रविवार, 22 अक्टूबर 2017

क्यों क्षमा प्राप्त शत्रु से कतपि मित्रता नहीं करनी चाहिए और पूर्ण विश्वाश नहीं करनी चाहिए ?

नीति शास्त्रो के नियमा अनुशार अगर किसी से शत्रुता होती है तो उसके साथ पूर्ण रूप से शत्रुता निभानी चाहिए और अगर किसी कारण वश शत्रु को क्षमा दान देना पड़े तो क्षमा के पश्चात उसे कतपि पूर्ण रूप से मित्रता और विश्वाश नहीं करनी चाहिए।

जिस प्रकार आस्तीन या घर में रहे हुए सांप पर पूर्ण रूप से यह नहीं कहा जा सकता की सांप नहीं कांटने की संभावना कितनी है। उसी प्रकार शत्रु से मित्र बने हुए लोगो पर स्वयं के प्राण संकट में पड़ने का खतरा बना रहता है। अतः इस प्रकार के शत्रुओ से सचेत रहना आवश्यक होता है।

क्षमा दान के पश्चात हो सकता है की वो शत्रु से बने मित्र व्यक्ति के भाव बदल जाये और उसके मन में प्रतिशोध के भाव जागृत हो जाये। इस प्रकारके से शत्रु कभी भी सामने से प्रहार नहीं करते परन्तु अप्रत्यक्ष रूप मे प्रहार करते है। इससे हो सकता है की आपकी कीर्ति, सम्मान और प्राण खतरे मे पड़ जाये।
बिच्छू का स्वभाव हमेशा डंक मारना होता है। उसी प्रकार किसी प्रकार के शत्रु का स्वभाव अपने शत्रु का विनाश करना होता। चाहे वो प्रतेक्ष हो या अप्रतेक्ष रूप से।
धन्यबाद

सोमवार, 16 अक्टूबर 2017

सफलता की कुंजी क्या है और कैसे सफलता प्राप्त करें

सभी प्रकार की सफलता ध्यान या एकाग्रता से आती है। बिना एकाग्रता से मनुष्य किसी भी काम को करने में सफल नहीं होगा। अतः जीवन में सफलता का होना अति आवश्यक है। तो मन में एक प्रश्न और आती है की किस तरह की एकाग्रता होगी तो सफल का मिलना निश्चित हो जाता है।
मुझे एक कहानी याद आती है जो मैने किसी महान व्यक्ति से सूनी थी की एक साधु था वो बहुत दिनों से कठोर साधना कर रहा था । पर उसे उस साधना का सिद्धि प्राप्त नहीं हो रहा था या उसे कुछ अनुभूति भी नहीं हो रही थी। तब उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था। कुछ दिनों के पश्चात उसने एक स्त्री को देखा जो सुंदर थी पर वो स्वेच्छा चरी थी। वो स्त्री पर किसी प्रकार का नियम या अनुशाशन नहीं था। किसी भी पुरुष के साथ रहना और संग करना उसका स्वभाव था।  एक दिन वो स्त्री जंगल में विचरण कर रही थी और किसी नई पुरुष की तलाश थी ताकि वो अपने कामुक इच्छाओं को पूरा कर सके। जब कोई ना मिले तो तड़प उठती थी। कामुकता की पुष्टि में डूबी हुई थी।


साधु को तब आभाष होता है की एकाग्रता कामुकता के जैसे होनी चाहिए। जब हम अपने मन मे किसी कमुक भाव को लाते है तो हम कामुकता मे डूब जाते है और तब तक उस भाव मे डूबे रहते हैं । जबतक वो पूरी नहीं हो जाती। वो साधु अब समझ गया था की उसकी साधना मे किस चीज की कमी रेह गयी थी। जिस तरह हमार ध्यन स्वतः ही कामुक वस्तुओं पर टिक जाती है । उसी प्रकार हमारा ध्यान होना चाहिए। अतः एकाग्रता का अभ्यास करना चाहिए।
धन्यवाद

