जो मनुष्य किसी भी क्षेत्र मे सफल होना चाहते है तो उसे मध्यम मार्ग का अवश्य ही अनुशरण करना चाहिए।
तो हमे यह जानना जरूरी है की क्या है ये माध्यम मार्ग। मध्यम मार्ग का अर्थ है किसी भी चीज़ का ना बहुत ज्यादा करना है और ना ही बहुत कम करना है। मध्यम ही करना है।
मध्यम मार्ग सर्व प्रथम भगवान कृष्ण के द्वार श्रीमद् भागवत गीता में अर्जुन को बताया गया। जिसमें कृष्ण अर्जुन से कहते है। है अर्जुन तो योगी बन, और तु योगआरूढ़ हो। योग उसीका सिद्ध होता है जो माध्यम मार्ग को अपनाता है। अर्थात जो अधिक निद्रा लेता है और जो बिल्कुल निद्रा लेता ही नहीं। जो अधिक भोजन करता है और जो बिल्कुल भोजन नहीं करता। इन दोनों ही तरहा के लोगो का योग कदापि सिद्ध नहीं होते । योगी तो वही बनता है या योग सिद्ध वही बनता है जो पर्याप्त निद्रा लेता है ओर जो पर्याप्त भोजन करता है । ना आवश्यकता से अधिक और नही आवश्यकता से कम। इसे ही मध्यम मार्ग कहते है।
भगवान बुद्ध को भी माध्यम मार्ग के कारण ही महाज्ञान की प्राप्ति हुई थी। एक समय बुद्ध की जीवन में ऐसा आया की बुद्ध भोजन ओर निद्रा का पूरी तरह त्याग कर दिए थे। इस कारण उनका सरीर क्षिण होने लगा और बुद्ध का ज्ञान का प्यास पूरा नहीं हो पाया। उन्हें इसका आभास तब हुआ जब वो वीणा बजा रहे थे। जब वो वीणा का तार भीड़ रहे थे तब वीणा का तार बहुत तन जाता जिसे तार जल्दी है टूट जाती थी और जब तार को थोड़ा ढ़िल देकर बांधा जाता तो उस वीणा का वादन सही से नही होता था। कुछ प्रयत्न के पश्चात तार सही से बंध गयी। जो ना ही बहुत ही ज्यादा भीड्डा गया था और नही बहुत ही ढ़िल दि गयी थी। उस वीणा से मधुर स्वर निकल रहे थे और नही तार जल्दी टूट रही थी। इस तरह बुद्ध को ज्ञान हुआ की साधना मार्ग की सफलता माध्यम मार्ग के अनुशरण से ही है।
तो मनुष्य को अगर किसी भी क्षेत्र मे सफल होना चाहता है तो अवश्य ही उसे माध्यम मार्ग का अनुशरण करना चाहिए।
एक और कहानी से भी मध्यम मार्ग की सिख मिलती है। जिस मे दो लकड हरा रहते है । वो दोनो मित्र साथ रहते है और साथ ही जंगल मे लकडिया काटते हैं। एक लकड़हारा सुबह से साम तक बिना रुके लकड़ी काटता है और दूसरा लकड़हारा एक वृक्ष काटने के बाद विश्राम करता है। साथ ही साथ अपनी कुल्हाड़ी की धार को भी तेज़ करता था। अंत मे देखने पर ये पता चलता है की दूसरे लकड़हरा ने पहले वाले से ज्यादा लकड़ी काटि है। जब हम किसी काम को लगातार करते हैं। उसे करते करते शरीर थक जाता है। जिसे कार्य करने की क्षमता पर पडता है। अतः किसी भी कार्य को करने में माध्यम मार्ग का अनुशरण ही उचित है।
शनिवार, 20 मई 2017
मध्यम मार्ग क्या है और मध्यम मार्ग का ही अनुशरण क्यों करना चाहिए
शनिवार, 13 मई 2017
मनुष्य को कभी भी अत्यधिक कठोर क्यों नहीं होना चाहिए ?
