सोमवार, 13 मार्च 2023

क्या आध्यात्मिक दृष्टि से धन संपत्ति कमाना, संचय या भोग करना पाप है ?

जैसे की आज के बड़े बड़े साधु और संन्यासी अपने उपदेशों में ये कह देते हैं की धन संजय करना पाप है और धन एक माया है। यही धन आपको भोग और विलास की ओर ले जायेगा। संसार के भोग को भोगना भी पाप है। जबकि वोही खुद साधु और सन्यासी आज कल करोड़ों की संपति रखते हैं और अपने अनुयायियों से करोड़ों में दान ग्रहण करते है। ये महापाखंड हैं। मुझे याद आता है मिथिला नरेश जनक जी का जिन्हे बड़े बड़े ऋषि मुनि योगी यति और सन्यासी प्रणाम किया करते थे। वो राजाकार्यों में भी मन लगाते थे और आध्यात्मिक कार्यों में भी। वो राजा होकर सभी प्रकार के भोग विलास शुख  भी भोगते और विपुल संपति के स्वामी थे। आज कल के साधु, सन्यासी, यति और योगियों को यह समझना चाहिए की धन संपति और भोग में कोई पाप नहीं है और नाहीं यह मोक्ष प्राप्ति के अवरोधक हैं। पाप तो धन संपति और भोग विलास की कामना में हैं। जनक जी सब ईश्वरीय इच्छा समझ कर कार्य करते थे । जिन्हे वो जानते थे की यह सब एक दिन नष्ट हो जाएगा, ये सब न्नश्वर है। इसी कारण जनक जी को राजऋषी की उपाधि दी गई थी और वो अष्टावक्र जैसे महान ऋषि के शिष्य रहे हैं। इस कहानी का सारांश यह है की भोग में दोष नहीं है, बल्कि भोग भोगने की इच्छा में है। अगर मानव शरीर मिला है तो शरीर को भोजन चाहिए, वस्त्र चाहिए और कामसुख भी चाहिए। पर इसे शरीर की आवश्यकता मानकर और ईश्वर की इच्छा मानकर ही भोगना चाहिए। प्रयत्न करना चाहिए की भोग की इच्छा उत्पन ना हो। शरीर को भूख लगा भोजन कर लिया, प्यास लगी पानी पी लिया, थकान लगी और निद्रा लगी सो गए। कुछ संत बोलेंगे ये तो सहज क्रिया है ना की भोग । भाई ये सब भोग ही है शरीर भोगता है । दोष भोग भोगने की इच्छा और कल्पना में है। क्योंकि अगर कामना उत्पन होती रही और मृत्यु के समय भी कमाना जाग गई तो मोक्ष असंभव हो जायेगा । भोग भोगने की इच्छा मनुष्य को ईश्वरीय भाव की जागृति होने नहीं देगी। इसी कारण जीवन में भोग भोगने की इच्छा को मारने की अभ्यास करते रहन चाहिए । पर जो भोग सहज प्राप्त हो रहा है उसे ईश्वरीय इच्छा समझ कर भोगना चाहिए। 
अगर धन और संपत्ति अर्जन करना या संचय करना पाप है। तो मनुष्य का भविष्य अंधकारमय होगा। सनातन धर्म के शास्त्रों में एक शास्त्र है अर्थशास्त्र । उस शास्त्र का भी कोई प्रयोजन नहीं रहेगा । या तो अर्थशास्त्र का होना गलत है या तो फिर पाखंडी साधु, संत और धर्म गुरु का प्रवचन गलत है। उसी प्रकार कामुक भोग अगर गलत है तो कामसूत्र जैसे शास्त्रों का होना भी गलत है।