रविवार, 15 अक्टूबर 2017

किस प्रकार के लोगों से शत्रुता कभी भी नहीं करनी चाहिए।

नीति शाश्त्र के अन्तगर्त ये भी आती है की मनुष्य को सोच समझ कर किसी से शत्रुता करनी चाहिए। अब कोई ये प्रश्न कर सकता है की ये अपने हाथ मे थोड़े ही है की हम किस से मित्रत करे या शत्रुता । पर ये ध्यान देना आवश्यक है की हम किसे शत्रुता कर रहे हैं। नीति शास्त्र मे कहा गया है की किसी भी परीस्थिति में भी चिकित्सक, नाइ, बाबरचि, राज कर्मचारी (सरकारी कर्मचारी), गहन मित्र और अपने जीवन साथी से कतापि शत्रुता नही रखनी चाहिए। क्योंकि ये सभी को आपके कमजोरी और व्यक्ति गत विषय का ज्ञान होता है। इनसे शत्रुता करने पर ये हो सकता है की वे सब आपके व्यक्ति गत रहस्य समाज और शत्रु के सामने प्रकाशित कर दे। इस तरह आपके इज़्ज़त और प्राण दोनो ही खतरे में पड़ सकते हैं। मनुष्य को जंहा तक हो सके इन सब से शत्रुता करने से बचना चाहिये।


अगर चिकित्सक से शत्रुता किया जाये तो चिकित्सक आपके रोग का पूरा ज्ञान रखता है और ये संभावना बनी रहती है की वो आपके रोग को बिगाड़ कर आपकी जान ले सकता है। राज़ कर्मचारी (सरकारी कर्मचारी) अपने पद, शक्ति और सामर्थ्य का उपयोग कर आपको दंड दिला सकता है। नाइ के साथ भी शत्रुता नहीं करनी चाहिए क्योंकि नाइ के सामने जब आप बाल य दाढ़ी काटते हैं। उसके पास पूरा अवशर होता है की आप के अनजान अवश्था में आप पर किसी प्रकार का प्राण घातक आक्रमण कर दे। अपने बाबरचि से शत्रुता करने पर वो आपके खाने में विष मिला कर मार सकता है। नीति शास्त्र का ये कहना है की हमे उन सबसे कभी भी शत्रुता नहीं करनी चाहिए जिन्हें हमारी व्यक्तिगत रहस्यों की जानकरी होती है। क्योंकि इनसे हमारी मान, शम्मान और प्राणो का खतरा बना रहता है। 

धन्यवाद

शनिवार, 14 अक्टूबर 2017

मनुष्य को किस से ज्ञान लेना चाहिए और किस से ज्ञान नहीं लेना चाहिए?

नीति शास्त्र के अनुशार ज्ञान ग्रहण किसी से भी किया जा सकता है। चाहे वो छोटी जात्त को हो या भी गरीब हो। अधिक वयस्क वाला हो य अल्प वयस्क का हो। मानो तो ज्ञान ऐसी एक मूल्यवान वस्तु है जो कजरे के ढेर से भी चूना चा सकता है। नीति शाश्त्र केहत है ज्ञान देने वाला अगर चांडाल भी हो तो भी उसे वो ज्ञान ले लेनी चाहिए। ज्ञान मे कोई ऐसा भेद नहीं है की ऐसा कहा ज सके की ये अशुद्ध है और ये ज्ञान सूद्ध है। ज्ञान कभी असूद्ध हो ही नही सकता और ज्ञान छुत अछूत से परे मानी जाती है। जब कभी भी कोई ज्ञान मिल रहा हो उसे बिना हिचकिचे ग्रहण करना चाहिए। जैसे हीरा भले ही कोयले की खान से पाई जाती है। फिर भी लोग उसे अति मूल्यवान समझकर ग्रहण तो करते ही हैं। उसी  प्रकार ज्ञान का महत्व होता है। कमल भी कीचड़ मे खिलता है । अतः कमल की सुंदरता से लोग मोहित रेहते हैं । पर उसका उद्गम स्थली का इतना महत्व नहीं होता। सर्वथा सर्व अवस्थाओं मे ज्ञान को ग्रहण करनी चाहिए। अगर सत्रु से भी ज्ञान की प्राप्ति हो रही हो तो बिना संकोच के उस वो ज्ञान भी सीखना चाहिए। ज्ञान प्रकाश स्वरूप है और थोड़ा स भी प्रकाश अंधेरे को दूर करने में सक्षम होता है।हरी ओम, हरी ओम हरी ओम ।

रविवार, 1 अक्टूबर 2017

किसी समस्या या रोग का समाधान कैसे करें?

