादी की उम्र ज्यादा है तो मुझे डर लगता है। जब मेरा बच्चा बड़ा हो जाएगा तो तब उनके साथ रहेगा। लेकिन अभी नहीं"
फिर मैंने उसके कमेंट पर लिखा कि "अगर आपको भय है कि आपकी सास ससुर की उम्र ज्यादा है और वह आपके बच्चे को संभाल नहीं पाएंगे तो आप भी उसी समय उनके साथ रहिए। एक नियत समय पर अपने बच्चे को उसके दादा दादी से मिलने का समय निर्धारित करिए और आप भी साथ रहिए। आपकी बूढ़े सास ससुर को अपने नाती पोतों की बच्चपन ही तो देखनी है। युवा होकर देखने में उनको क्या आनंद आएगा और शायद आपके बच्चे को युवा होने तक शायद वह जीवित भी ना हो। जैसे कि आपने बताया कि उनकी उम्र बहुत ज्यादा है। याद रखो अगर आपकी वृद्ध सास ससुर या आप ही की माँ बाप की अपने नाते पोते से खेलने, देखने या रहने की इच्छा पूरी नहीं हुई तो ये पाप आपको लगेगा। कर्म बहुत क्रूर है। जब आप बूढ़े होंगे तब आपका बच्चा आपके साथ भी यही करेगा याद रखना। अभी आपके पास पैसा, धन, शक्ति, ऐश्वर्य, निरोगी शरीर सब है। लेकिन जब ईश्वर प्रतिशोध लेगा ना। फिर अपनी पाप को अस्वीकार मत करना। क्योंकि समय लौट कर आता है। मेरे दो बच्चे हैं और मैंने मेरे दोनों बच्चों को सबसे ज्यादा समय उनके दादा दादी के साथ रहने का मौका देता हूं। मेरी इच्छा है वह उनके दादा दादी और नाना नानी के साथ रहे और उनके जीवन का अनुभव वो अपने अंदर उतारे। आप और अपने पति की आप अपनी सास ससुर की जगह रखके देखें। तब आपको आपका कलेजा फटते हुए लगेगा। जिस बच्चे के बारे में आप इतना सोच रहे हो । वोही आपका लड़का आपके साथ करेगा । यही समय का फेर है। जो कहीं जाता नहीं है । सिर्फ लौटकर आता है। उस सुख दुःख के परिणाम को भोगना पड़ेगा जो अपने अतीत में किया था "
मेरा इस कमेंट के बाद उस स्त्री का फिर कोई कमेंट नहीं आया। मैने भगवान से प्रार्थना किया कि है भगवान मैने उसे समझाने की बहुत सी प्रयत्न किए । आशा करता हूं कि उसे समझा आई होगी। 
लोक के पास जब पैसा, पावर, शक्ति, सामर्थ्य और समय होता है तो लोक पाप कर्म करने से नहीं डरते हैं। लेकिन वह भूल जाते हैं कि भविष्य अंधकार मय है। वो जैसे सोचते है । भविष्य वैसा नहीं होगा।  समय, कर्म और ईश्वर गिन गिन कर प्रतिशोध लेते हैं । जो भी माता पिता आज वृद्ध आश्रम में रह रहे हैं, सड़क पर भीख मांग रहे हैं, मंदिरों में भीख मांग रहे हैं या किसी और दयनीय स्थिति में हैं। मुझे ये बोलने में कोई हीच खींचा हट बिल्कुल नहीं हो रही हैं। क्योंकि की इन्होंने भी कहीं ना कहीं अतीत में ऐसे ही कुछ पाप किए होंगे।
 एक मेरे रिश्तेदार की कथा भी कुछ ऐसी ही है। जमींदार और धनी परिवार की बहु थी। सास ससुर का आदर सम्मान नहीं करती थी और पति के पैसे का जोर बहुत था। सास ससुर बीमार हुए घसीट घसीट घसीट कर चलते थे। ये अपने सास ससुर से उनकी वृद्ध अवस्था में घृणा करती थी और नहीं सेवा करती थी और नहीं खाने को खाना देती थी। सास ससुर का स्वर्गवास हो गया। कुछ वर्ष बाद पुत्र का विवाह हुआ और विलायत में पढ़ी लिखी शिक्षित बहु आई। वो बहु को गांव की जीवन शैली अच्छी नहीं लगी और वह विदेश चली गई। उसके पीछे पीछे बेटा भी विदेश में स्थाई हो गया। कुछ दिनों बात उसके पति की हृदय घात से मृत्यु हो गई। उस स्त्री के संबंधियों और गांव वालों ने उसके जमीन जायदाद पैसा सब कुछ जोर जबरदस्ती हथिया लिया और वह पागल हो गई थी। उसे गांव के लोग डंडे से मारते थे और मैने अपने आंखों से देखा है कि बच्चे उसके पीछे पड़ जाते थे। उसके पीछे से दिवाली के फटाके लगा देते थे और पत्थर भी मारते थे। सिर्फ बच्चे क्या बड़े लोग भी उसे पता नहीं क्यों दया नहीं दिखाते थे। वह गांव के पास एक नदी था वहां वो बैठी रहती थी। पागल होने पर भी उसे वोही बात याद थी कि वो अपने सास ससुर से कैसे लड़ती थी। अपने बच्चे की याद आने पर जोर जोर से रोती थी। मुझे लगा था कि वो कुछ दिन में शायद प्राण त्याग देगी और मर जाएगी नहीं। पागल होने के पश्चात शायद वह 25 से 30 साल तक जिंदा रहीं और शायद अपने पापों का दंड भी वह यही जन्म में भोग रही थी । फिर एक दिन उस नदी में बाढ़ के आने से उसकी मृत्यु पानी में डूबकर हो गई थी। उसके मृत्य के पश्चात उसका बेटा और बहु को मृत्यु का समाचार दे दिया गया था। परंतु वह बेटा बहु और नाती कोई नहीं आया उसके अंतिम संस्कार को। उसके अंतिम संस्कार भी अच्छे से नहीं हुआ था शायद। सिर्फ उसके शरीर को अग्नि में जला दिया गया था। गांव वाले तो ऐसा भी बोलते हैं कि जब उस स्त्री का शरीर जलाया जा रहा था तो तब जोर की आंधी वर्षा आ गई थी। जिस से उस स्त्री का शरीर अर्ध जलासा रह गया था। आधे जले हुए शरीर को गांव के लोगों ने केरोसिन डालकर पूरी तरह जलाने का प्रयत्न तो किया था। पर भारी बारिश के कारण वह संभव नहीं हो पाया। उसके अंतिम संस्कार भी अच्छे सा नहीं हुआ था। गांव के लोग कई सालों तक उसी नदी के किनारे उसके प्रेत को देखने का दवा करते थे। कुछ बोलते थे कि वो स्त्री प्रेत योनि में हैं और अपनी मुक्ति को तरश रही है। 
अपने वर्तमान कर्म अच्छे करो, अतीत के पाप कर्मों को स्वीकार लो और प्राश्चित करो। अच्छे कर्म से ही अच्छे भविष्य का निर्माण होगा। 
धन्यवाद