सोमवार, 30 जून 2025

क्या भक्ति मार्ग ही ईश्वर प्राप्ति के लिए सर्वोच्च मार्ग है। ज्ञान मार्ग, कर्म मार्ग और संन्यास आदि व्यर्थ मार्ग है ?

मैं ऐसे ही कुछ लोगों के समूहों में था और आध्यात्मिक चर्चा चल रहा था। जिसमें सभी लोग अपनी अपनी आध्यामिक मार्ग के बारे में बता रहे थे। सहसा एक युवा व्यक्ति उठा उस लोगों की समूह से और बोलने लगा कि भक्ति मार्ग ही श्रेष्ठ मार्ग है और कृष्ण नाम ही सर्वोच्च नाम है। उस व्यक्ति ने थोड़ी सी भी हिच किचाहट नहीं दिखाई की इस समूह में इतने वयस्क और ज्ञानी गुणी लोग बैठे हुए हैं और थोड़ा में उनकी भी तर्क सुन लूँ। सहसा मेरे मन में प्रश्न उठने लगा कि इस व्यक्ति से दो चार आध्यात्मिक प्रश्न लूं। फिर भी मैने स्वयं को नियंत्रित रखा। परंतु मेरे मन में कुछ समय के पश्चात तेज आंधी सी उठने लगी । जैसे कि स्वयं भगवान कृष्ण मेरे अन्तर मन में मुझमें उत्साह भर रहे हों कि इसके अहंकार को तोड़ दो। अनजाने में ही मेरे मुंह से प्रश्न निकल गया कि अगर भक्ति ही सर्वोच्च मार्ग है । तो भगवान कृष्ण ने श्रीमद भागवत गीता में केवल भक्ति का ही उपदेश क्यों नहीं दिया।  अन्य मार्ग का उपदेश व्यर्थ में ही क्यों बता रहे थे अर्जुन को। इस प्रकार अन्य मार्ग का उपदेश करने से अनुयायियों में भ्रम उत्पन होता है। फिर कुछ समय के बात पता चल की अभी अभी उस युवा पीढ़ी का लड़के ने एक प्रसिद्ध वैष्णव सम्प्रदाय से दिक्षा ग्रहण किया है । मैने फिर से पूछ लिया कि आप तो भक्ति कर रहे हैं क्या आपने भगवान कृष्ण के दर्शन हुए है। कृपया आप हमे बताएं। वो युवा व्यक्ति ने पहला प्रश्न का कुछ भदा सा उत्तर दिया । जो मुझे क्या उस सभा समूह में उपस्थित किसी भी व्यक्ति को नहीं समझ आया। दूसरे प्रश्न का उत्तर उस युवा व्यक्ति ने मुझे ना में उत्तर दिया और कहा नहीं अभी तक उसे भगवान कृष्ण का दर्शन नहीं हुए हैं। फिर मैंने उसे कहा जब तुम्हे ईश्वर के दर्शन ही नहीं हुए है तो इस प्रकार का प्रवचन देना, इस प्रकार का पाखंड रचना आपको शोभा नहीं देता है। क्योंकि अमृत का स्वाद वोही बता सकता है । जिसने अमृत का सेवन किया हुआ हो। भक्ति भी कुछ ऐसे ही अमृत का नाम है। भक्ति तो आध्यात्मिकता रूपी सीढ़ी की पहली कदम है। भक्ति मार्ग में पहले बाहरी रूप से हरि नाम कीर्तन, हरि भजन और हरि नाम चलता है। ये बाहरी भक्ति है। फिर धीरे धीरे मन एकाग्र होता है भगवान के स्वरूप में। फिर मन का चीत शांत होता है भगवान के रूप, गुण, माधुर्य और प्रेम में। जब भगवान से मन जुड़ता है तब भाव का जन्म होता है। जैसे जैसे भाव प्रगाढ़ होता है । वैसे वैसे रस प्रकट होता है। जैसे जैसे रस प्रकट होगा वैसे वैसे भगवान की कृपा से दिव्य ज्ञान प्रकट होता है। भक्त को यत्र तत्र सर्वत्र भगवान का दर्शन होता है। भक्ति रस चखने पर भी भक्त की सांसारिक दुःख, पीड़ा, दर्द, जलन, चिंता, भय, चंचलता, लोभ, मोह, शुद्ध अशुद्ध के भाव, पवित्र अपवित्रता, ऊंच नीच, कर्म बंधन, ईर्षा, सांसारिक बंधन आदि के भाव समाप्त नहीं होते हैं। ये सब नष्ट दिव्य ज्ञान के प्रकट होने के पश्चात ही होते हैं। अगर किस भक्त ने सिर्फ ईश्वरीय भाव रस का सेवन किया है तो भी उस भक्त का उद्धार नहीं हो सकता । क्योंकि भक्त जब तक सांसारिक बंधन लोभ, मोह, ईर्षा, जलन, भय, शुद्ध अशुद्ध, पवित्र अपवित्रता आदि से मुक्त नहीं होगा । तब तक उस भक्त की मुक्ति असम्भव ही हो जाता है। उस घृत दीपक का कोई अर्थ नहीं है जो प्रकाशवान ना हो । अगर भक्ति से दिव्य ज्ञान प्राप्त नहीं होगा तो पूरा भक्ति ही व्यर्थ चली जाएगी। इसमें कोई संदेह नहीं है कि भक्ति भी एक उत्तम मार्ग है । ईश्वर प्राप्ति में लेकिन भक्ति ही सर्वोतम मार्ग है। ये तर्क संगत नहीं है। सभी जीव और सभी मनुष्य भक्ति नहीं कर सकते क्योंकि सभी का गुण स्वभाव भी अलग अलग ही होता है। 
कोई भक्त अपने पांच उंगलियों में कौन सी उंगली महत्व पूर्ण है या मनुष्य शरीर का कौन सा अंग महत्वपूर्ण है। ये नहीं बता सकता । उसी तरह संसार में कोई भी जीव ये नहीं बता सकता कि ईश्वर प्राप्ति में कौनसा मार्ग सर्वोत्तम है। 

