Neeti Shastra (नीति शास्त्र)
सोमवार, 30 जून 2025
क्या भक्ति मार्ग ही ईश्वर प्राप्ति के लिए सर्वोच्च मार्ग है। ज्ञान मार्ग, कर्म मार्ग और संन्यास आदि व्यर्थ मार्ग है ?
शनिवार, 21 दिसंबर 2024
मनुष्य का कर्म ही मनुष्य का भविष्य का शुख शांती निर्धारित करता है।
शुक्रवार, 8 सितंबर 2023
आवाहन मंत्र से पहले और विसर्जन मंत्र के बाद मूर्तियों का कोई महत्व नहीं रहता । अतः विसर्जन करना अनिवार्य ही होता है।
आज के युग में हिंदू भावनाओं के साथ खेलना बहुत ही सरल है। क्योंकि खुद हिंदू ही अज्ञानता के साथ जी रहा है और बिना अपना ही हिंदू सनातनी शास्त्र पढ़े समझे अपने ही धर्म पर उंगली उठा रहा है। हिंदुओं को समझना चाहिए की उन्हें अपने ही शास्त्रों को अच्छे से पढ़े और समझे।
वृक्ष के नीचे पड़े हुए कुछ देवी देवताओं के फोटो और मूर्तियां और गणपति के विसर्जन के पश्चात जो मूर्तियां समुद्र और नदियों में पूरी तरह से घुलती नहीं हैं तो उसे दूसरे धर्म के लोग और खुद पढ़े लिखे हिंदू जो खुद के शास्त्र भी नहीं पढ़े है ये देखकर बोलते है पूजा के टाइम गणपति बापा मौर्य, जय श्री राम और जय माता दी करते है और देवी देवताओं की मूर्तियों को, चित्रों को और यंत्रों को यंहा वहां फेक देते हैं । जिनसे उनका अपमान होता है।
देखो शास्त्रों के अनुसार मूर्तियों का महत्व तब आता हैं । जब उनमें आवाहन मंत्र, प्राण संचरण मंत्र, पंच प्राण आदि दिए जाते है और मंत्रों से मूर्तियों को भावित करते हैं। तब मूर्ति, चित्र और यंत्र जागृत होते हैं और पूजा के पश्चात उन्हें विसर्जन आदि मंत्रों से देवता को उनके स्वस्थान को आदर और भक्ति सहित भेज दिया जाता है। उसके पश्चात उस मूर्ति में कोई देवता नहीं रहता हैं। उस मूर्तियों को नदी, तलाब और समुद्र आदि जलाशयों में प्रवाहित कर दिया जाता है। इसे देवता और देवी का कोई असमान नहीं होता । जो मूर्तियां या चित्र मिट्टी, लकड़ी और कागज़ आदि से बनते है। अर्थात जो लंबे समय तक नहीं रखे जा सकते उन्हें पार्थिव मूर्तियां कहा जाता है और उन्हें विसर्जन करना अनिवार्य है। क्योंकि ऐसी मूर्तियां धीरे धीरे नष्ट खंडित होने लगती है समय के अंतराल में । जो मूर्तियां पत्थर और धातुओं से बनती हैं। जिन्हे मंदिर और गृह में रखे जाते हैं। उनमें सिर्फ प्राण प्रतिष्ठा मंत्र ही पढ़े जाते हैं। अगर किसी तरह से ऐसे मूर्तियां चित्र या यंत्र खंडित होते है तो उन्हें भी विसर्जन करना अनिवार्य हो जाता है। आजकल कुछ ऐसे लोग है जो नदी और जलाशयों में मूर्ति प्रवाहित करने से मना करते हैं ताकि जलाशयों में प्रदूषण ना हो। भले ही १०० कंपनियों के ड्रेनेज लाइन समुद्र और नदियों में छोड़ तो उसे पॉल्यूशन नहीं होता है। पॉल्यूशन सिर्फ नदियों, तलाब और समुद्र में सिर्फ मूर्ति विसर्जन और फुल पते डालने से होता है। इसी कारण लोग देवी देवताओं के खंडित मूर्ति और चित्रों को पेड़ों के नीचे छोड़ जाते हैं। मूर्ति आजकल प्लास्टर ऑफ पेरिस से बनती है। जिसे मूर्तियां पानी में सरलता से घुलती नहीं हैं और जलाशयों में प्रदूषण होता है। पर इस से विसर्जन के पश्चात देवी देवताओं का कोई अनादर नही होता है। गणेश चतुर्थी आदि त्योहारों में मूर्तियां मिटी आदि से ही बनाना चाहिए।
बुधवार, 6 सितंबर 2023
क्या प्याज और लहसुन मांसाहार है सनातन धर्म है?
