शनिवार, 16 जून 2018

क्यों खुद की गलतियों से ज्यादा दुसरतों की गलती से सिख लेनी चाहिए।

अक्शर हम अपने जीवन में कुछ ना कुछ गलत करते हैं और कसम खाते हैं की ऐसी गलती दुबारा नहीं करेंगे। बेशक एक बार गलती का एहसास होने पर हम उन गलतियों को दुबारा सायद नहीं करते। पर इसे ज्यादा महत्वपूर्ण की ये बात है की हम दुसरों की गलतियों से ज्यादा सीखें। अपनी गलती से सिखना अच्छी बात होती है । पर दूसरों की गलती से सीखना बहुत अच्छी बात होती है। 

          ऐसी बहुतसि गलतियां है जिन्हें एक बार करने के बाद सायद हमे उस गलती को सुधारनेका या तो  फिर उस गलती से सीखने का समय ही नहीं मिल पाता हैं। अतः जो दूसरे लोग है जो बहुत सि गलतियां की और उन्हें अपना जान माला का लूकसांन उठाना पढ़ा हैं। वो लोग अपनी गलतियों को सुधार नहीं पाये हों। उन लोगो से सीखनी चाहिए। वो मनुष्य अवश्य ही बुद्धिमान होगा जो दुसरो की गलतियों से सिख लेता है। कहा जाता है की मुंह का जला झाश भी फूंक फूंक कर पिता है। सायद वो ठीक भी है। पर अगर दुशरे लोग उस जले को देख कर कुछ नहीं सीखते हैं तो वाकेहि वो निर्बुद्धि हैं।
कुछ गलतियां ऐसी होती हैं जिन्हें करने पर मनुष्य जीवित ही नहीं रेह पाता। अतः दूसरों की की गयी गलती से सीखनी चाहिए । इस से स्वयं की जीवन की भी रक्षा होती हैं। एहि सत्य है और नीति हैं।

    पर आज के आधुनिक युग में इस नीतियों का अनुशरण कम ही लोग कर सकते हैं। क्योंकि आज की युवा पीढ़ी पूरी तरह से नसे मे धूत है। उसे ये ज्ञात होने पर की तम्बाकू और सिगरेट के सेवन से कर्कट रोग यानी कैंसर होता है। फिर भी अपनी अदातों को सुधारने की जगह उसे अधिक मात्र मे सेवन करता है। उन्हें इस जिज़ का भी ज्ञान होता है की बहुत से लोग कर्कट रोग से मृत्यु को प्राप्त हो गए पर फिर भी तम्बाकू का सेवन नहीं छोड़ेंगे। ऐसे ही लोगो को निर्बुद्धि कहते है।

गुरुवार, 14 जून 2018

किस प्रकार के कर्मो को स्वयं स्वहस्त से ही करनी चाहिए ?

मनुष्य अपने जीवन में बहुत सा कर्म करता है। कुछ अच्छे होते है और बुरे होते हैं। उन अच्छे और बुरे कर्मो के कारण मनुष्य को उन कर्मो का फल भी अच्छे और बुरे के रूप मे मिलता है। हम बहुत से कर्म स्वयं के लाभ हेतु अन्य किसी से कर्म करवाते है।
पर ऐसे बहुत से कर्म मनुष्य के जीवन मे आते हैं। जिन्हें मनुष्य को स्वयं स्वहस्त से करना चाहिए। जैसे दान, पूजा, सेवा, गुरु की सेवा, यज्ञ आहुति, देव दर्शन, गुरु दर्शन, पूर्वजों को पिंड दान, पितृ ओर मात के मृत देह को मुखाग्नि, तीर्थाटन, अपने बच्चों का पालन, प्रशाशन आदि।
विशेष कर धर्म और आध्यात्मिक कर्मो को स्वयं स्वहस्त से ही करना चाहिए। यदि इस प्रकार के कर्मो को किसी और के हाथो करवाया जाता है तो वो भी उस कर्म का पुण्य का भागी बनजाता है। अतः किये कर्मो का पुण्य घट जाता है। अतः इस प्रकार के कर्म स्वयं स्वहस्त से करना चाहिए अथवा अपनी अर्धांगी य अपने स्व पुत्र से करवाना चाहिए। अगर अपनी अर्धांगिनी या स्वपुत्र से धार्मिक कर्म करवाया जाता है तो अपनी पत्नी या पुत्र को प्राप्त पुण्य देर सवेर स्वयं प्राप्त हो जाती है।
गुरु की सेवा स्वयं स्वहस्त से करने से विशेष कृपा उस सेवक पर होती है। देव दर्शन स्वयं करने से उसका पुण्य भी स्वयं को प्राप्त होता है। यज्ञ आहुति स्वहस्त देने से उस आहुति के देवता को वो आहुति प्राप्त होती और देवता की आयु बढ़ जाती है और उस देवता की आशीर्वाद उस मनुष्य को प्राप्त होता है। अगर इस प्रकार किसी और से करवाया जाये तो वो भी इसका भागी बन जाता है।
अपने संतानों का पालन पोषण स्वयं से अच्छा और कोई नहीं कर सकता। यदि कोई मनुष्य अपने बच्चों का पालन और पोषण किसी और से करवाता है तो ये संभावनाएं अवश्य ही बनी रहती है की उन बच्चों को सही शिक्षा ना मिल सके और सही पोषण भी ना मिल पाये या तो फिर उसे असामाजिक कार्य भी सिखाया जाये।
अपने संतानों और नाति पोतों को भी स्वयं ही लाड़ प्यार करना चाहिए ताकि उनका लगाव उनके माता, पिता, दादा और दादी से बना रहे। अन्यथा अगर कोई ओर उनको लाड प्यार करता है तो उनका लगाब उसे बढ़ जाता है और अपने माता पिता से मोह कम हो जाता है। तब पुत्र और पोत्र अपने माता पिता पितामह और पितामही का श्राद य पिंड नहीं करता और बंचित रखता है।

