सोमवार, 5 दिसंबर 2022

क्यों इस अति आधुनिक काल में आत्महत्यायों के संख्या बहुत अधिक हो गयी है?

इसी अति आधुनिक काल में एक चीज हमेशा से सुनने मिलती है और यह चीज हर न्यूज पेपर में छपती भी है। वो है आत्महत्या। किसी अमुक आदमी ने फलाने जगह पर आत्महत्या करली है। वो इतने करोड़ संपति का मालिक था और बहुत बड़े बंगला में रहता था। आखिर ऐसा हो क्यों रहा है की सम्पन और धनवान व्यक्ति भी आत्मा हत्या कर रहे है। इन सबका मेरे नजरिए से देखें तो इनमे कुछ चीज की कमी है वो है दृढ़ धैर्य और विश्वास । जो सिर्फ आध्यात्मिकता से ही आता है। पहले हम अपने बचपन में सुनते थे की फलाना गरीब व्यक्ति ने गरीबी से दंग आकार आत्महत्या कर ली। पर आज सुनते है की वो फलाना अमीर आदमी ने आत्महत्या कर ली और अपने पीछे बहुत सारी संपति छोड़ गया है। आज देखें तो दिन व दिन आत्महत्याओं की संख्या बढ़ती जा रही है। इसका सबसे बड़ा कारण है मनुष्य में खासकर भारतीय लोगों में आध्यात्मिकता की कमी होना और अपने कामकाज में अत्यधिक तनाव का होना। तनाव होना भी स्वाभिक है पर इसका सही तरीके से प्रबंधन करना भी अति आवश्यक हो जाता है। मनुष्यों को तनाव होने का बहुत से कारण है आजकल । पर अपने अंदर उसे लड़ने की क्षमता विकसित करनी चाहिए । 
हमारे प्राचीन ऋषि मुनियों ने समाज के हर अंग पर पुरजोर काम किया और वैज्ञानिक विधि का ज्ञान अपनी लेखनियों की सहायता से पुस्तकों में लिखा। जैसे की शरीर की बीमारियों के लिए आयुर्वेद शास्त्र और मानसिक रोगों के लिए आध्यामिक शस्त्रों की रचना की। पर आज का मनुष्य अपने आप को बौद्धिक, वैज्ञानिक और तार्किक सोच वाला कहता है और प्राचीन हिंदू शास्त्रों को अतार्किक और अंधस्था कहता हैं। इतने वैज्ञानिक और तार्किक सोचवाले होने पर भी दिन प्रतिदिन मानसिक रोगियों की संख्या बढ़ती जा रही है। हम भारतीय हमेशा ऐसा सोचते है की पश्चिमी देश बहुत ही विकसित और सफल हैं। ये भारतीयों की एक भ्रम मात्रा है। अमेरिका जैसे विकसित देशों में धनवान और समृद्ध लोगो होने पर भी वांहा मानसिक रोगियों और पागलखानों की संख्या बढ़ती जा रही है।  तो एक प्रश्न आता है की आध्यात्मिकता मनुष्य को कैसे आत्महात्यों से रोक सकती है। उदाहरण स्वरूप नीचे एक कहानी समझाया जा रहा है।
मानो एक कंपनी में कुछ कर्मचारी काम करते है और उनका बोस उन्हें दिशा निर्देश देता है काम करने के लिए। बॉस कहता है तुम बस काम करो सही हो या गलत हो में संभाल लूंगा तुम बस काम पर ध्यान दो। वो सभी कर्मचारी पूरे मन से काम करते है और अपने उप्पर कोई तनाव नहीं रखते । अगर कुछ प्रॉब्लम आता है तो वे अपने बॉस के साथ विचार विमर्श कर लेते है और उस प्रॉब्लम को सामना करने के लिए वो पूरी तरह से अपने बॉस पर निर्भर है। और उन्हें पूरा