गुरुवार, 25 मार्च 2021

क्यों वृद्ध व्यक्तियों के साथ बैठने से मनुष्य की उम्र बढ़ जाती है ?

साधारणतः ऐसा कहा जाता कि अगर कोई कम आयु का व्यक्ति किसी वृद्ध व्यक्ति के साथ बेठता है और बातचीत करता है तो उसकी उम्र बढ़ जाती है। इसका क्या तात्विक अर्थ है । क्या यह सच है की युवा व्यक्ति की आयु बढ़ जाती है। उम्र का बढ़ने का तात्विक अर्थ यह है कि उस युवा व्यक्ति का अनुभव उस वृद्ध व्यक्ति के बराबर हो जाता है। वो वृद्ध व्यक्ति की आयु अधिक होने पर उन्हें सभी प्रकार का ज्ञान और अनुभव जो जीवन मे मिला वो अधिक होगा। जभी उस ज्ञान और अनुभव को किसी बच्चे या युवा व्यक्ति से आदान प्रदान करते है तो उस बच्चे या युवा व्यक्ति का ज्ञान और अनुभव उस वृद्ध व्यक्ति के बराबर हो जाता है। इसे ही आयु बढ़ना कहते हैं। उस वृद्ध व्यक्ति ने जीवन में कितना कुछ देखा होगा, कितना कुछ सुन होगा और जाना होगा। जब भी वो किसी के साथ ज्ञान और अपना अनुभव बांटता है उस व्यक्ति का आयु भी उस बृद्ध व्यक्ति अनुभव जितना हो जाता है। 

जय महाकाल🙏

अगर अपने शत्रु या प्रतिद्वंदी को असफल करना चाहते हो तो क्या करना चाहिए ?

अगर अपने शत्रु को हर परिस्थिति में हराना चाहते हो। तो कभी भी शत्रु का विरोध नहीं करना चाहिए। सदैब उसकी झूठी प्रशंसा करते ही रहना चाहिए। उसकी झूठी प्रशंसा करने पर शत्रु के मन में अहंकार का जन्म होगा और वही अहंकार उसे नीचे गिराने में सहाय होता है। अहंकारी मनुष्य सभी प्रकार का पाप करने में अग्रशर होता रहता है। जभी उसका पाप बढ़ेगा उसे नीचे गिरने में भी अधिक समय नहीं लगेगा। शत्रु का विरोध करने पर शत्रु को एक लक्ष्य प्राप्त हो जाता है और वो उस लक्ष्य को प्राप्त करने में पूरी एकग्रता से जुड़ जाता है। अतः शत्रु को कभी भी लक्ष्य साधने में सफल नहीं होने देना चाहिए। जो मनुष्य को स्वयं की प्रशंशा सुनना अच्छा लगता है वो मनुष्य जीवन में कभी भी सफल नहीं हो पाता है। सफल व्यक्ति स्वयं को सदैव प्रशंसा से दूर रखता है और अपनी निंदाओ को अवश्य ही सुनता है। जो व्यक्ति सफलता के शिखर पर पहुंचे होते है। वो अपने प्रशंसकों के वजह से नहीं बल्कि अपने निंदकों के वजह से सफलता की शिखर को छूते हैं। स्वयं की प्रशंसा ही सभी पाप की बीज होती है। कभी भी किसी भी मनुष्य को प्रशंसा की इच्छा नहीं करनी चाहिए।

जय महाकाल🙏

रविवार, 21 मार्च 2021

क्या शत्रु को क्षमा करना वीरता का काम है?

अपने हर तरह के शत्रु को क्षमा करना कदापि वीरता का काम नहीं है। हां, अगर कोई शत्रु सच मे बहुत कमजोर है, बीमार है, और जो अपने बराबरी पर खड़ा नहीं हो सकता उसे माफ किया जा सकता है। पर ऐसा शत्रु जो धनवान है और शक्तिशाली भी है और वो आपसे हार गया है । ऐसे शत्रु को कभी माफ नहीं करना चाहिए और कभी भी उसका संगत नहीं करनी चाहिए। भले ही उसकी हत्या तो नहीं कर सकते पर मित्रता भी नहीं करनी चाहिए। जो इस तरह के शत्रु को माफ करता है । वो देर सबेर शत्रु के हाथों भबिष्य में परास्त होता है या अपने जीवन से ही हाथ धो बेठता है। अतः शत्रु को माफ कर देना कतापी बुद्धिमानी नहीं है और नहीं वीरता की निशानी है। सदैब ही अपनी शत्रु पर नज़र रखते रहना चाहिए और उसकी कमज़ोरी को ढूंढते रहना चाहिए। जरूरत पड़ने पर शत्रुकि कमज़ोरी पर वार करना चाहिए।

रविवार, 14 मार्च 2021

किस तरहा के लीगों के साथ संगत करनी चाहिए?