जय जगन्नाथ🙏🙏🙏🙏

शनिवार, 21 दिसंबर 2024

मनुष्य का कर्म ही मनुष्य का भविष्य का शुख शांती निर्धारित करता है।

प्रत्येक मनुष्य का अपना पूर्व और वर्तमान कर्म ही भविष्य का शूख दुःख का निर्णय करता है। मेरे बात को सच्च मानो तो मनुष्य का पाप कर्म उस मनुष्य से बहुत क्रूर प्रतिशोध लेता है। एक दिन में यूट्यूब पर विडियोज़ स्क्रॉल कर रहा था। तो मेरी नजर में एक वीडियो दिखा । जिसमें दो जोड़े (पति और पत्नी) अपने नवजात शिशु को उठाकर अपने मां बाप के पास दे आते है और ऐसा बोलते है कि ये बच्चा ये आपके वजह से हुआ है तो आप ही लोग संभालों। जब मैंने पूरा वीडियो को समझने का प्रयत्न किया तो मुझे ये समझ आया कि ये वीडियो इस विषय पर है कि। आज की युवा पीढ़ी बच्चे पैदा नहीं करना चाहते हैं और उनकी जिम्मेदारियां भी नहीं उठाना चाहते हैं। उस जोड़े के जो माँ बाप थे उन्होंने उनसे वंश बढ़ाने की बात की होगी और उन पर दबाव बनाया होगा। मां बाप को उनके बच्चे से ज्यादा पोता और पोती से प्यार होता है। वो कहते हैं ना मूल धन से ज्यादा शुद का धन प्यार होता है। लेकिन आज की युवा पीढ़ी को शादी तो करनी है पर बच्चे पैदा नहीं करनी है। आज की युवा पीढ़ी ये विचार रखती है कि बच्चे की जिम्मेदारी बहुत है। पढ़ना लिखना बहुत खर्चा वाला काम है। आज के समय में पति पत्नी दोनों ही नौकरी करती हैं और दोनों ही परिवार चलाती हैं। किस बात का खर्चा बढ़ जाएगा ? अगर में 20 से 30 साल पीछे जाकर लोगों को देखता हूं तो उस समय लोग बहुत कमी में रहते थे । परिवार में एक आदमी रोजगार करता था पूरा परिवार खाता था और बच्चे पढ़ाई करते थे। आज परिवार में रोजगार और नौकरी करने वालों की संख्या बढ़ गई है और पहले से ज्यादा सुविधा और सहूलियत उपलब्ध हैं। आज की युवा पीढ़ि सिर्फ शादी करना चाहती है ताकि सिर्फ अपनी शारीरिक आवश्यकता को पूरी कर सके । लेकिन संसार की नियम है कि शादी एक नए जीवन को उत्पन करने के लिए किया जाता है । स्त्री और पुरुष इसलिए शादी करते हैं कि पृथ्वी पर जीवन चक्र चलता रहे। शारीरिक आवश्यकता तो वैश्या के पास जाकर भी पूरी की जा सकती है। लेकिन आज की युवा पीढ़ी ये तर्क भी देता है कि क्या शादी सिर्फ बच्चे पैदा करने के लिया किया जाता है। तो मेरा मानना है, हां विवाह करना ही संसार में जीवन चक्र चलाने का पहला लक्ष है। सनातन हिंदु शास्त्र कहते हैं। अगर कोई मनुष्य निःसंतान होकर मरता है तो उसकी जीव आत्म की कभी भी सद्गति नहीं हो पाएगी । क्योंकि परिवार में एक सन्तान होने से मनुष्य को बहुत सारे ऋण से मुक्ति मिल जाती है। जैसे कि देव ऋण, पितृ ऋण, पृथ्वी ऋण आदि और अगर वो सन्तान धार्मिक प्रवृति का होता है और धर्म कर्म करता है तो उनकी सात पीढ़ियों की सद्गति और उधार हो जाता है। देवता जन्म हुए बच्चे से हवन और तर्पण की इच्छा रखते हैं, पितृ लोक में पितृ अपने गोत्र और कुल में जन्मे संतान से पिंड और तर्पण की इच्छा रखते है। जिससे उनकी जीव आत्म उर्ध्व लोक और उर्ध्व योनि में जन्म लाभ करते हैं। जन्म हुए संतान से धरती माता ये अपेक्षा करती है कि वह संतान इस पृथ्वी लोक में धर्म की स्थापन करते रहे और जीवन चक्र सुगमता से चलती रहे। मनुष्य को ये जरूर सोचना चाहिए कि उसके मृत्यु से पहले ये सभी प्रकार के ऋण से मुक्त हो जाए । अन्यथा देव, पितृ , पृथ्वी उस मनुष्य को श्राप देते है। पृथ्वी लोक में शांति नहीं मिलती है। वृद्ध अवस्था में भी पश्चाताप होगी । अभी युवा है, भोग भोगने की शक्ति है, बुद्धिमानी से अपने विरोधी से तर्क वितर्क भी कर लेते है, आप अपने मर्जी के मालिक हो, ज्ञानी गुणियों की बात चुभेगी। मगर जब ये शरीर वृद्ध होगा, शक्तिहीन हो जाएगा, पत्नी या पतीका मृत्यु हो जाएगा, जब अकेलापन कटेगा । तभी बिस्तर पर पड़े पड़े ये सोचना की एक बच्चा पैदा कर लेता तो शायद वृद्ध अवस्था में भी उसे देखते देखते खुश होता और वृद्ध अवस्था भी सुगमता से गुजर जाता। अगर वो सुपुत्र या सुपुत्री होती तो मेरा जन्म सार्थक हो जाता । मेरे जीवन का लक्ष वोही होता और शायद मेरे बुढ़ापे की लाठी बनता। मैं सारे ऋण से मुक्त ही जाता ।
मुझे ये मानने में भी कोई शंका या लज्जा नहीं है कि जिन लोगों ने बच्चे को जन्म दिया है । उनकी बुढ़ापा भी अच्छी नहीं गुजरी है। बच्चों ने उनके वृद्ध माँ बाप को मरने के लिए रस्ते पर, आश्रम में या तो फिर गांव में छोड़कर विदेशों में अपने पत्नी और बच्चों के साथ रह रहे हैं। उनका भी बहुत बुरा समय आएगा। क्योंकि ऐसे बच्चों के मां बाप ने तो अपने जीवन के अच्छे कर्म किए कि अपने बच्चे को पालन और शिक्षित बनाया । लेकिन बच्चा सिर्फ अपनी स्वार्थ और भोग के लिए माँ बाप को छोड़कर दूर रहते हैं तो वह कर्म भी उन बच्चों को उनके वृद्ध अवस्था में भोगना पड़ेगा। मैं तो कहता हूं उसे भी बुरा जितने उसके माँ बाप ने अपने बुढ़ापे में भुगता है। कर्म तो तभी प्रतिशोध लेता है । जब पाप कर्मों के कर्ता शक्तिहीन हो, सामर्थ्य हीन हो, दिन हीन की अवस्था हो, तभी मनुष्य के अतीत के कर्म सामने आते हैं। फिर भी वह मनुष्य अपने अतीत के पाप कर्म को स्वीकार नहीं करता और ईश्वर को ऐसे दुःखी जीवन के लिए श्रेय देता है। वो नहीं जानता कि ऐसे दुःख और शोक युक्त जीवन का रचयिता वो स्वयं है। वो कहते हैं ना जैसी करनी वैसी भरनी। ये सत्य है सत्य है सत्य है। आज कल की युवा पीढ़ी बहुत तर्कवादी है और कुछ ज्यादा ही शिक्षित है। परंतु इन सब पुस्तकी ज्ञान को नहीं मानती । आज के भारतीय युवा जितनी तकनीकी शिक्षा में आगे जा रहे हैं । उतनी ही नीति, नैतिक और संस्कार से उतना ही पीछे जा रहे हैं। एक अच्छा समाज गठन करने में तकनीकी ज्ञान का होना जितना आवश्यक है। उतना ही आवश्यक नीति, नैतिक और संस्कार रूपी ज्ञान का होना। प्राचीन काल के गुरुकुल में तकनीकी ज्ञान जैसे आयुर्वेद, ज्योतिष, खेती, रसायन, युद्ध शास्त्र आदि पढ़ाया जाता था और उसी के साथ नीति शास्त्र, नैतिकता और संस्कार वर्धक कहानी भी पढ़ाई जाती थी। आज के विद्यालय और महाविद्यालयों में सिर्फ तकनीकी शिक्षा पर ही जोर दिया जाता है। 
जैसे कि मैने ऊपर बताया कि में यूट्यूब पर वीडियो स्क्रॉल कर रहा था और एक वीडियो पर नजर पड़ी। उसी वीडियो के एक कॉमेंट को में पढ़ रहा था तो देखा कि । एक विवाहिता शिक्षित स्त्री ने ये वीडियो देखकर ये लिखा था कि "मैं अपने बच्चे को मेरे बुढ़े सास ससुर को छूने तक नहीं देती हूं और उनको मेरे बच्चे से दूर रखती हूं "
मुझे एक और पाप की गंध आने लगी। मैने उसे उसके कमेंट पर लिखा कि "एक माँ बाप की सबसे बड़ी खुशी उसके बच्चे ही होते हैं और उनसे बढ़कर उनकी खुशी उनके नाती पोते होते हैं। जिनके सहारे वह अपने बच्चे की बच्चपन जो उनके युवा अवस्था में देखा था। उसे याद करते हैं और खुश होते हैं। ये खुशी और शुकून आप उन से छीन रही हो। जिस प्रकार मूलधन से ज्यादा ऋण धन प्यार होता है। उसी तरह माँ बाप को अपने बच्चे से ज्यादा नाती पोते प्यारे होते हैं। ये आपका कर्म पाप से भरा हुआ है"
तब उस स्त्री ने मेरे कमेंट पर ये लिखा कि "मेरा बच्चा छोटा है और उसकी दादा दादी की उम्र ज्यादा है तो मुझे डर लगता है। जब मेरा बच्चा बड़ा हो जाएगा तो तब उनके साथ रहेगा। लेकिन अभी नहीं"
फिर मैंने उसके कमेंट पर लिखा कि "अगर आपको भय है कि आपकी सास ससुर की उम्र ज्यादा है और वह आपके बच्चे को संभाल नहीं पाएंगे तो आप भी उसी समय उनके साथ रहिए। एक नियत समय पर अपने बच्चे को उसके दादा दादी से मिलने का समय निर्धारित करिए और आप भी साथ रहिए। आपकी बूढ़े सास ससुर को अपने नाती पोतों की बच्चपन ही तो देखनी है। युवा होकर देखने में उनको क्या आनंद आएगा और शायद आपके बच्चे को युवा होने तक शायद वह जीवित भी ना हो। जैसे कि आपने बताया कि उनकी उम्र बहुत ज्यादा है। याद रखो अगर आपकी वृद्ध सास ससुर या आप ही की माँ बाप की अपने नाते पोते से खेलने, देखने या रहने की इच्छा पूरी नहीं हुई तो ये पाप आपको लगेगा। कर्म बहुत क्रूर है। जब आप बूढ़े होंगे तब आपका बच्चा आपके साथ भी यही करेगा याद रखना। अभी आपके पास पैसा, धन, शक्ति, ऐश्वर्य, निरोगी शरीर सब है। लेकिन जब ईश्वर प्रतिशोध लेगा ना। फिर अपनी पाप को अस्वीकार मत करना। क्योंकि समय लौट कर आता है। मेरे दो बच्चे हैं और मैंने मेरे दोनों बच्चों को सबसे ज्यादा समय उनके दादा दादी के साथ रहने का मौका देता हूं। मेरी इच्छा है वह उनके दादा दादी और नाना नानी के साथ रहे और उनके जीवन का अनुभव वो अपने अंदर उतारे। आप और अपने पति की आप अपनी सास ससुर की जगह रखके देखें। तब आपको आपका कलेजा फटते हुए लगेगा। जिस बच्चे के बारे में आप इतना सोच रहे हो । वोही आपका लड़का आपके साथ करेगा । यही समय का फेर है। जो कहीं जाता नहीं है । सिर्फ लौटकर आता है। उस सुख दुःख के परिणाम को भोगना पड़ेगा जो अपने अतीत में किया था "
मेरा इस कमेंट के बाद उस स्त्री का फिर कोई कमेंट नहीं आया। मैने भगवान से प्रार्थना किया कि है भगवान मैने उसे समझाने की बहुत सी प्रयत्न किए । आशा करता हूं कि उसे समझा आई होगी। 
लोक के पास जब पैसा, पावर, शक्ति, सामर्थ्य और समय होता है तो लोक पाप कर्म करने से नहीं डरते हैं। लेकिन वह भूल जाते हैं कि भविष्य अंधकार मय है। वो जैसे सोचते है । भविष्य वैसा नहीं होगा।  समय, कर्म और ईश्वर गिन गिन कर प्रतिशोध लेते हैं । जो भी माता पिता आज वृद्ध आश्रम में रह रहे हैं, सड़क पर भीख मांग रहे हैं, मंदिरों में भीख मांग रहे हैं या किसी और दयनीय स्थिति में हैं। मुझे ये बोलने में कोई हीच खींचा हट बिल्कुल नहीं हो रही हैं। क्योंकि की इन्होंने भी कहीं ना कहीं अतीत में ऐसे ही कुछ पाप किए होंगे।
 एक मेरे रिश्तेदार की कथा भी कुछ ऐसी ही है। जमींदार और धनी परिवार की बहु थी। सास ससुर का आदर सम्मान नहीं करती थी और पति के पैसे का जोर बहुत था। सास ससुर बीमार हुए घसीट घसीट घसीट कर चलते थे। ये अपने सास ससुर से उनकी वृद्ध अवस्था में घृणा करती थी और नहीं सेवा करती थी और नहीं खाने को खाना देती थी। सास ससुर का स्वर्गवास हो गया। कुछ वर्ष बाद पुत्र का विवाह हुआ और विलायत में पढ़ी लिखी शिक्षित बहु आई। वो बहु को गांव की जीवन शैली अच्छी नहीं लगी और वह विदेश चली गई। उसके पीछे पीछे बेटा भी विदेश में स्थाई हो गया। कुछ दिनों बात उसके पति की हृदय घात से मृत्यु हो गई। उस स्त्री के संबंधियों और गांव वालों ने उसके जमीन जायदाद पैसा सब कुछ जोर जबरदस्ती हथिया लिया और वह पागल हो गई थी। उसे गांव के लोग डंडे से मारते थे और मैने अपने आंखों से देखा है कि बच्चे उसके पीछे पड़ जाते थे। उसके पीछे से दिवाली के फटाके लगा देते थे और पत्थर भी मारते थे। सिर्फ बच्चे क्या बड़े लोग भी उसे पता नहीं क्यों दया नहीं दिखाते थे। वह गांव के पास एक नदी था वहां वो बैठी रहती थी। पागल होने पर भी उसे वोही बात याद थी कि वो अपने सास ससुर से कैसे लड़ती थी। अपने बच्चे की याद आने पर जोर जोर से रोती थी। मुझे लगा था कि वो कुछ दिन में शायद प्राण त्याग देगी और मर जाएगी नहीं। पागल होने के पश्चात शायद वह 25 से 30 साल तक जिंदा रहीं और शायद अपने पापों का दंड भी वह यही जन्म में भोग रही थी । फिर एक दिन उस नदी में बाढ़ के आने से उसकी मृत्यु पानी में डूबकर हो गई थी। उसके मृत्य के पश्चात उसका बेटा और बहु को मृत्यु का समाचार दे दिया गया था। परंतु वह बेटा बहु और नाती कोई नहीं आया उसके अंतिम संस्कार को। उसके अंतिम संस्कार भी अच्छे से नहीं हुआ था शायद। सिर्फ उसके शरीर को अग्नि में जला दिया गया था। गांव वाले तो ऐसा भी बोलते हैं कि जब उस स्त्री का शरीर जलाया जा रहा था तो तब जोर की आंधी वर्षा आ गई थी। जिस से उस स्त्री का शरीर अर्ध जलासा रह गया था। आधे जले हुए शरीर को गांव के लोगों ने केरोसिन डालकर पूरी तरह जलाने का प्रयत्न तो किया था। पर भारी बारिश के कारण वह संभव नहीं हो पाया। उसके अंतिम संस्कार भी अच्छे सा नहीं हुआ था। गांव के लोग कई सालों तक उसी नदी के किनारे उसके प्रेत को देखने का दवा करते थे। कुछ बोलते थे कि वो स्त्री प्रेत योनि में हैं और अपनी मुक्ति को तरश रही है। 
अपने वर्तमान कर्म अच्छे करो, अतीत के पाप कर्मों को स्वीकार लो और प्राश्चित करो। अच्छे कर्म से ही अच्छे भविष्य का निर्माण होगा। 
धन्यवाद 