अगर कोई मनुष्य धन उपार्जन और संचय नहीं करेगा तो वो भविष्य में होने वाली अनिश्चितता से नही बच पाएगा। इसीलिए अतित्काल में बहुत से राजवंश नष्ट हो गए क्योंकि वो धन संचित नही कर पाए। साधु, सन्यासी और कुछ धर्म गुरु एक उदाहरण देते ही की देखो धन संचित करनेवाला मनुष्य का जीवन मधुमक्खियों के जीवन जैसा जीता है। अंत में कोई मनुष्य आता है मधुमक्खी का छाता तोड़ कर संग्रहित मधु को चुरा ले जाता है। उसी प्रकार संचित धन को भी कोई ले जायेगा। यह तर्क पूर्ण रूप से अतर्किक है। मनुष्य हर मधुमक्खी के छाते से मद चुरा नहीं सकता । मधुमखियां अपना छाता कुछ ऊंचे वृक्ष के डालियों पर भी बनाते है। जो मनुष्य के लिए एक दुर्गम स्थान होता है । जांहासे किसी मनुष्य के लिए मद चुराना एक दुषाध्य सा काम लगता है। इसलिए सभी संचित धन को चुराया नहीं जा सकता। भले संचित मनुष्य उसका भोग ना कर पाए पर उसके परिवार के सदस्य भविष्य में उसका भोग जरूर कर सकेंगे। 
अगर धन संचित करना पाप है तो पुत्र प्राप्ति के लिए विवाह करना भी पाप है। क्योंकि मनुष्य का जीवन भी अनिश्चित है । हो सकत है जो पुत्र धन की प्राप्ति हुई हो वो कम वयश में ही मृत्यु को प्राप्त हो जाए और जो अपने पुत्र पर खर्चा किया वो भी व्यर्थ हो जाए सब। अगर धन संचित करना पाप है तो पढ़ाई लिखाई करना और ज्ञान का संचय करना भी पाप है। क्योंकि की मनुष्य का जीवन अनिश्चित है। सार संचित ज्ञान, विद्या, जानकारी और अनुभव नष्ट हो जायेगा मृत्यु के पश्चात। क्योंकि कोई भी वस्तु का संचय ऐसे देखोगे जीवन में तो व्यर्थ है क्योंकि जीव ही अनिश्चित है।
अतः अनिश्चित्तता से ना डरकर धन संचय करना चाहिए। यही संचित धन बहुत से अनिश्चित विपदा से आपकी बचाएगी।
तो फिर से बहुत से साधु, संत और धर्म गुरु ये बोलेंगे। शास्त्र कभी मिथ्या नहीं बोलते हैं। शास्त्र में ही लिखा है की धन संचित करना पाप है और उसकी प्रामाणिकता पेश करेंगे। मैं भी बोलता हूं शास्त्र झूट नहीं बोलते पर अधूरा शास्त्र पढ़ना भी गलत है। शास्त्र को धर्म और नीति के तराजू में तोलन भी आवश्यक है। शास्त्र को सही से समझना भी आती आवश्यक है। श्रीमद भगवत के प्रथम अध्याय में कृष्ण अर्जुन कहते है । तू युद्ध कर पार्थ। अगर युद्ध में तू विजयी होगा तो तेरी कीर्ति चारों दिशाओं में होगी और युद्ध से प्राप्त धन और राज्यों को तू जीवन भर भोगेगा। अगर युद्ध में तेरी मृत्यु होती है तो वीरगति को प्राप्त होगा स्वर्ग आदिलोक को तू प्राप्त होगा। यहां कृष्ण अर्जुन को भोग भोगने की बात कर रहे है। श्रीमद भागवत गीता परम शास्त्र है। कृष्ण झूट नहीं बोलेंगे। भोग में दोष नहीं है परंतु भोग भोगने की इच्छा में है। जो धर्मयुक्त भोग हो उसे भोगना चाहिए। मनुष्य अपने जीवन में शूख को भी भोगता है और दुःख को भी भोगता है। 
भोग भोगने की कामना में बार बार अवरोध उत्पन करना चाहिए। धन में अधिक कामना है तो जरूरतमंद मनुष्य को दान देना चाहिए। सुंदरता का अधिक कामना हो तो कुरूप मनुष्य को देखना चाहिए । अगर जीवन जीने की इच्छा हो तो समशान भूमि में जलती चिताओं को देखना चाहिए। ऐसे नजरिया या अभ्यासकरते रहने से कामनाएं नष्ट होती हैं। वो मनुष्य सभी वस्तुओं का भोग भोगकर भी योगी बनजाता है। ऐसे राजा जनक थे। जो भोग भोकर भी योगी बने गए थे।