विश्वास रहता है की उनका बॉस सब ठीक कर देगा और ठीक हो भी जाता है। तो आनंद से वो इस कंपनि में काम करते है। उसी तरह आध्यात्मिक व्यक्ति संसार में होने वाली किसी भी प्रकार की समस्या का समाधान वो परमेश्वर पर छोड़ देता है जो वो खुद समाधान नहीं कर सकता । वो यह विश्वास रखता है की ईश्वर उसकी समस्या का समाधान कर देंगे। इस तरह से वो तनाव मुक्त रहता है और उसे पूरा विश्वास रखता है । अगर कोई व्यक्ति पूरा विश्वास करता है तो वो पूरी तरह से तनाव मुक्त रहेगा और अगर थोड़ा भी करता है तो उसका तनाव थोड़ा कम हो जायेगा। अगर बिल्कुल भी नहीं करता तो भी उसका तनाव ऐसा रहेगा की उसे थोड़ा सहार मिल जाएगा आध्यात्मिक से की वो आत्महत्या न करें । आध्यात्मिक व्यक्ति के भाव ऐसे ही होते है । इस प्रकार भाव होने से मनुष्य को मानसिक बल मिलता है और उसके अंदर धैर्य, विश्वास और समस्या से लड़ने का सामर्थ्य प्राप्त करता है। वो हमेशा अपने आपको परमेश्वर के कृपा और संरक्षण में महसूस करता है। आध्यात्मिक मनुष्य की मानसिकता ऐसी होती है की वो दुनिया को नश्वर मानता है और आत्मसंतुष्टि अनुभव करता है। दुःख होने पर अपने बॉस के पास जाकर उनसे अपनी बात बताता है अर्थात परमेश्वर से प्रार्थना करता है । उसे इस बात का पूर्ण विश्वास होता है की परमेश्वर उसकी सहायता अवश्य ही करेंगे और उसके साथ वैसे ही होता भी है। जो जैसा भाव करता है उसे वैसा फल प्राप्त होता है। बहुत से आध्यामिक पुस्तक भी ऐसी मानसिकता बनाने में बहुत काम करती हैं जैसेकी श्रीमद्भगवद्गीता। श्रीमद्भागवत गीत में भगवान कृष्ण ने कहा है "योग क्षेमम बहाम्ह्यम" अर्थात मैं परमेश्वर उनकी हर तरह से सहायता और बल देता हूं जो मुझ से योग क्षेम रखते है या पूरी तरह से मुझ पर निर्भरशील रहते हैं। ऐसी अध्यात्मिक किताब पढ़ने से मनुष्यों में परमेश्वर के प्रति विश्वास उत्पन होता है और परमेश्वर पर निर्भरशील रहते हैं। उन्हें ऐसा लगाने लागत है की वो अकेले नहीं हैं इस संसार में। कोई तो है जो उसकी सहायता कर सकता है और उसका आत्मबल बढ़ता है। 
ऐसा देखा गया है की बहुत से लोगों ने इसलिए आत्महत्या करली हैं क्योंकि वो अकेले थे इस दुनिया में। ऐसे मानशिकता के लोग इसलिए आत्महत्या कर लेते है क्योंकि उन्हें अपने आसपास कोई उनको सहारा देने वाला नही मिल और वो अकेलापन महसूस करते हैं। अगर किसी आध्यात्मिक व्यक्ति से पूछो अकेलापन क्या होता है तो शायद वो नहीं बता पाएगा। क्योंकि वो अपने आपको सदैव परमेश्वर के पास ही महसूस करता है। आध्यात्मिक व्यक्ति एकांत में रहता है पर वो अकेला नहीं रहता। वो अपने आपको परमेश्वर से हमेशा जुड़ा पाता है। अकेले रहनेवाले लोगो को भी आध्यामिक भाव को अपनाना चाहिए। इस प्रकार आत्महत्या करने से बचा जा सकता है ।