Pनीति शास्त्र के नियमों के अनुसार जो अत्यधिक कठोर होता है । उसे एक दिन जरूर टूटना पड़ता है और उसकी आयु भी बहुत कम होती है। ये भी प्रकृति का एक तरह का नियम है। जीभ प्रत्येक मनुष्यों में जन्म से होता है और दांत उसके बाद आता है। पर जीभ मनुष्य के मृत्यु तक उसके साथ रहता है और दांत कुछ समय के पश्चात झड़ जाते है। अतः मनुष्य को कभी भी अधिक कठोर नहीं बनना चाहिए।
दांत का टूटने का कारण उसके कठोर स्वभाव है और जीभ की आयु अधिक होने की कारण उसका लचीला स्वभाव है। मनुष्य को सदेब जगह, माहोल और आसपास के लोगो के अनुशार अपने स्वभाव मे लचीलापन लाना चाहिए। वैज्ञानिक सिद्धान्त के अनुशार वही जिव इस पृथ्वी पर जीवित रेह पाये जो पर्यावरण के साथ लचीला बन पाये अर्थात परिवर्तित हो पाये। बकि के जिब विलुप्त हो गए जो पर्यावरण के साथ बदल ना सके।
जीवन के नियम भी कुछ इसी प्रकार के हैं । समुद्र में जब कोई तैराकी तैरता है । वो समुद्र के लहरो के साथ तैरता है तो वो जीवत बचता है और अगर लहरो के विपरीत दिशा में अगर तैहरता है तो अवश्य ही उसे मृत्यु का सामना करना पड़ेगा। नाविक हमेसा लहरो की दिशा मे ही नाव को चलाता है अन्यथा वो अपने लक्ष्य तक कभी नहीं पहुंच सकता।
एक उदाहरण ओर भी है। जल का स्वभाव भी लचीला होता है । इस कारण वो किसी भी मार्ग से बहने का रास्ता ढूंढने में सफल हो जाता है।
पानी जब लचीला होता है उसे काटा या तोड़ा नहीं जा सकता । पर वही पानी जब कठोर और ठोश बन जाता है। तब उसे तोड़ना या काटना बहुत ही सरल बन जाता है। अतः मनुष्य को सदैब सरल और लचीला होना चाहिए।
हरी औम
शुक्रवार, 12 मई 2017
मनुष्य को कभी भी अति सरल क्यों नहीं होनी चाहिए ?
चाणक्य का एक सुंदर कहावत सुनने या जानने में मिलता है । जिसमें चाणक्य केहता है की सीधा वृक्ष को लकड़हारा जल्दी काटने को चाहता है और टेढ़े मेढ़े वृक्ष को वो ऐसे ही छोड़ देता है ये सोच कर की वो उसे बाद मे काटेगा और सोच समझकर काटेगा। मनुष्य के इस समाज में भी कुछ ऐसे ही नियम लागू होते है। कोई भी मनुष्य किसी भी सक्त और कटु वाक्य बोलने वाले व्यक्ति से कभी भी नहीं उलझता है क्यों की उसे किसी तरह अपने बातो में फ़साना और उसे धोका देना कभी सरल नहीं होगा। उसे कुछ बोलने के बदले स्वयं की भी कुछ हानि हो सकती है। सादे और सरल स्वभाव के व्यक्ति को अपने बातो मे फ़साना और उसे किसी प्रकार धोका देना अत्यंत सरल होता है।
ये नियम सिर्फ मनुष्य समाज मे ही लागू होता है ऐसा नहीं है। ये तो प्रकृति का नियम है। आप निश्चित ही जानते होंगे की कांटो से भरा फूल को तोड़ना सरल नहीं है और उसे कोई तोड़ना चाहता भी नहीं क्योंकि कोई कांटो से उलझना चाहता ही नहीं।
दूसरा भी एक इस नियम का प्रमाण है की कोई भी व्यक्ति विषधर और हींशक जीवों से स्वयं को दूर ही रखता है और सरल स्वभाव के जीवों को मारकर खाता है। बलि हमेशा बकरे या भेड़ो की ही चढ़ति है नाकि शेर, वाघ या चीताह की।
भले ही मनुष्य कितना भी बुद्धिमान हो पर वो किसिना किसी बात पर दुशरे मनुष्य से लड़ता जरूर है। ये साबित करता है की मनुष्य भी एक तरह का पशु ही है। कभी भी किसी भी समय शत्रु बना लेता है ।अपने शत्रु को परास्त करने के लिए उसे हमेशा सतर्क रहना चाहिए। अपने सरलता का हमेशा प्रदर्शन नहीं करना चाहिए। शदैब वार्तालाप मे गंभीर भाव लान अति आवश्यक होता है।
धन्यवाद