शुक्रवार, 8 सितंबर 2023

आवाहन मंत्र से पहले और विसर्जन मंत्र के बाद मूर्तियों का कोई महत्व नहीं रहता । अतः विसर्जन करना अनिवार्य ही होता है।

आज के युग में हिंदू भावनाओं के साथ खेलना बहुत ही सरल है। क्योंकि खुद हिंदू ही अज्ञानता के साथ जी रहा है और बिना अपना ही हिंदू सनातनी शास्त्र पढ़े समझे अपने ही धर्म पर उंगली उठा रहा है। हिंदुओं को समझना चाहिए की उन्हें अपने ही शास्त्रों को अच्छे से पढ़े और समझे।

वृक्ष के नीचे पड़े हुए कुछ देवी देवताओं के फोटो और मूर्तियां और गणपति के विसर्जन के पश्चात जो मूर्तियां समुद्र और नदियों में पूरी तरह से घुलती नहीं हैं तो उसे दूसरे धर्म के लोग और खुद पढ़े लिखे हिंदू जो खुद के शास्त्र भी नहीं पढ़े है  ये देखकर बोलते है पूजा के टाइम गणपति बापा मौर्य, जय श्री राम और जय माता दी करते है और देवी देवताओं की मूर्तियों को, चित्रों को और यंत्रों को यंहा वहां फेक देते हैं । जिनसे उनका अपमान होता है। 

देखो शास्त्रों के अनुसार मूर्तियों का महत्व तब आता हैं । जब उनमें आवाहन मंत्र, प्राण संचरण मंत्र, पंच प्राण आदि दिए जाते है और मंत्रों से मूर्तियों को भावित करते हैं। तब मूर्ति, चित्र और यंत्र जागृत होते हैं और पूजा के पश्चात उन्हें विसर्जन आदि मंत्रों से देवता को उनके स्वस्थान को आदर और भक्ति सहित भेज दिया जाता है। उसके पश्चात उस मूर्ति में कोई देवता नहीं रहता हैं। उस मूर्तियों को नदी, तलाब और समुद्र आदि जलाशयों में प्रवाहित कर दिया जाता है। इसे देवता और देवी का कोई असमान नहीं होता । जो मूर्तियां या चित्र मिट्टी, लकड़ी और कागज़ आदि से बनते है। अर्थात जो लंबे समय तक नहीं रखे जा सकते उन्हें पार्थिव मूर्तियां कहा जाता है और उन्हें विसर्जन करना अनिवार्य है। क्योंकि ऐसी मूर्तियां धीरे धीरे नष्ट खंडित होने लगती है समय के अंतराल में । जो मूर्तियां पत्थर और धातुओं से बनती हैं। जिन्हे मंदिर और गृह में रखे जाते हैं। उनमें सिर्फ प्राण प्रतिष्ठा मंत्र ही पढ़े जाते हैं। अगर किसी तरह से ऐसे मूर्तियां चित्र या यंत्र खंडित होते है तो उन्हें भी विसर्जन करना अनिवार्य हो जाता है। आजकल कुछ ऐसे लोग है जो नदी और जलाशयों में मूर्ति प्रवाहित करने से मना करते हैं ताकि जलाशयों में प्रदूषण ना हो। भले ही १०० कंपनियों के ड्रेनेज लाइन समुद्र और नदियों में छोड़ तो उसे पॉल्यूशन नहीं होता है। पॉल्यूशन सिर्फ नदियों, तलाब और समुद्र में सिर्फ मूर्ति विसर्जन और फुल पते डालने से होता है। इसी कारण लोग देवी देवताओं के खंडित मूर्ति और चित्रों को पेड़ों के नीचे छोड़ जाते हैं। मूर्ति आजकल प्लास्टर ऑफ पेरिस से बनती है। जिसे मूर्तियां पानी में सरलता से घुलती नहीं हैं और जलाशयों में प्रदूषण होता है। पर इस से विसर्जन के पश्चात देवी देवताओं का कोई अनादर नही होता है। गणेश चतुर्थी आदि त्योहारों में मूर्तियां मिटी आदि से ही बनाना चाहिए।  

बुधवार, 6 सितंबर 2023

क्या प्याज और लहसुन मांसाहार है सनातन धर्म है?

 क्या प्याज और लहसुन मांसाहार है? हमारे सनातन धर्म में बहुत से कहानियां हैं जो प्याज और लहसुन से जोड़ दिया गया है। इसकी वास्तिविकता के बारे में जानेंगे। जितने भी वैष्णव संप्रदाय के लोग है वो प्याज, लहसुन और मसूर की दालों का सेवन नहीं करते क्योंकि की वो इसे मांशहार मानते है। मांसाहार भोजन को आमिश और शाकाहार भोजन को निरामिष भी कहा जाता है। इस दो प्रकार के भोजन के अलावा दो और प्रकार के भोजन भी है तामसिक और सात्विक भोजन। मांसाहार भोजन को हम तामसिक भोजन कह सकते हैं। पर प्याज लहसुन जिस भोजन में उपयोग हुआ हो उसे मांसहार भोजन नहीं कह सकते जब तक उसमे किसी जीव का मांस उपयोग नहीं हुआ हो। सभी मांसहार भोजन तामसिक है। पर सभी तामसिक भोजन मांसहार नहीं है। ऐसा क्यों, प्याज, लहसुन और मसूर की दाल खाने से मनुष्य में गर्मी पढ़ती है और तामसिक प्रवृति का उदय होता है। जो सात्विक व्रत या साधना करते हैं। ये उनके साधना मार्ग में रुकावट उत्पन करेगा और उलझा देगा। अतः इसी कारण वैष्णव और सात्विक मार्ग में ऐसे भोजनों का सेवन नहीं करते है। प्याज, लहसुन और मसूर ये पौधों से ही प्राप्त होते हैं। इसी कारण इसे बहुत से लोककथाओं को जोड़ दिया गया है। मेरी मम्मी से भी मेने एक ऐसे ही कहानी सुनी थी। जिसमें एक ऋषि था जो गलती से एक राक्षसी से शादी कर लिए । उस ऋषि का एक गाय था। तो वो ऋषि एक दिन स्नान करने गया था और वो राक्षसी को मांस खाने का मन हुआ तो उसने वो गाय को मारकर उस के मांस को पक्का लिया और खा गई। उस गाय का सिर्फ चमड़ा बचा था । उसका पति वो चमड़ा देखकर श्राप दे देगा जानकरके उसने वो चमड़ा को जमीन में गाढ़ देता है और पति को बोलती है की गाय कहीं खो गई है। कुछ दिन के पश्चात उस चमड़े से उसकी बाहर की परद से लहसुन का पौधा और अंदर के रक्तवाले परद से प्याज का पौधा जन्म लेता है। तो वो ऋषि को पता चलता है तो वो अपने पत्नी को श्राप देकर मार डालती है। ऐसी अनेकों कहानी है जो प्याज और लहसुन से जुड़ी हुई है। साधारण लोगों को समझाने के लिए ये कहानी बनाई।गई थी क्योंकि चमड़े से पौधों का जन्म संभव नहीं हो सकता। प्रॉब्लम प्याज लहसुन और मसूर के गुण स्वभाव से है। प्याज और लहसुन आयुर्वेद के अनुसार शरीर में ऊष्मा वीर्य बनाती है। जिससे कामुक भाव मतलब सेक्सुअल डिजायर्स को बहुत बढ़ता है। जो अध्यात्म मार्ग का शत्रु है। इसिकरण इसे वैष्णव और सात्विक साधक सेवन नहीं करते है। प्याज और लहसुन में बहुत से औषधि गुण भी रखते है। अतः इसे मांसहार कहना गलत है। हां पर ये तामसिक जरूर है।

रविवार, 20 अगस्त 2023

मृत्यु संस्कार या अंतिम संस्कार का ११ से १३ दिन ही क्यों पालन किया जाता है? इसका वैज्ञानिक रहस्य क्या है?

सनातन हिंदू धर्म में मृत्यु संस्कार या जिसे अंतिम संस्कार कहा जाता है । उसे ११ या १३ दिन तक ही क्यों पालन किया जाता है। कुछ इसे अंधविश्वास कहते है कुछ इसे आत्मा की मुक्ति के लिए आवश्यक मानते है। इसकी वैज्ञानिकता क्या है। क्या इसके पीछे कोई वैज्ञानिक कारण भी छिपा हुआ है। हम वर्तमान कुछ वर्ष पूर्व घटी एक घटना पर नजर डालते है जो करना महामारी के रूप में सामने आया था। सरकार हर किसी पर नजर रखी हुई थी। कहीं कोई अगर कोरोना रोगी का पता चलता, उस परिवार के लोगों को १४ दिन की क्वारेंटाइन कर दिया जाता था । ताकि ये रोग और किसी को संक्रमित ना करें। इस क्वारेंटाईन में लोग किसी सार्वजनिक जगहों पर नहीं जा सकते थे और अपने घरों में ही रहते थे। डॉक्टरों के अनुसार १४ दिन कोरोन वायरस का इनक्यूबेशन पीरियड है अर्थात वृद्धि समय ।अगर कोई व्यक्ति किसी कोरोना वायरस रोगी के संपर्क में अगर आया है तो उसमे कम से कम १४ दिन के समय अंतराल में उस व्यक्ति में भी कोरोना वायरस रोग के लक्षण दिखने लगेंगे। 
प्राचीन काल में किसी परिवार में कोई व्यक्ति मार जाता था और मृत्यु का कारण ज्यादातर नहीं पता होता था। संभावित उस व्यक्ति की मृत्यु किसी संक्रमण से हुआ हो और वो संक्रमण महामारी के रूप में जनसमाज में फैल सकता हो। इसी कारण जनसमुदाय के मुखियाओं ने या राजा के आदेश अनुसार या ऋषि मुनि और आयुर्वेद आचार्यों द्वारा एक नियम बनाया गया की जिस परिवार में किसी सदस्य की अगर मृत्यु होती है तो उसे ११ से १३ दिन तक सार्वजनिक जगहों से निष्कासित रहना होगा। सार्वजनिक जगह जैसे मंदिर, कुंवा, नदी, विवाह, त्योहार, गुरुकुल आदि। क्योंकि ये जगह ऐसी हुआ करती थी की समाज के सभी लोग इन जगहों पर आया करते थे और उनमें संक्रमण फैलने का खतरा होता था। भारत के कुछ जगहों पर इसे ११ दिन तक और कुछ जगहों पर इसे मृत्यु सूतक क्रिया को १३ दिन भी पालन किया जाता है। ओडिशा में इसे सुदी क्रिया या सुद्धिकरण भी कहा जाता है। ऋषि मुनियों और आयुर्वेदाचार्यों को ये अच्छे से पता होता था की संक्रमण १० से १२ दिनों के अंदर शरीर में रोग के लक्षण दिख जाते हैं। जो परिवार इस मृत्यु सूतक का पालन करते थे उनको सारे जरूरी सामान बाहर के लोग लाकर दूर से दे दिया करते थे। उन मृतुसूतक के दीनो में उस परिवार में भोजन बिना तेल मसाले का बनता था। क्योंकि आयुर्वेद के अनुसार अधिक तेल मसाला संक्रमण को शरीर में बढ़ा देगा अगर संक्रमण किसी को है तो। १०वे दिन किसी जल स्रोत के पास जाकर जान साधारण जनसुमदाय नहीं जाता हो वांग अपने पुरुष अपने बाल, दाढ़ी, और नाखूनों को कटवाते हैं। क्योंकि बाल, दाढ़ी और नाखूनों में भी सम्मान फैलानेवाले जीव रहते हैं। स्त्रियां भी अपने वालों को दही या रीठा जैसे फल के रस से धोती है और नाखून कटवाते है। पुरुष मुंडन होने पर सिरपर हल्दी लगता है।पुरुष और स्त्री जलासय में अलग अलग स्थानों पर हल्दी,चंदन आदि से स्नान करते हैं। स्नान के पश्चात नीम और तुलसी आदि पत्तो का सेवन करते है। यांहा बता दूं की हल्दी, नीम और तुलसी आती एंटी बैक्टिरियल और एंटी वायरल हैं ये शरीर में रहने वाले संक्रमण को मरता है अगर अभी भी संक्रमण है तो। स्नान के पश्चात परिवार के सभी लोग घी और मद का मिश्रण सेवन करते है। आयुर्वेद के अनुसार घी और मद समान मात्रा में जहर होता है और उसकी विषम मात्रा में ही सेवन करना चाहिए। विषम मात्रा बैक्टीरिया और वायरस के लिए जहर का काम करता ही और मार देता है। पश्चात धार्मिक आदि कार्य ब्राह्मण द्वारा संपादित किया जाता है । गांव के मुखिया और जन समुदाय को जब पूरी तरह से आश्वासन मुलजाता ही की मृतक के परिवार में कोई भी संक्रमित नहीं है तब जन समुदायके साथ उस परिवार को मिलाया जाता है और सार्वजनिक कार्यों में उन्हें समीलित करने की अनुमति मिल जाती है। सनातन हिंदू धर्म में कोई भी नियम या विधि ऐसे ही नहीं जोड़ी गई ही। इसका कुछ न कुछ वैज्ञानिक कारण अवश्य ही छुपी हुई है।