जय महाकाल 

बुधवार, 16 नवंबर 2022

दुर्बल व्यक्ति कभी भी समाज में शांति और संतुलन की स्थापना नहीं कर सकता |

हमारे देश में अक्सर ऐसे लोग मिल जाते है जो कहते रहते ही की गांधीवादी बनो । अहिंसा का पालन करो और कोई एक गाल पे थपड़ मारे तो उसे दूसरा गाल दिखा दो। पर उसके साथ किसी भी प्रकार उसे मारो मत या हिंसा का सहारा मत लो। ऐसे करने से उस आदमी में पश्चाताप का एहसास होगा और समाज में हिंसा कम हो जायेगी। समाज में शांति की स्थापना होगी। इस तरह की सोच समाज को बरबाद कर देगी और तबाह कर देगी । ऐसी सोच सिर्फ मूर्ख रखते हैं। समाज में कल्याण और शांति स्थापन करने के शक्ति का भी संतुलन होना अति आवश्यक है। हमारे प्राचीन ग्रंथो में बहुत से कथा कहानियां पाई जाती है। 
हिरण कभी शेर से शांति वार्ता कर नहीं सकता क्योंकि हिरण की वो सामर्थ्य ही नहीं है। जो गांधीवादी बोलते हैं की सारे अस्त्र और शस्त्रों को फेक दो । ये बेवकूफी वाला काम है। प्राचीन काल में जब जब असुरों ने तपस्या कर देवताओं से अधिक शक्तिशाली होने का प्रयत्न किया तब तब देवताओं ने अपनी शक्ति सामर्थ्य का वृद्धि कराया। ताकि देव और असुरों में संतुलन बना रहे। शक्ति और सामर्थ्य में संतुलन रखना समाज और जाती के लिए कल्याण कारक होता है। जंगल में अपने देखा होगा की दो समान शक्ति वाले पशु कभी भी नहीं लढ़ते। क्योंकि एक को दूसरे से भय बना रहता है। अगर युद्ध होता भी हे तो दोनों को ही क्षति होती है और तभी ही किसी पशु की प्राण जायेगी जब दोनों के बीच शक्ति का असंतुलन बढ़ जाएगा। पूर्व में जितने भी विश्वयुद्ध हुए हैं उनसबका एक ही कारण है शक्ति की असंतुलनता। जब लगभग बहुत से देशों के पास परमाणु बम उपस्थित है। उसी कारण से सभी देशों के बीच एक भय है की कहीं हमारे ऊपर भी परमाणु बम ना फेक दिया जाए। इस संदर्भ में हिंदी कहावत है की "मरता क्या ना करता"। जो देश परमाणु बम के आक्रमण से नष्ट हो रहा हो । वो देश अंतिम क्षण में किसी भी शक्तिशाली देश के ऊपर परमाणु बम फेक देगा। ये एक सीधा सा मनोविज्ञान है। जंगल में शेर कभी बाघ को मारकर बाघ मांस नहीं खायेगा। शेर को भी पता है अगर में बाघ का शिकार किया भी तो शायद बाघ का हमला भी उसके लिए पतन घातक हो सकता है।
भारत में आज़ादी के बाद ऐसे बहुत से बेवकूफ नेता हुए । जो ये कहते थे कि हमारे देश में सैन्य शक्ति की क्या आवश्यकता है। हम तो शांति प्रिय देश हैं। सैन्य शक्ति को बैन कर दिया जाना चाहिए। हम तो शांति के पैरवी करनेवाले हैं और कुछ विदेशी ताकतों ने हमारी सैन्य शक्ति को बंद करवाना भी चाहते थे। हमारे अपने बेवकूफ नेताओं की वजह से हथियार बनान भी लगभग बंद कर दिया गया था फैक्ट्रियों में और उन फैक्टरियों में जूते चप्पल बनाया जरहा था। ठीक उसी समय हमारे पड़ोसी देश चीन ने आक्रमण कर दिया ये सोच कर की भारत तो कमजोर है और वो युद्ध जीत भी गया। हमारी कुछ जमीन भी उनके कब्जे में चली गई।
अगर में सच कहूं तो प्रतेक मनुष्य के जीवन में एक शत्रु का होना अति आवश्यक है। इसे उसकी सामर्थ्य, योग्यता और शक्ति जानने में सहायक होती है। हमारे देश भारत का भाग्य बहुत अच्छा था की बेवकूफ नेताओं के सोच पर नहीं रहा और भारत को दो पड़ोसी शत्रु मिलगाए । एक पाकिस्तान और चीन, जिसने भारत को लड़ने और स्मार्थ्य बढ़ने पर विवश कर दिया । हमे चीन और पाकिस्तान का मन ही मन धन्यवाद भी करना चाहिए।
यही प्रकृति का नियम है की शक्तिशाली लोग ही दुर्बल लोगों पर शासन करते हैं। अगर समय रहते दुर्बल लोग अगर अपनी शक्ति में वृद्धि नहीं करते तो निश्चय ही भविष्य में वो खत्म कर दिए जाएंगे और गुलाम बना लिए जायेंगे। यही आदि काल से होता आया है और होता रहेगा। सनातन धर्म में कहीं ऐसा नहीं कहा ही की मार खाकर बैठ जाओ और पलटवार मत करो । लोगों ने अहिंसा का अर्थ ही बदल दिया है। महाभारत में कहा गया है की "अहिंस परमो धर्म । धर्म हिंसा तथैव च ||" बेशक अहिंसा परम धर्म है पर धर्म की रक्षा में हिंसा करना उसे भी अच्छा है।  मनुष्य के पास इतनी तो सामर्थ्य अवश्य ही होना चाहिए की वो अपनी रक्षा कर सके। कोई भगवान नहीं उतारेंगे आपकी रक्षा करने। इसलिए सनातन धर्म में ऐसे बहुत से देवी देवता उपस्थित है जो अस्त्र और शस्त्र धारण किए हुए हैं।