जो मनुष्य इस मत्य लोक मे जन्म लेता है । उसे किसी ना किसी प्रकार की विपति, रोग, समस्या य संसय आना स्वभाविक है। पर इन सब से छुटकारा पाना बुद्धि मान मनुष्य के लिए बहुत सरल होता है। नीति शास्त्रो और चिकित्सा शास्त्रो मे कहा गया है की जहां जिस तरहा की समस्याएं, रोग, सोक और दुःख आते हैं। वहीं इसका इलाज़ और निराकरण पाया जा सकता है।
सांप का जहर ही सांप के जहर का निराकरण करती है और दूसरी चीज़ जंहा सांप रहता है। वहीं उसी इलाके के वृक्ष और जड़ी बुट्टी उस जहर का भी इलाज़ कर सकते है।
गर्मी के मौसम में होने वाली विमारीयों का इलाज़ गर्मी के मौसम में होने वाले फलों में होता है। सर्दी में होने वाले फल सर्दी के मौसम के रोगों का औसध होता है।
मधमखि दंश का इलाज़ मध से ही हो सकता है। नीति शाश्त्र केहत है। प्रकृति अगर हमे किसी प्रकार की विपति या रोग देती है तो साथ ही वो हमे इसका निराकरण और औसध भी प्रदान करती है।
जिस तरह प्रकृति रेगिस्तान के जीवों में पानी सरक्षण के  गुण विकसित करवा लेती है। उसी प्रकर सभी दुःख और विमरीयों का इलाज़ भी विकसित कर लेती हैं।

शनिवार, 20 मई 2017

मध्यम मार्ग क्या है और मध्यम मार्ग का ही अनुशरण क्यों करना चाहिए

जो मनुष्य किसी भी क्षेत्र मे सफल होना चाहते है तो उसे मध्यम मार्ग का अवश्य ही अनुशरण करना चाहिए।
तो हमे यह जानना जरूरी है की क्या है ये माध्यम मार्ग। मध्यम मार्ग का अर्थ है किसी भी चीज़ का ना बहुत ज्यादा करना है और ना ही बहुत कम करना है। मध्यम ही करना है।
मध्यम मार्ग सर्व प्रथम भगवान कृष्ण के द्वार श्रीमद् भागवत गीता में अर्जुन को बताया गया। जिसमें कृष्ण अर्जुन से कहते है। है अर्जुन तो योगी बन, और तु योगआरूढ़ हो। योग उसीका सिद्ध होता है जो माध्यम मार्ग को अपनाता है। अर्थात जो अधिक निद्रा लेता है और जो बिल्कुल निद्रा लेता ही नहीं। जो अधिक भोजन करता है और जो बिल्कुल भोजन नहीं करता। इन दोनों ही तरहा के लोगो का योग कदापि सिद्ध नहीं होते । योगी तो वही बनता है या योग सिद्ध वही बनता है जो पर्याप्त निद्रा लेता है ओर जो पर्याप्त भोजन करता है । ना आवश्यकता से अधिक और नही आवश्यकता से कम। इसे ही मध्यम मार्ग कहते है।
भगवान बुद्ध को भी माध्यम मार्ग के कारण ही महाज्ञान की प्राप्ति हुई थी। एक समय बुद्ध की जीवन में ऐसा आया की बुद्ध भोजन ओर निद्रा का पूरी तरह त्याग कर दिए थे। इस कारण उनका सरीर क्षिण होने लगा और बुद्ध का ज्ञान का प्यास पूरा नहीं हो पाया। उन्हें इसका आभास तब हुआ जब वो वीणा बजा रहे थे। जब वो वीणा का तार भीड़ रहे थे तब वीणा का तार बहुत तन जाता जिसे तार जल्दी है टूट जाती थी और जब तार को थोड़ा ढ़िल देकर बांधा जाता तो उस वीणा का वादन सही से नही होता था। कुछ प्रयत्न के पश्चात तार सही से बंध गयी। जो ना ही बहुत ही ज्यादा भीड्डा गया था और नही बहुत ही ढ़िल दि गयी थी। उस वीणा से मधुर स्वर निकल रहे थे और नही तार जल्दी टूट रही थी। इस तरह बुद्ध को ज्ञान हुआ की साधना मार्ग की सफलता माध्यम मार्ग के अनुशरण से ही है।
तो मनुष्य को अगर किसी भी क्षेत्र मे सफल होना चाहता है तो अवश्य ही उसे माध्यम मार्ग का अनुशरण करना चाहिए।
एक और कहानी से भी मध्यम मार्ग की सिख मिलती है। जिस मे दो लकड हरा रहते है । वो दोनो मित्र साथ रहते है और साथ ही जंगल मे लकडिया काटते हैं। एक लकड़हारा सुबह से साम तक बिना रुके लकड़ी काटता है और दूसरा लकड़हारा एक वृक्ष काटने के बाद विश्राम करता है। साथ ही साथ अपनी कुल्हाड़ी की धार को भी तेज़ करता था। अंत मे देखने पर ये पता चलता है की दूसरे लकड़हरा ने पहले वाले से ज्यादा लकड़ी काटि है। जब हम किसी काम को लगातार करते हैं। उसे करते करते शरीर थक जाता है। जिसे कार्य करने की क्षमता पर पडता है। अतः किसी भी कार्य को करने में माध्यम मार्ग का अनुशरण ही उचित है।

शनिवार, 13 मई 2017

मनुष्य को कभी भी अत्यधिक कठोर क्यों नहीं होना चाहिए ?