गुरुवार, 9 मार्च 2023

उर्धगमन करना कठिन है और अधोगमन सरल है।

इस भौतिक संसार में ऊपर की तरफ जाना बहुत कठिन है और नीच की तरफ गिरना सरल। ऊपर की तरफ जाने को हम उर्धोगमन और नीचे की तरफ जाने को अधोगमन कहते है। संसार की हर स्थान और कार्य में ये उर्धोगमन और अधोगमन का नियम लागू होता है।
भौतिक क्रीडा जगत में, एक पर्वतारोही को पहाड़ पर चढ़ना अत्यधिक कठिन भरा कार्य है। जबकि उसे नीचे की तरफ गिरने में कोई कठिनाई और प्रयत्न की जरूरत नहीं होती है। गिरते ही प्राण जाने की संभावना भी होती है। 
किसी भी मनुष्य को अपनी प्रतिष्ठा, ख्याति और सम्मान स्थापन करने में बहुतसा समय, परिश्रम और मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। वहीं उसी प्रतिष्ठा, ख्याति और सम्मान को नष्ट करने में कोई कठिनाई, परिश्रम और मुश्किलों का सामना नहीं करना पड़ता है। बस पल भर में नष्ट किए जा सकते है। अगर कोई एक त्रुटिपूर्ण कार्य किए जाए तो।
तपस्वी कई वर्षो की तपस्या से अर्जित शक्ति और पुण्य को संचित करता है। अपनी तपस्या की शक्ति और पुण्य से संसार की कोई भी वस्तु को प्राप्त कर सकता है। तपस्वी को सदैव सावधान रहना चाहिए। ताकि उसके कोई सामान्य पापाचार कार्य होने पर भी उसकी सारी शक्ति, सामर्थ्य और पुण्य क्षीण हो सकते हैं। वर्षो की तपस्या से अर्जित शक्ति, सामर्थ्य और पुण्य क्षणभर में नष्ट हो जा सकते है।
एक ब्रह्मचारी अपने बाल्यकाल से ही ब्रह्मचर्य की दीक्षा लिया हुआ है। अपने बाल्यकाल से ही वो नारी की तरफ दृष्टि नहीं डालता है और वीर्य रक्षा में तत्पर रहता है। योग साधना से अपने वीर्य को संचित करता है और योग अभ्यास से वीर्य को उर्धगामन करता है। पर अचानक स्त्री के संसर्ग में आने पर काम शुख भोगने की इच्छा तीव्र हो जाती है और क्षणिक शूख के लिए मैथुन करता है  और अपनी संचित वीर्य का अधोगमन करता है। इतने दिन की तपस्या को क्षण भर में ही नष्ट कर देता है।
किसी चरित्रवान मनुष्य को चरित्रवान बने रहने में बहुत संयमता का पालन करना पड़ता है और उसी व्यक्ति को चरित्रहीन बनने में समय नहीं लगता। अतः मनुष्य को उर्धगमन करनी चाहिए और क्षणिक शुख से अधोगमन की और अग्रसर नहीं होना चाहिए। अधोगमन एक सहज प्राकृतिक प्रक्रिया है। उर्धगमन करना ही मनुष्य का परम लक्ष्य होना चाहिए। तो ही वो संसार से परे जा सकता है और दुसरो से अलग होकर कुछ बन सकत है। सफल और असफल मनुष्य के बीच यही अंतर होता है। साधारण मनुष्य और ब्रह्मऋषि (योगी) के बीच यही अंतर होता है।

जय महाकाल