जय महाकाल

शनिवार, 21 मई 2022

बुद्धिमान मनुष्य को मूर्ख व्यक्ति से बाद विवाद कदापि नहीं करनी चाहिए।

बुद्धिमान मनुष्य कभी ना कभी मूर्ख मनुष्य के साथ बाद विवाद में पड़ ही जाता है। जिसके कारण बुद्धिमान मनुष्य खुद कष्ट में पड़ता है । कभी कभी तो बुद्धिमान मनुष्य को आर्थिक और जानमाल का नष्ट होने का भी खतरा बन जाता है। अतः बुद्धिमान मनुष्य को चाहिए की वो मूर्ख व्यक्ति से वार्तालाप कम या बाद विवाद करना परहेज करें । परहेज करने में ही बुद्धिमान मनुष्य का हित है।
एक कहानी है जो बुद्धिमान खरगोस और मूर्ख गधे की बीच चले बाद विवाद का । जो मुझे एक बनिया मित्र ने मुझे समझाया था। जिससे मैं मेरे जीवन में अवश्य ही अनुशरन करता हूं और मेरे जीवन में बहुद लाभ हुए हैं। वो कहानी कुछ ऐसा है।
गधा सबको बोल रहा था की आकाश का रंग पीला है। ऐसा बोलते बोलते खरगोश तक पहुंचता है और खरगोश को आकाश की तरफ देख कर बोलता है की आकाश का रंग पीला है। खरगोश आश्चर्य होकर कहा - ना आकाश कर रंग तो नीला है। इस से गधा थोड़ा गुस्से में आकर कहा नहीं आकाश का रंग पीला है तुम्हे कुछ नहीं पता है। खरगोश असमंजस में था की ये गधा क्या बोल रहा है। खरगोश के ज्ञान के अनुसार आकाश का रंग तो नीला है और अनुभव से आकाश नीला ही दिखता है। गधा अपनी बात पर ही अड़ गया न टस से मस हुआ और ना ही वो खरगोश की बात सुनना चाहता था। खरगोश भी अपनी जिद्द पर अड़ गया की वो गधे से ये मनवा के रहेगा की आकाश नीला है। खरगोश ने गधे से कहा चलो किसी से भी पूछ लो की आकाश नीला है। बारी बारी कर आते जाते सबसे से पूछते पर कोई कुछ उत्तर नहीं देता। अंत में गधे ने कहा ठीक है । जंगल के राजा शेर के पास जाते है और वो जो बोलेंगे वो सही होगा। दोनो शेर के पास जाते है और अपने बाद विवाद का विषय उसे बताते हैं। शेर थोड़ा समय सोचता है और ये आदेश देता है की खरगोश को बंदी बना लो और जेल में डाल दो। खरगोश डर जाता है और आश्चर्य हो जाता है की शेर ऐसा कैसे कर सकता है क्योंकि वो सही है इस विषय में। खरगोश जेल में कई दिन गुजार देता है । फिर किसी दिन खरगोश को शेर से मिलने का मौका मिलता है तो खरगोश शेर से पूछता है की गधे और उसके बीच हुई बाद विवाद में वो सही था फिर भी आपने मुझे जेल में डाल दिया लेकिन क्यों। तब शेर कहता है की मैने तुम्हे जेल में इसलिए नहीं डाला की तुम सही हो या गलत । मैने इसलिए जेल में डाल की तुम ज्ञानी और बुद्धिमान हो और तुमने अपने बराबरी के लोगों से बाद विवाद नहीं किया और गधे से बाद विवाद कर बैठे और उसे समझाने में जिद्द पकड़ लिए। तुम्हे जेल में डाल था तुम्हारी सीख के लिए ताकी तुम समझ जाओ की अज्ञानी को समझाना समय की बरबादी और ज्ञान का नष्ट होना है। तुमने अपना समय भी व्यर्थ किया, आते जाते लोगों का समय भी नष्ट किया और मेरा भी समय नष्ट किया। तुम्हे पता है । आते जाते लोगों को ये पता था की तुम सही हो फिर किसी ने कुछ कहा नहीं। क्योंकि की उन्हें पता था की गधा इसे कभी नहीं मानेगा। खरगोश को अपनी भूल समझ में आ गई थी और उसने शेर को धन्यवाद दिया इस सीख के लिए और अपने घर चला आया । इस कहानी के सारांश स्वरूप ये सामने आता है की मूर्ख को एक बार ही ज्ञान दो अगर माने तो ठीक । नहीं तो कदापि उसे बाद विवाद नहीं करनी चाहिए।
धन्यवाद, 🙏 जय जगन्नाथ💐