सोमवार, 13 मार्च 2023

क्या आध्यात्मिक दृष्टि से धन संपत्ति कमाना, संचय या भोग करना पाप है ?

जैसे की आज के बड़े बड़े साधु और संन्यासी अपने उपदेशों में ये कह देते हैं की धन संजय करना पाप है और धन एक माया है। यही धन आपको भोग और विलास की ओर ले जायेगा। संसार के भोग को भोगना भी पाप है। जबकि वोही खुद साधु और सन्यासी आज कल करोड़ों की संपति रखते हैं और अपने अनुयायियों से करोड़ों में दान ग्रहण करते है। ये महापाखंड हैं। मुझे याद आता है मिथिला नरेश जनक जी का जिन्हे बड़े बड़े ऋषि मुनि योगी यति और सन्यासी प्रणाम किया करते थे। वो राजाकार्यों में भी मन लगाते थे और आध्यात्मिक कार्यों में भी। वो राजा होकर सभी प्रकार के भोग विलास शुख  भी भोगते और विपुल संपति के स्वामी थे। आज कल के साधु, सन्यासी, यति और योगियों को यह समझना चाहिए की धन संपति और भोग में कोई पाप नहीं है और नाहीं यह मोक्ष प्राप्ति के अवरोधक हैं। पाप तो धन संपति और भोग विलास की कामना में हैं। जनक जी सब ईश्वरीय इच्छा समझ कर कार्य करते थे । जिन्हे वो जानते थे की यह सब एक दिन नष्ट हो जाएगा, ये सब न्नश्वर है। इसी कारण जनक जी को राजऋषी की उपाधि दी गई थी और वो अष्टावक्र जैसे महान ऋषि के शिष्य रहे हैं। इस कहानी का सारांश यह है की भोग में दोष नहीं है, बल्कि भोग भोगने की इच्छा में है। अगर मानव शरीर मिला है तो शरीर को भोजन चाहिए, वस्त्र चाहिए और कामसुख भी चाहिए। पर इसे शरीर की आवश्यकता मानकर और ईश्वर की इच्छा मानकर ही भोगना चाहिए। प्रयत्न करना चाहिए की भोग की इच्छा उत्पन ना हो। शरीर को भूख लगा भोजन कर लिया, प्यास लगी पानी पी लिया, थकान लगी और निद्रा लगी सो गए। कुछ संत बोलेंगे ये तो सहज क्रिया है ना की भोग । भाई ये सब भोग ही है शरीर भोगता है । दोष भोग भोगने की इच्छा और कल्पना में है। क्योंकि अगर कामना उत्पन होती रही और मृत्यु के समय भी कमाना जाग गई तो मोक्ष असंभव हो जायेगा । भोग भोगने की इच्छा मनुष्य को ईश्वरीय भाव की जागृति होने नहीं देगी। इसी कारण जीवन में भोग भोगने की इच्छा को मारने की अभ्यास करते रहन चाहिए । पर जो भोग सहज प्राप्त हो रहा है उसे ईश्वरीय इच्छा समझ कर भोगना चाहिए। 
अगर धन और संपत्ति अर्जन करना या संचय करना पाप है। तो मनुष्य का भविष्य अंधकारमय होगा। सनातन धर्म के शास्त्रों में एक शास्त्र है अर्थशास्त्र । उस शास्त्र का भी कोई प्रयोजन नहीं रहेगा । या तो अर्थशास्त्र का होना गलत है या तो फिर पाखंडी साधु, संत और धर्म गुरु का प्रवचन गलत है। उसी प्रकार कामुक भोग अगर गलत है तो कामसूत्र जैसे शास्त्रों का होना भी गलत है।
अगर कोई मनुष्य धन उपार्जन और संचय नहीं करेगा तो वो भविष्य में होने वाली अनिश्चितता से नही बच पाएगा। इसीलिए अतित्काल में बहुत से राजवंश नष्ट हो गए क्योंकि वो धन संचित नही कर पाए। साधु, सन्यासी और कुछ धर्म गुरु एक उदाहरण देते ही की देखो धन संचित करनेवाला मनुष्य का जीवन मधुमक्खियों के जीवन जैसा जीता है। अंत में कोई मनुष्य आता है मधुमक्खी का छाता तोड़ कर संग्रहित मधु को चुरा ले जाता है। उसी प्रकार संचित धन को भी कोई ले जायेगा। यह तर्क पूर्ण रूप से अतर्किक है। मनुष्य हर मधुमक्खी के छाते से मद चुरा नहीं सकता । मधुमखियां अपना छाता कुछ ऊंचे वृक्ष के डालियों पर भी बनाते है। जो मनुष्य के लिए एक दुर्गम स्थान होता है । जांहासे किसी मनुष्य के लिए मद चुराना एक दुषाध्य सा काम लगता है। इसलिए सभी संचित धन को चुराया नहीं जा सकता। भले संचित मनुष्य उसका भोग ना कर पाए पर उसके परिवार के सदस्य भविष्य में उसका भोग जरूर कर सकेंगे। 
अगर धन संचित करना पाप है तो पुत्र प्राप्ति के लिए विवाह करना भी पाप है। क्योंकि मनुष्य का जीवन भी अनिश्चित है । हो सकत है जो पुत्र धन की प्राप्ति हुई हो वो कम वयश में ही मृत्यु को प्राप्त हो जाए और जो अपने पुत्र पर खर्चा किया वो भी व्यर्थ हो जाए सब। अगर धन संचित करना पाप है तो पढ़ाई लिखाई करना और ज्ञान का संचय करना भी पाप है। क्योंकि की मनुष्य का जीवन अनिश्चित है। सार संचित ज्ञान, विद्या, जानकारी और अनुभव नष्ट हो जायेगा मृत्यु के पश्चात। क्योंकि कोई भी वस्तु का संचय ऐसे देखोगे जीवन में तो व्यर्थ है क्योंकि जीव ही अनिश्चित है।
अतः अनिश्चित्तता से ना डरकर धन संचय करना चाहिए। यही संचित धन बहुत से अनिश्चित विपदा से आपकी बचाएगी।
तो फिर से बहुत से साधु, संत और धर्म गुरु ये बोलेंगे। शास्त्र कभी मिथ्या नहीं बोलते हैं। शास्त्र में ही लिखा है की धन संचित करना पाप है और उसकी प्रामाणिकता पेश करेंगे। मैं भी बोलता हूं शास्त्र झूट नहीं बोलते पर अधूरा शास्त्र पढ़ना भी गलत है। शास्त्र को धर्म और नीति के तराजू में तोलन भी आवश्यक है। शास्त्र को सही से समझना भी आती आवश्यक है। श्रीमद भगवत के प्रथम अध्याय में कृष्ण अर्जुन कहते है । तू युद्ध कर पार्थ। अगर युद्ध में तू विजयी होगा तो तेरी कीर्ति चारों दिशाओं में होगी और युद्ध से प्राप्त धन और राज्यों को तू जीवन भर भोगेगा। अगर युद्ध में तेरी मृत्यु होती है तो वीरगति को प्राप्त होगा स्वर्ग आदिलोक को तू प्राप्त होगा। यहां कृष्ण अर्जुन को भोग भोगने की बात कर रहे है। श्रीमद भागवत गीता परम शास्त्र है। कृष्ण झूट नहीं बोलेंगे। भोग में दोष नहीं है परंतु भोग भोगने की इच्छा में है। जो धर्मयुक्त भोग हो उसे भोगना चाहिए। मनुष्य अपने जीवन में शूख को भी भोगता है और दुःख को भी भोगता है। 
भोग भोगने की कामना में बार बार अवरोध उत्पन करना चाहिए। धन में अधिक कामना है तो जरूरतमंद मनुष्य को दान देना चाहिए। सुंदरता का अधिक कामना हो तो कुरूप मनुष्य को देखना चाहिए । अगर जीवन जीने की इच्छा हो तो समशान भूमि में जलती चिताओं को देखना चाहिए। ऐसे नजरिया या अभ्यासकरते रहने से कामनाएं नष्ट होती हैं। वो मनुष्य सभी वस्तुओं का भोग भोगकर भी योगी बनजाता है। ऐसे राजा जनक थे। जो भोग भोकर भी योगी बने गए थे।