मंगलवार, 5 जून 2018

अगर किसी भी रोग का निदान औषधी से नहीं होता है तो क्या करें।

सनातन हिन्दू शास्त्रों में इस मृत लोक को दुःखों का घर काहा गया है। क्योंकि सभी प्रकार के कष्टो को एहीं भोगने पड़ते है। चाहे वो मानसिक हो या शारीरिक दुःख हो। इस मृत लोग में ऐसा कोई मनुष्य नहीं है जिसे दुःख नहीं हुआ है या आगे उसे दुःख नहीं होगा। वो मानव हो या महामानव या कोई अवतारी पुरुष। कोई भी दुःखों से इस मृत लोक मे वंचित नहीं रेह पाया है।
शारीरिक पीड़ा भी एक प्रकार का दुःख ही है। इसे आम तोर पर लोग बीमारी या रोग कहते हैं। जब तक मनुष्य इस भौतिक शरीर के साथ इस मृत लोक मे रहेगा । तब तक उसे सभी प्रकार के यातनाओं को भी भोगना पड़ेगा।
ऐसे बहुत से लोग मेने देखा है जो बीमार होने पर डॉक्टर के पास जाते हैं और डॉक्टर उन्हें मेडिसिन्स भी बताता है। वो जब तक मेडिसिन्स खाते रहते हैं तब तक उनका शरीर ठीक रहता है और जब मेडिसिन बंद होता जाता है। फिर से उनका शरीर पूर्व के भांति बीमार या उसे अधिक बीमार हो जाता है। उन्हें कोई उपाय सूझता ही नहीं है । बार बार उन्हें डॉक्टर के पास भागना पड़ता है और डॉक्टर मेडिसिन बदल बदल कर देता है या तो फिर वो मरीज़ डॉक्टर ही बदलता है। अंत मे अगर बीमारी ठीक नही होता तो वो बहुत तनाब में चला जाता है। फिर या तो डॉक्टर को कोसता है या फिर भगवान को।
में उन लोगों को ससे रोग निदान का उपाय आपको स्वतः ही समझ आ जायेगा। जो लोग किसी बीमारी से परेशान हैं। उन्हें ये याद करना होगा की यह बीमारी उनको कब से हुई है और उस समय से अब तक आपकी दिन चर्या में और अपनी जीवन में क्या परिवर्तन हुए हैं पहले के दिनचर्या और जीवन में। क्यों की मनुष्य ऐसे दिनचर्या को अपनी जीवन में ग्रहण कर लेता है जिन से बहुत प्रकार की बीमारियां होने की सम्भावनाएं बढ़ जाती है। 

मनुष्य को स्थान और कार्य विशेष को भी ध्यान मे रखना चाहिए। क्योंकि इनसे भी बीमारियां होने की संभावनाएं होती हैं। 

उदारहरण स्वरूप कुछ लोगो को सर्दी खासी कभी पीछा नहीं छोड़ती । इसका कारण उनकी जीवन शैली ही होती है। ऐसे बहुत से लोगों को रात में दही, छास य
ठंडी चीज़े खाने की आदत होती हैं। जिनसे इन्हें ये बीमारी होती है। आयुर्वेद में कहा गया है की रात्रि में दही खान विष के समान है।
रोग निदान का ये उपाय मेरे स्वानुभूत है।

जय महाकाल