Pनीति शास्त्र के नियमों के अनुसार जो अत्यधिक कठोर होता है । उसे एक दिन जरूर टूटना पड़ता है और उसकी आयु भी बहुत कम होती है। ये भी प्रकृति का एक तरह का नियम है। जीभ प्रत्येक मनुष्यों में जन्म से होता है और दांत उसके बाद आता है। पर जीभ मनुष्य के मृत्यु तक उसके साथ रहता है और दांत कुछ समय के पश्चात झड़ जाते है। अतः मनुष्य को कभी भी अधिक कठोर नहीं बनना चाहिए।
दांत का टूटने का कारण उसके कठोर स्वभाव है और जीभ की आयु अधिक होने की कारण उसका लचीला स्वभाव है। मनुष्य को सदेब जगह, माहोल और आसपास के लोगो के अनुशार अपने स्वभाव मे लचीलापन लाना चाहिए। वैज्ञानिक सिद्धान्त के अनुशार वही जिव इस पृथ्वी पर जीवित रेह पाये जो पर्यावरण के साथ लचीला बन पाये अर्थात परिवर्तित हो पाये। बकि के जिब विलुप्त हो गए जो पर्यावरण के साथ बदल ना सके।
जीवन के नियम भी कुछ इसी प्रकार के हैं । समुद्र में जब कोई तैराकी तैरता है । वो समुद्र के लहरो के साथ तैरता है तो वो जीवत बचता है और अगर लहरो के विपरीत दिशा में अगर तैहरता है तो अवश्य ही उसे मृत्यु का सामना करना पड़ेगा। नाविक हमेसा लहरो की दिशा मे ही नाव को चलाता है अन्यथा वो अपने लक्ष्य तक कभी नहीं पहुंच सकता।
एक उदाहरण ओर भी है। जल का स्वभाव भी लचीला होता है । इस कारण वो किसी भी मार्ग से बहने का रास्ता ढूंढने में सफल हो जाता है।
पानी जब लचीला होता है उसे काटा या तोड़ा नहीं जा सकता । पर वही पानी जब कठोर और ठोश बन जाता है। तब उसे तोड़ना या काटना बहुत ही सरल बन जाता है। अतः मनुष्य को सदैब सरल और लचीला होना चाहिए।
हरी औम

शुक्रवार, 12 मई 2017

मनुष्य को कभी भी अति सरल क्यों नहीं होनी चाहिए ?

चाणक्य का एक सुंदर कहावत सुनने या जानने में मिलता है । जिसमें चाणक्य केहता है की सीधा वृक्ष को लकड़हारा जल्दी काटने को चाहता है और टेढ़े मेढ़े वृक्ष को वो ऐसे ही छोड़ देता है ये सोच कर की वो उसे बाद मे काटेगा और सोच समझकर काटेगा। मनुष्य के इस समाज में भी कुछ ऐसे ही नियम लागू होते है। कोई भी मनुष्य किसी भी सक्त और कटु वाक्य बोलने वाले व्यक्ति से कभी भी नहीं उलझता है क्यों की उसे किसी तरह अपने बातो में फ़साना और उसे धोका देना कभी सरल नहीं होगा। उसे कुछ बोलने के बदले स्वयं की भी कुछ हानि हो सकती है। सादे और सरल स्वभाव के व्यक्ति को अपने बातो मे फ़साना और उसे किसी प्रकार धोका देना अत्यंत सरल होता है।
ये नियम सिर्फ मनुष्य समाज मे ही लागू होता है ऐसा नहीं है। ये तो प्रकृति का नियम है। आप निश्चित ही जानते होंगे की कांटो से भरा फूल को तोड़ना सरल नहीं है और उसे कोई तोड़ना चाहता भी नहीं क्योंकि कोई कांटो से उलझना चाहता ही नहीं।
दूसरा भी एक इस नियम का प्रमाण है की कोई भी व्यक्ति विषधर और हींशक जीवों से स्वयं को दूर ही रखता है और सरल स्वभाव के जीवों को मारकर खाता है। बलि हमेशा बकरे या भेड़ो की ही चढ़ति है नाकि शेर, वाघ या चीताह की।
भले ही मनुष्य कितना भी बुद्धिमान हो पर वो किसिना किसी बात पर दुशरे मनुष्य से लड़ता जरूर है। ये साबित करता है की मनुष्य भी एक तरह का पशु ही है। कभी भी किसी भी समय शत्रु बना लेता है ।अपने शत्रु को परास्त करने के लिए उसे हमेशा सतर्क रहना चाहिए। अपने सरलता का हमेशा प्रदर्शन नहीं करना चाहिए। शदैब वार्तालाप मे गंभीर भाव लान अति आवश्यक होता है।
धन्यवाद