गुरुवार, 9 मार्च 2023

उर्धगमन करना कठिन है और अधोगमन सरल है।

इस भौतिक संसार में ऊपर की तरफ जाना बहुत कठिन है और नीच की तरफ गिरना सरल। ऊपर की तरफ जाने को हम उर्धोगमन और नीचे की तरफ जाने को अधोगमन कहते है। संसार की हर स्थान और कार्य में ये उर्धोगमन और अधोगमन का नियम लागू होता है।
भौतिक क्रीडा जगत में, एक पर्वतारोही को पहाड़ पर चढ़ना अत्यधिक कठिन भरा कार्य है। जबकि उसे नीचे की तरफ गिरने में कोई कठिनाई और प्रयत्न की जरूरत नहीं होती है। गिरते ही प्राण जाने की संभावना भी होती है। 
किसी भी मनुष्य को अपनी प्रतिष्ठा, ख्याति और सम्मान स्थापन करने में बहुतसा समय, परिश्रम और मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। वहीं उसी प्रतिष्ठा, ख्याति और सम्मान को नष्ट करने में कोई कठिनाई, परिश्रम और मुश्किलों का सामना नहीं करना पड़ता है। बस पल भर में नष्ट किए जा सकते है। अगर कोई एक त्रुटिपूर्ण कार्य किए जाए तो।
तपस्वी कई वर्षो की तपस्या से अर्जित शक्ति और पुण्य को संचित करता है। अपनी तपस्या की शक्ति और पुण्य से संसार की कोई भी वस्तु को प्राप्त कर सकता है। तपस्वी को सदैव सावधान रहना चाहिए। ताकि उसके कोई सामान्य पापाचार कार्य होने पर भी उसकी सारी शक्ति, सामर्थ्य और पुण्य क्षीण हो सकते हैं। वर्षो की तपस्या से अर्जित शक्ति, सामर्थ्य और पुण्य क्षणभर में नष्ट हो जा सकते है।
एक ब्रह्मचारी अपने बाल्यकाल से ही ब्रह्मचर्य की दीक्षा लिया हुआ है। अपने बाल्यकाल से ही वो नारी की तरफ दृष्टि नहीं डालता है और वीर्य रक्षा में तत्पर रहता है। योग साधना से अपने वीर्य को संचित करता है और योग अभ्यास से वीर्य को उर्धगामन करता है। पर अचानक स्त्री के संसर्ग में आने पर काम शुख भोगने की इच्छा तीव्र हो जाती है और क्षणिक शूख के लिए मैथुन करता है  और अपनी संचित वीर्य का अधोगमन करता है। इतने दिन की तपस्या को क्षण भर में ही नष्ट कर देता है।
किसी चरित्रवान मनुष्य को चरित्रवान बने रहने में बहुत संयमता का पालन करना पड़ता है और उसी व्यक्ति को चरित्रहीन बनने में समय नहीं लगता। अतः मनुष्य को उर्धगमन करनी चाहिए और क्षणिक शुख से अधोगमन की और अग्रसर नहीं होना चाहिए। अधोगमन एक सहज प्राकृतिक प्रक्रिया है। उर्धगमन करना ही मनुष्य का परम लक्ष्य होना चाहिए। तो ही वो संसार से परे जा सकता है और दुसरो से अलग होकर कुछ बन सकत है। सफल और असफल मनुष्य के बीच यही अंतर होता है। साधारण मनुष्य और ब्रह्मऋषि (योगी) के बीच यही अंतर होता है।

जय महाकाल


सोमवार, 5 दिसंबर 2022

क्यों इस अति आधुनिक काल में आत्महत्यायों के संख्या बहुत अधिक हो गयी है?

इसी अति आधुनिक काल में एक चीज हमेशा से सुनने मिलती है और यह चीज हर न्यूज पेपर में छपती भी है। वो है आत्महत्या। किसी अमुक आदमी ने फलाने जगह पर आत्महत्या करली है। वो इतने करोड़ संपति का मालिक था और बहुत बड़े बंगला में रहता था। आखिर ऐसा हो क्यों रहा है की सम्पन और धनवान व्यक्ति भी आत्मा हत्या कर रहे है। इन सबका मेरे नजरिए से देखें तो इनमे कुछ चीज की कमी है वो है दृढ़ धैर्य और विश्वास । जो सिर्फ आध्यात्मिकता से ही आता है। पहले हम अपने बचपन में सुनते थे की फलाना गरीब व्यक्ति ने गरीबी से दंग आकार आत्महत्या कर ली। पर आज सुनते है की वो फलाना अमीर आदमी ने आत्महत्या कर ली और अपने पीछे बहुत सारी संपति छोड़ गया है। आज देखें तो दिन व दिन आत्महत्याओं की संख्या बढ़ती जा रही है। इसका सबसे बड़ा कारण है मनुष्य में खासकर भारतीय लोगों में आध्यात्मिकता की कमी होना और अपने कामकाज में अत्यधिक तनाव का होना। तनाव होना भी स्वाभिक है पर इसका सही तरीके से प्रबंधन करना भी अति आवश्यक हो जाता है। मनुष्यों को तनाव होने का बहुत से कारण है आजकल । पर अपने अंदर उसे लड़ने की क्षमता विकसित करनी चाहिए । 
हमारे प्राचीन ऋषि मुनियों ने समाज के हर अंग पर पुरजोर काम किया और वैज्ञानिक विधि का ज्ञान अपनी लेखनियों की सहायता से पुस्तकों में लिखा। जैसे की शरीर की बीमारियों के लिए आयुर्वेद शास्त्र और मानसिक रोगों के लिए आध्यामिक शस्त्रों की रचना की। पर आज का मनुष्य अपने आप को बौद्धिक, वैज्ञानिक और तार्किक सोच वाला कहता है और प्राचीन हिंदू शास्त्रों को अतार्किक और अंधस्था कहता हैं। इतने वैज्ञानिक और तार्किक सोचवाले होने पर भी दिन प्रतिदिन मानसिक रोगियों की संख्या बढ़ती जा रही है। हम भारतीय हमेशा ऐसा सोचते है की पश्चिमी देश बहुत ही विकसित और सफल हैं। ये भारतीयों की एक भ्रम मात्रा है। अमेरिका जैसे विकसित देशों में धनवान और समृद्ध लोगो होने पर भी वांहा मानसिक रोगियों और पागलखानों की संख्या बढ़ती जा रही है।  तो एक प्रश्न आता है की आध्यात्मिकता मनुष्य को कैसे आत्महात्यों से रोक सकती है। उदाहरण स्वरूप नीचे एक कहानी समझाया जा रहा है।
मानो एक कंपनी में कुछ कर्मचारी काम करते है और उनका बोस उन्हें दिशा निर्देश देता है काम करने के लिए। बॉस कहता है तुम बस काम करो सही हो या गलत हो में संभाल लूंगा तुम बस काम पर ध्यान दो। वो सभी कर्मचारी पूरे मन से काम करते है और अपने उप्पर कोई तनाव नहीं रखते । अगर कुछ प्रॉब्लम आता है तो वे अपने बॉस के साथ विचार विमर्श कर लेते है और उस प्रॉब्लम को सामना करने के लिए वो पूरी तरह से अपने बॉस पर निर्भर है। और उन्हें पूरा विश्वास रहता है की उनका बॉस सब ठीक कर देगा और ठीक हो भी जाता है। तो आनंद से वो इस कंपनि में काम करते है। उसी तरह आध्यात्मिक व्यक्ति संसार में होने वाली किसी भी प्रकार की समस्या का समाधान वो परमेश्वर पर छोड़ देता है जो वो खुद समाधान नहीं कर सकता । वो यह विश्वास रखता है की ईश्वर उसकी समस्या का समाधान कर देंगे। इस तरह से वो तनाव मुक्त रहता है और उसे पूरा विश्वास रखता है । अगर कोई व्यक्ति पूरा विश्वास करता है तो वो पूरी तरह से तनाव मुक्त रहेगा और अगर थोड़ा भी करता है तो उसका तनाव थोड़ा कम हो जायेगा। अगर बिल्कुल भी नहीं करता तो भी उसका तनाव ऐसा रहेगा की उसे थोड़ा सहार मिल जाएगा आध्यात्मिक से की वो आत्महत्या न करें । आध्यात्मिक व्यक्ति के भाव ऐसे ही होते है । इस प्रकार भाव होने से मनुष्य को मानसिक बल मिलता है और उसके अंदर धैर्य, विश्वास और समस्या से लड़ने का सामर्थ्य प्राप्त करता है। वो हमेशा अपने आपको परमेश्वर के कृपा और संरक्षण में महसूस करता है। आध्यात्मिक मनुष्य की मानसिकता ऐसी होती है की वो दुनिया को नश्वर मानता है और आत्मसंतुष्टि अनुभव करता है। दुःख होने पर अपने बॉस के पास जाकर उनसे अपनी बात बताता है अर्थात परमेश्वर से प्रार्थना करता है । उसे इस बात का पूर्ण विश्वास होता है की परमेश्वर उसकी सहायता अवश्य ही करेंगे और उसके साथ वैसे ही होता भी है। जो जैसा भाव करता है उसे वैसा फल प्राप्त होता है। बहुत से आध्यामिक पुस्तक भी ऐसी मानसिकता बनाने में बहुत काम करती हैं जैसेकी श्रीमद्भगवद्गीता। श्रीमद्भागवत गीत में भगवान कृष्ण ने कहा है "योग क्षेमम बहाम्ह्यम" अर्थात मैं परमेश्वर उनकी हर तरह से सहायता और बल देता हूं जो मुझ से योग क्षेम रखते है या पूरी तरह से मुझ पर निर्भरशील रहते हैं। ऐसी अध्यात्मिक किताब पढ़ने से मनुष्यों में परमेश्वर के प्रति विश्वास उत्पन होता है और परमेश्वर पर निर्भरशील रहते हैं। उन्हें ऐसा लगाने लागत है की वो अकेले नहीं हैं इस संसार में। कोई तो है जो उसकी सहायता कर सकता है और उसका आत्मबल बढ़ता है। 
ऐसा देखा गया है की बहुत से लोगों ने इसलिए आत्महत्या करली हैं क्योंकि वो अकेले थे इस दुनिया में। ऐसे मानशिकता के लोग इसलिए आत्महत्या कर लेते है क्योंकि उन्हें अपने आसपास कोई उनको सहारा देने वाला नही मिल और वो अकेलापन महसूस करते हैं। अगर किसी आध्यात्मिक व्यक्ति से पूछो अकेलापन क्या होता है तो शायद वो नहीं बता पाएगा। क्योंकि वो अपने आपको सदैव परमेश्वर के पास ही महसूस करता है। आध्यात्मिक व्यक्ति एकांत में रहता है पर वो अकेला नहीं रहता। वो अपने आपको परमेश्वर से हमेशा जुड़ा पाता है। अकेले रहनेवाले लोगो को भी आध्यामिक भाव को अपनाना चाहिए। इस प्रकार आत्महत्या करने से बचा जा सकता है ।