मनुष्य के जीवन में बहुत से लोग आते हैं और चले जाते हैं। पर कुछ लोगों का प्रभाव उस मनुष्य के जीवन भर रहता ही हैं। यह प्रभाब अच्छे भी हो सकते है और खराब भी हो सकते हैं। जैसे बुजुर्गो ने कहा है अच्छे लोगों के साथ रहोगे तो अच्छा बनोंगे और बुरे लोगों के साथ रहोगें तो बुरा बनोगे। बहुतसिं कहावतें भी हमारे समाज में प्रचालित है । जैसे कि " एक गंदी मछली पूरी तालाब को गंदी कर देती हैं" और "एक खराब आम टोकरी में रखे हुए सभी आमों को खराब कर देती है। अतः किसी भी मनुष्य को समाज स्व बहिस्कृत मनुष्य का संगत कतापी नहीं करनी चाहिए। जिस मनुष्य का समाज में कोई पहचान नहीं सम्मान नहीं उनका संगत कतापी नहीं करनी चाहिए। अगर कोई उसका संगत करता है तो उस मनुष्य की व्यक्तित्व भी वैसा ही माना जाता है। अगर मान लिया जाए कि एक शराबी हैं जो हमेशा नशे में धूत रहता है और उसका एक मित्र है जो उसके साथ हमेशा रहता है। अगर उसका मित्र ये कहता है कि वो शराब नही पिता तो कतापी कोई उसकी बातों पे विश्वाश नहीं करेगा। चोर का मित्र जो हमेशा चोर के साथ रहता है और कहे कि चोरी उसने नहीं कि । तो पुलिस कभी उसकी बात मान नहीं सकते।
यह एक मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि जो मनुष्य जिसके साथ अधिक समय रहता है । उसकी मानशिकता उसके जैसे ही हो जाती है। चाहे वो मनुष्य कितना ही दृढ़ निश्चयी क्यों ना हो। अपराधी प्रबृत्ति के लोगो के साथ रहने से अपराधी जैसे मानशिकता हो जाती है और अंततः आपराधिक प्रवृतियों में सलंग्न हो जाते है। अगर मनुष्य ज्ञानी और आध्यात्मिक विचार वालोँ के साथ अगर अधिक समय गुजारता है तो वो ज्ञानी और अध्यात्म वादी बनता हैं। 
जो मनुष्य सदा दुःखी रहने वाले के साथ समय।व्यतीत करता है । वो मनुष्य भी सदा दुःखी रहता है। एक व्यक्ति की मनोस्थिति दुशरे मनुष्य के मन पर भी पड़ता है। अतः सदा खुश मिज़ाज़ मनुष्य का संगत करें। मनुष्य अगर आपराधिक प्रबृत्ति, दुःखी, चुगल खोर, नीच मानशिकता और समाज से बहिस्कृत मनुष्य का संगत करता है तो उसे भी समाज का तिरस्कार शुननी पड़ेगी और उसकी मानशिकता भी वैसे ही हो जाएगी। अपने संगत को अवश्य ही सुधारना चाहिए और अच्छे लोगों का संगत करनी चाहिए। जैसे ही कोई अच्छे लोगों का संगत चालू कर देता है वैसे ही बुरे संगत का असर खत्म होना सुरु।हो जाता है।

जय महाकाल

क्यों अपने गुरु से बाद विबाद शत्रुता या गुरु का अपमान नहीं करनी चाहिए?

भारतीय वेद, पुराण और शास्त्रों में गुरु को परमेश्वर की संज्ञा दी गयी है। कुछ संत और ऋषियों ने तो गुरु को ईश्वर से भी ऊपर माना है। क्योंकि गुरु प्राप्ति की आवश्यकता ईश्वर प्राप्ति की आवश्यकता से पहले आता है। अतः गुरु को प्रथम स्थान पर रखा गया है और द्वितीय स्थान पर ईश्वर को रखा गया है। 
जब कोई शिष्य गुरु से ज्ञान प्राप्त करता है। तब उस शिष्य को ये नियम अवश्य ही प्राप्त करना चाहिए कि वो गुरु से किसी भी प्रकार का मिथ्य भाषण ना करें। गुरु जैसा कहें वैसा ही करें। 
जब गुरु किसी अपने शिष्य को ज्ञान देता है। गुरु भली भांति यह ज्ञान होता है कि शिष्य की क्या कमज़ोरी है और शिष्य को कैसा ठीक किया जाए। अतः शिष्य को कभी भी गुरु के साथ बगाबत नहीं करनी चाहिए। नहीं तो गुरु के क्रोध होने पर शिष्य के प्राण भी जा सकते है। गुरु उस माली के जैसा है । जिसे अच्छे से पता है किस फुल की बृक्ष को किस प्रकार का खाद देना है। बृक्ष को कितनी कटाई छटाई करनी है। गुरु को अपने शिष्य के बारे में यह भी पता है कि शिष्य को कोनसा ज्ञान या विद्या पचेकि और कोनसा ज्ञान नहीं पचेगी। 
अपने गुरु का कभी भी अपमान नहीं करना चाहिए भले ही गुरु शिष्य को कितना ही दूसरो के सामने अपमानित करें। अगर गुरु अपने शिष्य को अपमानित करता है तो अवश्य ही उसमे शिष्य का हित छिपा हुआ होगा। गुरु के सामने ऊँची आवाज़ में बात करना, गुरु के सामने पैर फैलाकर बैठना, गुरु के खाने से पहले भोजन खा लेना सरासर गलत है। इसे गुरु कुपित होते हैं और गुरु शिष्य को वो ज्ञान नहीं देता है जिस ज्ञान को शिष्य प्राप्त करना चाहता है। अतः नीति के हिसाब से अपने गुरु से किसी भी प्रकार का शत्रुता, बाद विबाद कताहि नहीं करनी चाहिए।
ओम गुरु देवाय नमः