रविवार, 25 अप्रैल 2021

"मन चंगा तो कठौती में गंगा" के अनर्थ सोच |

साधारणतः हमारे आस पास धार्मिक भावनाओं को लेकर एक कहावत कही जाती है "मन चंगा तो कठौती में गंगा" । कुछ ना समझ लोग या यूं कहें आज कल के पढ़े लिखे लोग इसे गलत तरह से समझते है और इसका अर्थ भी गलत निकालते है और गलत उपदेश भी देते है। जैसे कि एक बार एक माँ ने अपने बेटे को उसके जन्म दिन पर कहा की वो मंदिर जाकर दर्शन कर आये। इस पर बेटे ने कहा मम्मी "मन चंगा तो कठौती में गंगा" तो मंदिर क्यों जाऊं। 
एक और बात है । एक व्यक्ति की मृत्यु हो गयी थी और उनका चिता भस्म गंगा में प्रभाहीत करना था। उनकी पत्नी ने अपने बेटे से कहा कि वो वाराणसी जाके उनकी चिता भस्म को गंगा में प्रभाहीत कर दे और पिंड दान भी कर आये। इस पर अपनी कार्यालय की व्यस्तता पर बेटे ने कहा मम्मी "मन चंगा तो कठौती में गंगा"। फिर कहा गंगा में प्रभाहीत करने से क्या होगा । उसे अपने पास की नदी में प्रभाहीत कर देते हैं। फिर उसकी माँ ने कहा की तेरे अपने पिता की आत्मा की शांति के लिए गंगा में ही प्रभाहीत करना आवश्यक है। तब बेटा कहता है ये सब अंधविश्वास है। वह बेटा पहले "मन चंगा और कठौती में गंगा" जैसे कहावत कहता है । जो किसी एक संत ने कहा था। पश्चात इसे एक अन्धविश्वाश कहता है। इस कहावत में कोई बुराई नहीं है। जिसे एक प्रसिद्ध संत ने अपनी सोच और आध्यात्मिक स्थिति के अनुसार कहा था। पर आज के युग के लोग इन आध्यात्मिक कहावतों को बिना जाने और अनुभव किये अपनी अवशर और परिस्थिति के अनुसार उपयोग करते हैं।
इस कहावत को संत रविदास जी ने अपनी आध्यात्मिक स्थिति और उचाई के अनुसार कहा था। लोग कोई धार्मिक कार्य में बस छुटकारा पाने के लिए इस प्रकार के कहावतों का सहारा लेते हैं। राबिदास जी को ईश्वर को हर स्थान में, हर वस्तु में देखने का अनुभव और अभ्यास था। एहि ज्ञान वो समाज को और उनके अनुयायिओं को इस कहावत से देते थे। पर आज का मनुष्य इतना शिक्षित होने पर भी अर्थ का अनर्थ कर बैठता है। मंदिर ना जाने के बहाने से वो ये कहता है। पर मनोरंजन के लिए वो थिएटर, पब और पार्टी करने यंहा वंहा जा सकता है। तब वो ये नही बोलता की मनोरंजन तो घर में भी हो सकता है।
आज के युग का मनुष्य तो बिना स्नान के प्रतिष्ठित मंदिरों में ऐसे ही प्रवेश कर लेता है और कहता है "मन चंगा और कठौती में गंगा"। पर उसके मन में "अत्र तत्र सवत्र ईश्वर" का भाब बिल्कुल ही नहीं हैं। मनुष्य को अवश्य ही धार्मिक अंधत्व से बाहर निकलना अति आवश्यक है। पर इतना शिक्षित होने पर भी अपने मन मे अशिक्षित विचार और आचरण भी समाज के लिए सही नहीं है। हर धार्मिक कार्य अन्धविश्वाश के साथ जोड़ कर नहीं देखना चाहिए। प्रत्येक हिन्दू धार्मिक कार्य का महत्व अवश्य ही है । उसका अनुसंधान अवश्य ही होना चाहिए। ये हिन्दू धार्मिक कार्य मनुष्य के शरीर और मन से जुड़े हुए हैं। 
"मन चंगा तो कठौती में गंगा" ये कहावत की सार्थकता एक और तरह से भी मिलती है। अगर कोई व्यक्ति की मृत्यु हुई है और उसका पुत्र अपने पिता के चित्त भष्म को गंगा में प्रभाहीत करने में शारीरिक या आर्थिक रूप से संक्षम नहीं है तो उस स्थिति में । उसे अपने पास के किसी भी जलासय में जाकर, उस जलासय को मन में माता गंगा का ही रूप समझ कर चिता भस्म को प्रभाहीत कर सकते है। 
यंहा इसे कहने का तात्पर्य यह था कि धार्मिक अर्थो को अनर्थ की ओर न मोड़े। जो धार्मिक कार्य करने में अगर मनुष्य समर्थ है तो ईश्वर की खुशी के लिए उसे पूर्ण विधि विधान से संपन्न करना चाहिए।

🙏 जय महाकाल🙏