जय महाकाल 

बुधवार, 16 नवंबर 2022

दुर्बल व्यक्ति कभी भी समाज में शांति और संतुलन की स्थापना नहीं कर सकता |

हमारे देश में अक्सर ऐसे लोग मिल जाते है जो कहते रहते ही की गांधीवादी बनो । अहिंसा का पालन करो और कोई एक गाल पे थपड़ मारे तो उसे दूसरा गाल दिखा दो। पर उसके साथ किसी भी प्रकार उसे मारो मत या हिंसा का सहारा मत लो। ऐसे करने से उस आदमी में पश्चाताप का एहसास होगा और समाज में हिंसा कम हो जायेगी। समाज में शांति की स्थापना होगी। इस तरह की सोच समाज को बरबाद कर देगी और तबाह कर देगी । ऐसी सोच सिर्फ मूर्ख रखते हैं। समाज में कल्याण और शांति स्थापन करने के शक्ति का भी संतुलन होना अति आवश्यक है। हमारे प्राचीन ग्रंथो में बहुत से कथा कहानियां पाई जाती है। 
हिरण कभी शेर से शांति वार्ता कर नहीं सकता क्योंकि हिरण की वो सामर्थ्य ही नहीं है। जो गांधीवादी बोलते हैं की सारे अस्त्र और शस्त्रों को फेक दो । ये बेवकूफी वाला काम है। प्राचीन काल में जब जब असुरों ने तपस्या कर देवताओं से अधिक शक्तिशाली होने का प्रयत्न किया तब तब देवताओं ने अपनी शक्ति सामर्थ्य का वृद्धि कराया। ताकि देव और असुरों में संतुलन बना रहे। शक्ति और सामर्थ्य में संतुलन रखना समाज और जाती के लिए कल्याण कारक होता है। जंगल में अपने देखा होगा की दो समान शक्ति वाले पशु कभी भी नहीं लढ़ते। क्योंकि एक को दूसरे से भय बना रहता है। अगर युद्ध होता भी हे तो दोनों को ही क्षति होती है और तभी ही किसी पशु की प्राण जायेगी जब दोनों के बीच शक्ति का असंतुलन बढ़ जाएगा। पूर्व में जितने भी विश्वयुद्ध हुए हैं उनसबका एक ही कारण है शक्ति की असंतुलनता। जब लगभग बहुत से देशों के पास परमाणु बम उपस्थित है। उसी कारण से सभी देशों के बीच एक भय है की कहीं हमारे ऊपर भी परमाणु बम ना फेक दिया जाए। इस संदर्भ में हिंदी कहावत है की "मरता क्या ना करता"। जो देश परमाणु बम के आक्रमण से नष्ट हो रहा हो । वो देश अंतिम क्षण में किसी भी शक्तिशाली देश के ऊपर परमाणु बम फेक देगा। ये एक सीधा सा मनोविज्ञान है। जंगल में शेर कभी बाघ को मारकर बाघ मांस नहीं खायेगा। शेर को भी पता है अगर में बाघ का शिकार किया भी तो शायद बाघ का हमला भी उसके लिए पतन घातक हो सकता है।
भारत में आज़ादी के बाद ऐसे बहुत से बेवकूफ नेता हुए । जो ये कहते थे कि हमारे देश में सैन्य शक्ति की क्या आवश्यकता है। हम तो शांति प्रिय देश हैं। सैन्य शक्ति को बैन कर दिया जाना चाहिए। हम तो शांति के पैरवी करनेवाले हैं और कुछ विदेशी ताकतों ने हमारी सैन्य शक्ति को बंद करवाना भी चाहते थे। हमारे अपने बेवकूफ नेताओं की वजह से हथियार बनान भी लगभग बंद कर दिया गया था फैक्ट्रियों में और उन फैक्टरियों में जूते चप्पल बनाया जरहा था। ठीक उसी समय हमारे पड़ोसी देश चीन ने आक्रमण कर दिया ये सोच कर की भारत तो कमजोर है और वो युद्ध जीत भी गया। हमारी कुछ जमीन भी उनके कब्जे में चली गई।
अगर में सच कहूं तो प्रतेक मनुष्य के जीवन में एक शत्रु का होना अति आवश्यक है। इसे उसकी सामर्थ्य, योग्यता और शक्ति जानने में सहायक होती है। हमारे देश भारत का भाग्य बहुत अच्छा था की बेवकूफ नेताओं के सोच पर नहीं रहा और भारत को दो पड़ोसी शत्रु मिलगाए । एक पाकिस्तान और चीन, जिसने भारत को लड़ने और स्मार्थ्य बढ़ने पर विवश कर दिया । हमे चीन और पाकिस्तान का मन ही मन धन्यवाद भी करना चाहिए।
यही प्रकृति का नियम है की शक्तिशाली लोग ही दुर्बल लोगों पर शासन करते हैं। अगर समय रहते दुर्बल लोग अगर अपनी शक्ति में वृद्धि नहीं करते तो निश्चय ही भविष्य में वो खत्म कर दिए जाएंगे और गुलाम बना लिए जायेंगे। यही आदि काल से होता आया है और होता रहेगा। सनातन धर्म में कहीं ऐसा नहीं कहा ही की मार खाकर बैठ जाओ और पलटवार मत करो । लोगों ने अहिंसा का अर्थ ही बदल दिया है। महाभारत में कहा गया है की "अहिंस परमो धर्म । धर्म हिंसा तथैव च ||" बेशक अहिंसा परम धर्म है पर धर्म की रक्षा में हिंसा करना उसे भी अच्छा है।  मनुष्य के पास इतनी तो सामर्थ्य अवश्य ही होना चाहिए की वो अपनी रक्षा कर सके। कोई भगवान नहीं उतारेंगे आपकी रक्षा करने। इसलिए सनातन धर्म में ऐसे बहुत से देवी देवता उपस्थित है जो अस्त्र और शस्त्र धारण किए हुए हैं।

जय महाकाल

शनिवार, 21 मई 2022

बुद्धिमान मनुष्य को मूर्ख व्यक्ति से बाद विवाद कदापि नहीं करनी चाहिए।

बुद्धिमान मनुष्य कभी ना कभी मूर्ख मनुष्य के साथ बाद विवाद में पड़ ही जाता है। जिसके कारण बुद्धिमान मनुष्य खुद कष्ट में पड़ता है । कभी कभी तो बुद्धिमान मनुष्य को आर्थिक और जानमाल का नष्ट होने का भी खतरा बन जाता है। अतः बुद्धिमान मनुष्य को चाहिए की वो मूर्ख व्यक्ति से वार्तालाप कम या बाद विवाद करना परहेज करें । परहेज करने में ही बुद्धिमान मनुष्य का हित है।
एक कहानी है जो बुद्धिमान खरगोस और मूर्ख गधे की बीच चले बाद विवाद का । जो मुझे एक बनिया मित्र ने मुझे समझाया था। जिससे मैं मेरे जीवन में अवश्य ही अनुशरन करता हूं और मेरे जीवन में बहुद लाभ हुए हैं। वो कहानी कुछ ऐसा है।
गधा सबको बोल रहा था की आकाश का रंग पीला है। ऐसा बोलते बोलते खरगोश तक पहुंचता है और खरगोश को आकाश की तरफ देख कर बोलता है की आकाश का रंग पीला है। खरगोश आश्चर्य होकर कहा - ना आकाश कर रंग तो नीला है। इस से गधा थोड़ा गुस्से में आकर कहा नहीं आकाश का रंग पीला है तुम्हे कुछ नहीं पता है। खरगोश असमंजस में था की ये गधा क्या बोल रहा है। खरगोश के ज्ञान के अनुसार आकाश का रंग तो नीला है और अनुभव से आकाश नीला ही दिखता है। गधा अपनी बात पर ही अड़ गया न टस से मस हुआ और ना ही वो खरगोश की बात सुनना चाहता था। खरगोश भी अपनी जिद्द पर अड़ गया की वो गधे से ये मनवा के रहेगा की आकाश नीला है। खरगोश ने गधे से कहा चलो किसी से भी पूछ लो की आकाश नीला है। बारी बारी कर आते जाते सबसे से पूछते पर कोई कुछ उत्तर नहीं देता। अंत में गधे ने कहा ठीक है । जंगल के राजा शेर के पास जाते है और वो जो बोलेंगे वो सही होगा। दोनो शेर के पास जाते है और अपने बाद विवाद का विषय उसे बताते हैं। शेर थोड़ा समय सोचता है और ये आदेश देता है की खरगोश को बंदी बना लो और जेल में डाल दो। खरगोश डर जाता है और आश्चर्य हो जाता है की शेर ऐसा कैसे कर सकता है क्योंकि वो सही है इस विषय में। खरगोश जेल में कई दिन गुजार देता है । फिर किसी दिन खरगोश को शेर से मिलने का मौका मिलता है तो खरगोश शेर से पूछता है की गधे और उसके बीच हुई बाद विवाद में वो सही था फिर भी आपने मुझे जेल में डाल दिया लेकिन क्यों। तब शेर कहता है की मैने तुम्हे जेल में इसलिए नहीं डाला की तुम सही हो या गलत । मैने इसलिए जेल में डाल की तुम ज्ञानी और बुद्धिमान हो और तुमने अपने बराबरी के लोगों से बाद विवाद नहीं किया और गधे से बाद विवाद कर बैठे और उसे समझाने में जिद्द पकड़ लिए। तुम्हे जेल में डाल था तुम्हारी सीख के लिए ताकी तुम समझ जाओ की अज्ञानी को समझाना समय की बरबादी और ज्ञान का नष्ट होना है। तुमने अपना समय भी व्यर्थ किया, आते जाते लोगों का समय भी नष्ट किया और मेरा भी समय नष्ट किया। तुम्हे पता है । आते जाते लोगों को ये पता था की तुम सही हो फिर किसी ने कुछ कहा नहीं। क्योंकि की उन्हें पता था की गधा इसे कभी नहीं मानेगा। खरगोश को अपनी भूल समझ में आ गई थी और उसने शेर को धन्यवाद दिया इस सीख के लिए और अपने घर चला आया । इस कहानी के सारांश स्वरूप ये सामने आता है की मूर्ख को एक बार ही ज्ञान दो अगर माने तो ठीक । नहीं तो कदापि उसे बाद विवाद नहीं करनी चाहिए।
धन्यवाद, 🙏 जय जगन्नाथ💐

सबके अहंकार का शत्रु समय है।

प्रत्येक मनुष्य अपने जीवन में किसी ना किसी बात को लेकर अहंकार करता ही है। मनुष्य को अहंकार आना एक स्वाभाविक क्रिया है। पर इसे नियंत्रण में रखना अति आवश्यक है। क्योंकि प्रत्येक जीव को अपने आप पर अहंकार होता ही है। पर उस अहंकार को बाहर नहीं आने देना चाहिए और उसका कुप्रभाव संसार पर नहीं पड़नी चाहिए। जंगल में रहनेवाला शेर भी अपने आप को अहंकार वस जंगल का राजा मान लेता है और ऐसा सोचता है की जंगल में सब कुछ उसके अधीन है । सिर्फ तब तक जब तक उसके सामने कोई समान शक्ति वाला शेर या अधिक शक्तिवाला शेर उस जंगल में नहीं आ जाता। 
ऊंट और पहाड़ की एक संक्षिप्त कहानी है जो उनके अहंकार से संबंधित है। कहानी कुछ ऐसी है । मरुभूमि में रहने वाला ऊंट भी अपने आप को ऊंचा मानकर अहंकार करता है की इस दुनिया में उसे कोई ऊंचा नहीं है। सिर्फ तब तक जब तक ऊंट पहाड़ के नीचे नहीं आता । पहाड़ के नीचे आने से ऊंट का अहंकार चूर चूर हो जाता ही। उसी तरह पहाड़ को भी अहंकार होता है की उसके जैसा संसार में कोई ऊंचा नहीं है और उसे कोई चढ़ नही सकता। पर समय आने पर एक ऊंट भी उस पहाड़ के ऊपर चढ़ जाता है और पहाड़ उस ऊंट के नीचे होता है। तो कहने का तात्पर्य ये है की बड़ा कौन है। कुछ लोग कहेंगे पहाड़ और कुछ लोग कहेंगे ऊंट। पर में मेरे समझ से कहूंगा "समय" जिसने दोनो को बड़ा बनने का मौका दिया पर अहंकार के घेरे में दोनों आ गए। समय से ऊंचा और समय से बड़ा शक्तिशाली कोई नहीं है। अतः अहंकार करना इस मनुष्य जीवन में पूरी तरह से व्यर्थ ही है। हां ये स्वभाव में है। मनुष्य का स्वभाव भी ज्ञान प्राप्त करना और अहंकार को ज्ञान के द्वारा नियंत्रण में रखना ।