सबके अहंकार का शत्रु समय है।

प्रत्येक मनुष्य अपने जीवन में किसी ना किसी बात को लेकर अहंकार करता ही है। मनुष्य को अहंकार आना एक स्वाभाविक क्रिया है। पर इसे नियंत्रण में रखना अति आवश्यक है। क्योंकि प्रत्येक जीव को अपने आप पर अहंकार होता ही है। पर उस अहंकार को बाहर नहीं आने देना चाहिए और उसका कुप्रभाव संसार पर नहीं पड़नी चाहिए। जंगल में रहनेवाला शेर भी अपने आप को अहंकार वस जंगल का राजा मान लेता है और ऐसा सोचता है की जंगल में सब कुछ उसके अधीन है । सिर्फ तब तक जब तक उसके सामने कोई समान शक्ति वाला शेर या अधिक शक्तिवाला शेर उस जंगल में नहीं आ जाता। 
ऊंट और पहाड़ की एक संक्षिप्त कहानी है जो उनके अहंकार से संबंधित है। कहानी कुछ ऐसी है । मरुभूमि में रहने वाला ऊंट भी अपने आप को ऊंचा मानकर अहंकार करता है की इस दुनिया में उसे कोई ऊंचा नहीं है। सिर्फ तब तक जब तक ऊंट पहाड़ के नीचे नहीं आता । पहाड़ के नीचे आने से ऊंट का अहंकार चूर चूर हो जाता ही। उसी तरह पहाड़ को भी अहंकार होता है की उसके जैसा संसार में कोई ऊंचा नहीं है और उसे कोई चढ़ नही सकता। पर समय आने पर एक ऊंट भी उस पहाड़ के ऊपर चढ़ जाता है और पहाड़ उस ऊंट के नीचे होता है। तो कहने का तात्पर्य ये है की बड़ा कौन है। कुछ लोग कहेंगे पहाड़ और कुछ लोग कहेंगे ऊंट। पर में मेरे समझ से कहूंगा "समय" जिसने दोनो को बड़ा बनने का मौका दिया पर अहंकार के घेरे में दोनों आ गए। समय से ऊंचा और समय से बड़ा शक्तिशाली कोई नहीं है। अतः अहंकार करना इस मनुष्य जीवन में पूरी तरह से व्यर्थ ही है। हां ये स्वभाव में है। मनुष्य का स्वभाव भी ज्ञान प्राप्त करना और अहंकार को ज्ञान के द्वारा नियंत्रण में रखना ।

हरी ॐ 🙏