रविवार, 12 मार्च 2017

नीति शास्त्र और धर्म अधर्म का ज्ञान

अगर कोई व्यक्ति नीति शास्त्र का यथार्थ अभ्यास और पालन करत है। तो उस व्यक्ति को स्वतः ही पता चल जायेगा की कौनसा काम करने से उसे अच्छा परिणाम मिलेगा और किसे करने से अच्छा परिणाम नही मिलेगा। तातपर्य उसे सभी धर्म अधर्म का ज्ञान हो जाता है।- चाणक्य

चाणक्य कहते हैं नीति शास्त्र का अभ्यास करने वाला और नीति शास्त्र में बताये गए उपदेशो का पालन करने वाला कभी किसी भी काम में असफल नहीं हो सकता। क्योंकि उसे स्वतः ही सभी अच्छे बुरे घटनाओं का आभाश होने लगता है। उसे ये भी ज्ञान हो जाता है की कौन सा काम करने से सफलता मिलेगी और किस काम को करने से असफलता का मुंह देखना पड़ेगा। नीति सास्त्र को जाननेवाले लगभग सब कुछ जाननेवाला वन जाता है। स्वतः ही बिना अस्त्र और सास्त्र के सत्रु परास्त हो जाते हैं। जिस प्रकार से चाणक्य ने घंना नंद के पूरे वंश का नाश कर दिया था। महाभारत में भी कई नीतिशास्त्र के ज्ञाताओं के बारे में जानने मिलता हैं। जैसे की कृष्ण, विदुर और संकूनि, ये सभी नीति शास्त्रों धुरंधर माने जाते थे। संकुनि ने ये प्रण लिए थे की वो कौरव वंश का पूरी तरह से नाश कर देंगे। वास्तविक रूप से महाभारत युद्ध का मुख्य सूत्र धार शंकुनि था।। नीति शास्त्र का अभ्यास करने से समाज में धर्म का शासन बना रहता है।

गुरुवार, 9 मार्च 2017

नीति शाश्त्र का श्रोत (प्रथम अध्याय-1)

में तीनों लोकों के अधिपति भगवान विष्णु जी को नतमस्तक हो कर नमस्कार करता हूँ । बिभीन प्रकार शस्त्रों का जो सार शास्त्रा है उस राजनीति शास्त्रा उसका में व्यख्यान करता हूँ । -चाणक्य

चाणक्य सभी शास्त्रों को मंथन करने के बाद जो अमृत रूप में प्राप्त नीति शास्त्र है उसका व्यख्यान करने से पहले तिनिलोकों के स्वामी भगवान विष्णु को नमस्कार करते हैं। क्योंकि सभी शास्त्र का उद्गम स्थान तो भगवान श्री विष्णु का कंठ हैं। चाहे वो वेद हो या पुराण । किसी भी चीज़ का सुरुआत करने से पहले परमेश्वर का स्मरण करना चाहिए और उस परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए की "है प्रभु मे जो काम तेरा स्मरण करके सुरु करता हूँ उस काम में मुझे तु निर्विघ्न सफल बना।  नीति शास्त्र में भी केइ प्रकार के शाखाएं होती हैं । उनमें से कुछ है जैसे की युद्ध नीति, राजनीति और कूटनीति आदि। प्राचीन काल में जो लोग राजापाठ संभालते हैं या राजाओं को जो सलाह देते हैं। उन्हें राजनीति का अभ्यास करते हैं। राजनीति शास्त्र में ये बताया गया है की राजा को कैसा होना चाहिए और एक राज को कीन नियमों को पालन करना चाहिए।