हरी ॐ 🙏

रविवार, 22 अगस्त 2021

अपने परम शत्रु की कभी निंदा नहीं करनी चाहिए बल्कि उसकी प्रशंसा करनी चाहिए।

बुद्धिमान व्यक्ति कभी अपनी शत्रु का निंदा नहीं करता और खास कर शत्रु के सामने तो कभी भी नहीं। शत्रु का तात्पर्य यहां अपने किसी भी प्रकार का प्रतिद्वंदी से हो सकता है। चाहे वो व्यवसायिक प्रतिद्वंदी हो या वैचारिक प्रतिद्वंदी। जब हम शत्रु की प्रशंसा करते हैं तो हम उसकी एकाग्रता, लक्ष्य और निर्धारण शक्ति पे चोट करते है। जैसे ही उसकी प्रशंसा होती है उसकी पकड़ और बुद्धि में शीतलता आना प्रारंभ हो जाता है। उसका मन स्वभाव से खुश होने लगता है। उसकी बुद्धि और भावना असीमित समझ, लक्ष्य और शत्रु के प्रति पूर्ण एकाग्रता टूटने लगती है। जैसे ही उसकी एकाग्रता भंग होगी वैसे ही उस पर प्रहार करना चाहिए। वो सब कुछ जानकर भी कुछ नहीं कर सकता । क्योंकि उसकी बुद्धि के ऊपर प्रशंसा का परदा पड़ गया है। बुद्धिमान को कभी भी स्वयं की प्रशंसा किसी और से सुनने की इच्छा कदापि नहीं रखनी चाहिए। अगर कोई प्रशंसा कर भी दे तो बुद्धि उस प्रशंसा में रुके नहीं रेहान चाहिए। प्रशंसा एक विष के समान हे। जिसे शत्रु को पिलानी चाहिए ताकि आप स्वयं विजयी हो सके ना की आप स्वयं शत्रु से विष पी ले।
जो मित्र आपकी हर समय हर चीज पर प्रशंसा करता है । वो कदापि मित्र नहीं हो सकता। वो आस्तीन में रहने वाले सांप के सामान हे जब भी आपका एकाग्रता भंग होगा तब वो दंश लेगा। अतः बुद्धिमान को सावधान रहने की अति आवश्यकता है। निंदा करने वाला सदा मित्र ही होता है । क्योंकि वो सामनेवाले की कमियों को देखता है। उस निंदक से, हम लक्ष्य तय करना और एकाग्र रहने में सक्षम होते हैं।

रविवार, 25 अप्रैल 2021

"मन चंगा तो कठौती में गंगा" के अनर्थ सोच |

साधारणतः हमारे आस पास धार्मिक भावनाओं को लेकर एक कहावत कही जाती है "मन चंगा तो कठौती में गंगा" । कुछ ना समझ लोग या यूं कहें आज कल के पढ़े लिखे लोग इसे गलत तरह से समझते है और इसका अर्थ भी गलत निकालते है और गलत उपदेश भी देते है। जैसे कि एक बार एक माँ ने अपने बेटे को उसके जन्म दिन पर कहा की वो मंदिर जाकर दर्शन कर आये। इस पर बेटे ने कहा मम्मी "मन चंगा तो कठौती में गंगा" तो मंदिर क्यों जाऊं। 
एक और बात है । एक व्यक्ति की मृत्यु हो गयी थी और उनका चिता भस्म गंगा में प्रभाहीत करना था। उनकी पत्नी ने अपने बेटे से कहा कि वो वाराणसी जाके उनकी चिता भस्म को गंगा में प्रभाहीत कर दे और पिंड दान भी कर आये। इस पर अपनी कार्यालय की व्यस्तता पर बेटे ने कहा मम्मी "मन चंगा तो कठौती में गंगा"। फिर कहा गंगा में प्रभाहीत करने से क्या होगा । उसे अपने पास की नदी में प्रभाहीत कर देते हैं। फिर उसकी माँ ने कहा की तेरे अपने पिता की आत्मा की शांति के लिए गंगा में ही प्रभाहीत करना आवश्यक है। तब बेटा कहता है ये सब अंधविश्वास है। वह बेटा पहले "मन चंगा और कठौती में गंगा" जैसे कहावत कहता है । जो किसी एक संत ने कहा था। पश्चात इसे एक अन्धविश्वाश कहता है। इस कहावत में कोई बुराई नहीं है। जिसे एक प्रसिद्ध संत ने अपनी सोच और आध्यात्मिक स्थिति के अनुसार कहा था। पर आज के युग के लोग इन आध्यात्मिक कहावतों को बिना जाने और अनुभव किये अपनी अवशर और परिस्थिति के अनुसार उपयोग करते हैं।
इस कहावत को संत रविदास जी ने अपनी आध्यात्मिक स्थिति और उचाई के अनुसार कहा था। लोग कोई धार्मिक कार्य में बस छुटकारा पाने के लिए इस प्रकार के कहावतों का सहारा लेते हैं। राबिदास जी को ईश्वर को हर स्थान में, हर वस्तु में देखने का अनुभव और अभ्यास था। एहि ज्ञान वो समाज को और उनके अनुयायिओं को इस कहावत से देते थे। पर आज का मनुष्य इतना शिक्षित होने पर भी अर्थ का अनर्थ कर बैठता है। मंदिर ना जाने के बहाने से वो ये कहता है। पर मनोरंजन के लिए वो थिएटर, पब और पार्टी करने यंहा वंहा जा सकता है। तब वो ये नही बोलता की मनोरंजन तो घर में भी हो सकता है।
आज के युग का मनुष्य तो बिना स्नान के प्रतिष्ठित मंदिरों में ऐसे ही प्रवेश कर लेता है और कहता है "मन चंगा और कठौती में गंगा"। पर उसके मन में "अत्र तत्र सवत्र ईश्वर" का भाब बिल्कुल ही नहीं हैं। मनुष्य को अवश्य ही धार्मिक अंधत्व से बाहर निकलना अति आवश्यक है। पर इतना शिक्षित होने पर भी अपने मन मे अशिक्षित विचार और आचरण भी समाज के लिए सही नहीं है। हर धार्मिक कार्य अन्धविश्वाश के साथ जोड़ कर नहीं देखना चाहिए। प्रत्येक हिन्दू धार्मिक कार्य का महत्व अवश्य ही है । उसका अनुसंधान अवश्य ही होना चाहिए। ये हिन्दू धार्मिक कार्य मनुष्य के शरीर और मन से जुड़े हुए हैं। 
"मन चंगा तो कठौती में गंगा" ये कहावत की सार्थकता एक और तरह से भी मिलती है। अगर कोई व्यक्ति की मृत्यु हुई है और उसका पुत्र अपने पिता के चित्त भष्म को गंगा में प्रभाहीत करने में शारीरिक या आर्थिक रूप से संक्षम नहीं है तो उस स्थिति में । उसे अपने पास के किसी भी जलासय में जाकर, उस जलासय को मन में माता गंगा का ही रूप समझ कर चिता भस्म को प्रभाहीत कर सकते है। 
यंहा इसे कहने का तात्पर्य यह था कि धार्मिक अर्थो को अनर्थ की ओर न मोड़े। जो धार्मिक कार्य करने में अगर मनुष्य समर्थ है तो ईश्वर की खुशी के लिए उसे पूर्ण विधि विधान से संपन्न करना चाहिए।

🙏 जय महाकाल🙏

गुरुवार, 25 मार्च 2021

क्यों वृद्ध व्यक्तियों के साथ बैठने से मनुष्य की उम्र बढ़ जाती है ?

साधारणतः ऐसा कहा जाता कि अगर कोई कम आयु का व्यक्ति किसी वृद्ध व्यक्ति के साथ बेठता है और बातचीत करता है तो उसकी उम्र बढ़ जाती है। इसका क्या तात्विक अर्थ है । क्या यह सच है की युवा व्यक्ति की आयु बढ़ जाती है। उम्र का बढ़ने का तात्विक अर्थ यह है कि उस युवा व्यक्ति का अनुभव उस वृद्ध व्यक्ति के बराबर हो जाता है। वो वृद्ध व्यक्ति की आयु अधिक होने पर उन्हें सभी प्रकार का ज्ञान और अनुभव जो जीवन मे मिला वो अधिक होगा। जभी उस ज्ञान और अनुभव को किसी बच्चे या युवा व्यक्ति से आदान प्रदान करते है तो उस बच्चे या युवा व्यक्ति का ज्ञान और अनुभव उस वृद्ध व्यक्ति के बराबर हो जाता है। इसे ही आयु बढ़ना कहते हैं। उस वृद्ध व्यक्ति ने जीवन में कितना कुछ देखा होगा, कितना कुछ सुन होगा और जाना होगा। जब भी वो किसी के साथ ज्ञान और अपना अनुभव बांटता है उस व्यक्ति का आयु भी उस बृद्ध व्यक्ति अनुभव जितना हो जाता है। 

जय महाकाल🙏

अगर अपने शत्रु या प्रतिद्वंदी को असफल करना चाहते हो तो क्या करना चाहिए ?

अगर अपने शत्रु को हर परिस्थिति में हराना चाहते हो। तो कभी भी शत्रु का विरोध नहीं करना चाहिए। सदैब उसकी झूठी प्रशंसा करते ही रहना चाहिए। उसकी झूठी प्रशंसा करने पर शत्रु के मन में अहंकार का जन्म होगा और वही अहंकार उसे नीचे गिराने में सहाय होता है। अहंकारी मनुष्य सभी प्रकार का पाप करने में अग्रशर होता रहता है। जभी उसका पाप बढ़ेगा उसे नीचे गिरने में भी अधिक समय नहीं लगेगा। शत्रु का विरोध करने पर शत्रु को एक लक्ष्य प्राप्त हो जाता है और वो उस लक्ष्य को प्राप्त करने में पूरी एकग्रता से जुड़ जाता है। अतः शत्रु को कभी भी लक्ष्य साधने में सफल नहीं होने देना चाहिए। जो मनुष्य को स्वयं की प्रशंशा सुनना अच्छा लगता है वो मनुष्य जीवन में कभी भी सफल नहीं हो पाता है। सफल व्यक्ति स्वयं को सदैव प्रशंसा से दूर रखता है और अपनी निंदाओ को अवश्य ही सुनता है। जो व्यक्ति सफलता के शिखर पर पहुंचे होते है। वो अपने प्रशंसकों के वजह से नहीं बल्कि अपने निंदकों के वजह से सफलता की शिखर को छूते हैं। स्वयं की प्रशंसा ही सभी पाप की बीज होती है। कभी भी किसी भी मनुष्य को प्रशंसा की इच्छा नहीं करनी चाहिए।

जय महाकाल🙏

रविवार, 21 मार्च 2021

क्या शत्रु को क्षमा करना वीरता का काम है?

अपने हर तरह के शत्रु को क्षमा करना कदापि वीरता का काम नहीं है। हां, अगर कोई शत्रु सच मे बहुत कमजोर है, बीमार है, और जो अपने बराबरी पर खड़ा नहीं हो सकता उसे माफ किया जा सकता है। पर ऐसा शत्रु जो धनवान है और शक्तिशाली भी है और वो आपसे हार गया है । ऐसे शत्रु को कभी माफ नहीं करना चाहिए और कभी भी उसका संगत नहीं करनी चाहिए। भले ही उसकी हत्या तो नहीं कर सकते पर मित्रता भी नहीं करनी चाहिए। जो इस तरह के शत्रु को माफ करता है । वो देर सबेर शत्रु के हाथों भबिष्य में परास्त होता है या अपने जीवन से ही हाथ धो बेठता है। अतः शत्रु को माफ कर देना कतापी बुद्धिमानी नहीं है और नहीं वीरता की निशानी है। सदैब ही अपनी शत्रु पर नज़र रखते रहना चाहिए और उसकी कमज़ोरी को ढूंढते रहना चाहिए। जरूरत पड़ने पर शत्रुकि कमज़ोरी पर वार करना चाहिए।

रविवार, 14 मार्च 2021

किस तरहा के लीगों के साथ संगत करनी चाहिए?

मनुष्य के जीवन में बहुत से लोग आते हैं और चले जाते हैं। पर कुछ लोगों का प्रभाव उस मनुष्य के जीवन भर रहता ही हैं। यह प्रभाब अच्छे भी हो सकते है और खराब भी हो सकते हैं। जैसे बुजुर्गो ने कहा है अच्छे लोगों के साथ रहोगे तो अच्छा बनोंगे और बुरे लोगों के साथ रहोगें तो बुरा बनोगे। बहुतसिं कहावतें भी हमारे समाज में प्रचालित है । जैसे कि " एक गंदी मछली पूरी तालाब को गंदी कर देती हैं" और "एक खराब आम टोकरी में रखे हुए सभी आमों को खराब कर देती है। अतः किसी भी मनुष्य को समाज स्व बहिस्कृत मनुष्य का संगत कतापी नहीं करनी चाहिए। जिस मनुष्य का समाज में कोई पहचान नहीं सम्मान नहीं उनका संगत कतापी नहीं करनी चाहिए। अगर कोई उसका संगत करता है तो उस मनुष्य की व्यक्तित्व भी वैसा ही माना जाता है। अगर मान लिया जाए कि एक शराबी हैं जो हमेशा नशे में धूत रहता है और उसका एक मित्र है जो उसके साथ हमेशा रहता है। अगर उसका मित्र ये कहता है कि वो शराब नही पिता तो कतापी कोई उसकी बातों पे विश्वाश नहीं करेगा। चोर का मित्र जो हमेशा चोर के साथ रहता है और कहे कि चोरी उसने नहीं कि । तो पुलिस कभी उसकी बात मान नहीं सकते।
यह एक मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि जो मनुष्य जिसके साथ अधिक समय रहता है । उसकी मानशिकता उसके जैसे ही हो जाती है। चाहे वो मनुष्य कितना ही दृढ़ निश्चयी क्यों ना हो। अपराधी प्रबृत्ति के लोगो के साथ रहने से अपराधी जैसे मानशिकता हो जाती है और अंततः आपराधिक प्रवृतियों में सलंग्न हो जाते है। अगर मनुष्य ज्ञानी और आध्यात्मिक विचार वालोँ के साथ अगर अधिक समय गुजारता है तो वो ज्ञानी और अध्यात्म वादी बनता हैं। 
जो मनुष्य सदा दुःखी रहने वाले के साथ समय।व्यतीत करता है । वो मनुष्य भी सदा दुःखी रहता है। एक व्यक्ति की मनोस्थिति दुशरे मनुष्य के मन पर भी पड़ता है। अतः सदा खुश मिज़ाज़ मनुष्य का संगत करें। मनुष्य अगर आपराधिक प्रबृत्ति, दुःखी, चुगल खोर, नीच मानशिकता और समाज से बहिस्कृत मनुष्य का संगत करता है तो उसे भी समाज का तिरस्कार शुननी पड़ेगी और उसकी मानशिकता भी वैसे ही हो जाएगी। अपने संगत को अवश्य ही सुधारना चाहिए और अच्छे लोगों का संगत करनी चाहिए। जैसे ही कोई अच्छे लोगों का संगत चालू कर देता है वैसे ही बुरे संगत का असर खत्म होना सुरु।हो जाता है।

जय महाकाल

क्यों अपने गुरु से बाद विबाद शत्रुता या गुरु का अपमान नहीं करनी चाहिए?

भारतीय वेद, पुराण और शास्त्रों में गुरु को परमेश्वर की संज्ञा दी गयी है। कुछ संत और ऋषियों ने तो गुरु को ईश्वर से भी ऊपर माना है। क्योंकि गुरु प्राप्ति की आवश्यकता ईश्वर प्राप्ति की आवश्यकता से पहले आता है। अतः गुरु को प्रथम स्थान पर रखा गया है और द्वितीय स्थान पर ईश्वर को रखा गया है। 
जब कोई शिष्य गुरु से ज्ञान प्राप्त करता है। तब उस शिष्य को ये नियम अवश्य ही प्राप्त करना चाहिए कि वो गुरु से किसी भी प्रकार का मिथ्य भाषण ना करें। गुरु जैसा कहें वैसा ही करें। 
जब गुरु किसी अपने शिष्य को ज्ञान देता है। गुरु भली भांति यह ज्ञान होता है कि शिष्य की क्या कमज़ोरी है और शिष्य को कैसा ठीक किया जाए। अतः शिष्य को कभी भी गुरु के साथ बगाबत नहीं करनी चाहिए। नहीं तो गुरु के क्रोध होने पर शिष्य के प्राण भी जा सकते है। गुरु उस माली के जैसा है । जिसे अच्छे से पता है किस फुल की बृक्ष को किस प्रकार का खाद देना है। बृक्ष को कितनी कटाई छटाई करनी है। गुरु को अपने शिष्य के बारे में यह भी पता है कि शिष्य को कोनसा ज्ञान या विद्या पचेकि और कोनसा ज्ञान नहीं पचेगी। 
अपने गुरु का कभी भी अपमान नहीं करना चाहिए भले ही गुरु शिष्य को कितना ही दूसरो के सामने अपमानित करें। अगर गुरु अपने शिष्य को अपमानित करता है तो अवश्य ही उसमे शिष्य का हित छिपा हुआ होगा। गुरु के सामने ऊँची आवाज़ में बात करना, गुरु के सामने पैर फैलाकर बैठना, गुरु के खाने से पहले भोजन खा लेना सरासर गलत है। इसे गुरु कुपित होते हैं और गुरु शिष्य को वो ज्ञान नहीं देता है जिस ज्ञान को शिष्य प्राप्त करना चाहता है। अतः नीति के हिसाब से अपने गुरु से किसी भी प्रकार का शत्रुता, बाद विबाद कताहि नहीं करनी चाहिए।
ओम गुरु देवाय नमः

मंगलवार, 18 सितंबर 2018

किस प्रकार के शत्रुओं से अधिक सतर्क रहना चाहिए ?

मनुष्य अपने जीवन काल में बहुत से मित्र और बहुत ज्ञात या अज्ञात शत्रुओं को बना लेता है। कभी कभी तो स्वयं के मित्र भी अज्ञात शत्रु के रूप में रहते हैं। ज्ञात शत्रुओं से अज्ञात शत्रु अधिक प्राणघातक होते हैं। ऐसे शत्रु धर्म ओर नीति कतपि नहीं मानते। ऐसे शत्रु हमेशा गुप्त रूप से आस पास ही रहते हैं और अपने लक्ष्य की प्रतीक्षा करते रहते हैं। जिस मनुष्य को जान से मारने का लक्ष्य रखते हैं। उसके विषय में वो सभी प्रकार के जानकारियां इकठा कर लेते है। जैसे की वह मनुष्य के कब खाता है, कब सोता है, कब भ्रमण करने निकलता है और कब युद्ध का अभ्यास करता है। इस स्थिति में मनुष्य को हमेशा सतर्क रहना आवश्यक होता है।

अज्ञात शत्रु कभी भी सामने से प्रहार नहीं करते वह तो हमेश छूप छूप कर ही वार करते है। अतः इस प्रकार के शत्रुओं से सतर्क रहना चाहिए अथवा इनसे पूर्वानुमान के अनुशार ऐसे शत्रुओं से निपटने के वारे मे सोचन चाहिए। ऐसे अज्ञात शत्रु भेष बतल कर भी लक्षित व्यक्ति के आस पास ही रहते है। जैसे की एक रसोइया के रूप में जो खाने मे विष दे सकता है या वैद्य के रूप में जो रोग के विपरीत किसी प्रकार का औषधि खिला दे जिस से रोग विगड़ जाये और प्राण जाने की संभावना बढ़ जाए। अज्ञात शत्रु किसी प्रिय मित्र या प्रेमिका के रूप में भी हो सकती है। यहां अज्ञात शत्रु का अर्थ सिर्फ उस शत्रु से नहीं है जो अज्ञात अवस्था में आपकी प्राण ले जाये। अज्ञात शत्रु का अर्थ उस शत्रु से भी है जो आपकी सभी गुप्त बातें आपके किसी परम शत्रु या समाज में प्रकशित कर दे। जिस से मान और समान की हानि होने की भी सम्भावना बनी रहती है। ऐसे शत्रु मुख्यतः मनुष्य का कोई मित्र या प्रेमिका होती है। जो गुप्त बातो को आपके परम शत्रु य सामज में प्रकशित करें।
कभी कभी तो मनुष्य का परामर्श दाता या उपदेशक के रूप में भी अज्ञात शत्रु रेह सकते हैं। जो आपको गलत परामर्श या उपदेश भी दे सकते है। अतः मनुष्य को अपने विवेक ओर बुद्धि का प्रयोग करना चाहिए।

शनिवार, 16 जून 2018

क्यों खुद की गलतियों से ज्यादा दुसरतों की गलती से सिख लेनी चाहिए।

अक्शर हम अपने जीवन में कुछ ना कुछ गलत करते हैं और कसम खाते हैं की ऐसी गलती दुबारा नहीं करेंगे। बेशक एक बार गलती का एहसास होने पर हम उन गलतियों को दुबारा सायद नहीं करते। पर इसे ज्यादा महत्वपूर्ण की ये बात है की हम दुसरों की गलतियों से ज्यादा सीखें। अपनी गलती से सिखना अच्छी बात होती है । पर दूसरों की गलती से सीखना बहुत अच्छी बात होती है। 

          ऐसी बहुतसि गलतियां है जिन्हें एक बार करने के बाद सायद हमे उस गलती को सुधारनेका या तो  फिर उस गलती से सीखने का समय ही नहीं मिल पाता हैं। अतः जो दूसरे लोग है जो बहुत सि गलतियां की और उन्हें अपना जान माला का लूकसांन उठाना पढ़ा हैं। वो लोग अपनी गलतियों को सुधार नहीं पाये हों। उन लोगो से सीखनी चाहिए। वो मनुष्य अवश्य ही बुद्धिमान होगा जो दुसरो की गलतियों से सिख लेता है। कहा जाता है की मुंह का जला झाश भी फूंक फूंक कर पिता है। सायद वो ठीक भी है। पर अगर दुशरे लोग उस जले को देख कर कुछ नहीं सीखते हैं तो वाकेहि वो निर्बुद्धि हैं।
कुछ गलतियां ऐसी होती हैं जिन्हें करने पर मनुष्य जीवित ही नहीं रेह पाता। अतः दूसरों की की गयी गलती से सीखनी चाहिए । इस से स्वयं की जीवन की भी रक्षा होती हैं। एहि सत्य है और नीति हैं।

    पर आज के आधुनिक युग में इस नीतियों का अनुशरण कम ही लोग कर सकते हैं। क्योंकि आज की युवा पीढ़ी पूरी तरह से नसे मे धूत है। उसे ये ज्ञात होने पर की तम्बाकू और सिगरेट के सेवन से कर्कट रोग यानी कैंसर होता है। फिर भी अपनी अदातों को सुधारने की जगह उसे अधिक मात्र मे सेवन करता है। उन्हें इस जिज़ का भी ज्ञान होता है की बहुत से लोग कर्कट रोग से मृत्यु को प्राप्त हो गए पर फिर भी तम्बाकू का सेवन नहीं छोड़ेंगे। ऐसे ही लोगो को निर्बुद्धि कहते है।