क्या प्याज और लहसुन मांसाहार है? हमारे सनातन धर्म में बहुत से कहानियां हैं जो प्याज और लहसुन से जोड़ दिया गया है। इसकी वास्तिविकता के बारे में जानेंगे। जितने भी वैष्णव संप्रदाय के लोग है वो प्याज, लहसुन और मसूर की दालों का सेवन नहीं करते क्योंकि की वो इसे मांशहार मानते है। मांसाहार भोजन को आमिश और शाकाहार भोजन को निरामिष भी कहा जाता है। इस दो प्रकार के भोजन के अलावा दो और प्रकार के भोजन भी है तामसिक और सात्विक भोजन। मांसाहार भोजन को हम तामसिक भोजन कह सकते हैं। पर प्याज लहसुन जिस भोजन में उपयोग हुआ हो उसे मांसहार भोजन नहीं कह सकते जब तक उसमे किसी जीव का मांस उपयोग नहीं हुआ हो। सभी मांसहार भोजन तामसिक है। पर सभी तामसिक भोजन मांसहार नहीं है। ऐसा क्यों, प्याज, लहसुन और मसूर की दाल खाने से मनुष्य में गर्मी पढ़ती है और तामसिक प्रवृति का उदय होता है। जो सात्विक व्रत या साधना करते हैं। ये उनके साधना मार्ग में रुकावट उत्पन करेगा और उलझा देगा। अतः इसी कारण वैष्णव और सात्विक मार्ग में ऐसे भोजनों का सेवन नहीं करते है। प्याज, लहसुन और मसूर ये पौधों से ही प्राप्त होते हैं। इसी कारण इसे बहुत से लोककथाओं को जोड़ दिया गया है। मेरी मम्मी से भी मेने एक ऐसे ही कहानी सुनी थी। जिसमें एक ऋषि था जो गलती से एक राक्षसी से शादी कर लिए । उस ऋषि का एक गाय था। तो वो ऋषि एक दिन स्नान करने गया था और वो राक्षसी को मांस खाने का मन हुआ तो उसने वो गाय को मारकर उस के मांस को पक्का लिया और खा गई। उस गाय का सिर्फ चमड़ा बचा था । उसका पति वो चमड़ा देखकर श्राप दे देगा जानकरके उसने वो चमड़ा को जमीन में गाढ़ देता है और पति को बोलती है की गाय कहीं खो गई है। कुछ दिन के पश्चात उस चमड़े से उसकी बाहर की परद से लहसुन का पौधा और अंदर के रक्तवाले परद से प्याज का पौधा जन्म लेता है। तो वो ऋषि को पता चलता है तो वो अपने पत्नी को श्राप देकर मार डालती है। ऐसी अनेकों कहानी है जो प्याज और लहसुन से जुड़ी हुई है। साधारण लोगों को समझाने के लिए ये कहानी बनाई।गई थी क्योंकि चमड़े से पौधों का जन्म संभव नहीं हो सकता। प्रॉब्लम प्याज लहसुन और मसूर के गुण स्वभाव से है। प्याज और लहसुन आयुर्वेद के अनुसार शरीर में ऊष्मा वीर्य बनाती है। जिससे कामुक भाव मतलब सेक्सुअल डिजायर्स को बहुत बढ़ता है। जो अध्यात्म मार्ग का शत्रु है। इसिकरण इसे वैष्णव और सात्विक साधक सेवन नहीं करते है। प्याज और लहसुन में बहुत से औषधि गुण भी रखते है। अतः इसे मांसहार कहना गलत है। हां पर ये तामसिक जरूर है।
रविवार, 20 अगस्त 2023
मृत्यु संस्कार या अंतिम संस्कार का ११ से १३ दिन ही क्यों पालन किया जाता है? इसका वैज्ञानिक रहस्य क्या है?
सोमवार, 13 मार्च 2023
क्या आध्यात्मिक दृष्टि से धन संपत्ति कमाना, संचय या भोग करना पाप है ?
गुरुवार, 9 मार्च 2023
उर्धगमन करना कठिन है और अधोगमन सरल है।
सोमवार, 5 दिसंबर 2022
क्यों इस अति आधुनिक काल में आत्महत्यायों के संख्या बहुत अधिक हो गयी है?
बुधवार, 16 नवंबर 2022
दुर्बल व्यक्ति कभी भी समाज में शांति और संतुलन की स्थापना नहीं कर सकता |
शनिवार, 21 मई 2022
बुद्धिमान मनुष्य को मूर्ख व्यक्ति से बाद विवाद कदापि नहीं करनी चाहिए।
सबके अहंकार का शत्रु समय है।
रविवार, 22 अगस्त 2021
अपने परम शत्रु की कभी निंदा नहीं करनी चाहिए बल्कि उसकी प्रशंसा करनी चाहिए।
रविवार, 25 अप्रैल 2021
"मन चंगा तो कठौती में गंगा" के अनर्थ सोच |
गुरुवार, 25 मार्च 2021
क्यों वृद्ध व्यक्तियों के साथ बैठने से मनुष्य की उम्र बढ़ जाती है ?
अगर अपने शत्रु या प्रतिद्वंदी को असफल करना चाहते हो तो क्या करना चाहिए ?
रविवार, 21 मार्च 2021
क्या शत्रु को क्षमा करना वीरता का काम है?
रविवार, 14 मार्च 2021
किस तरहा के लीगों के साथ संगत करनी चाहिए?
क्यों अपने गुरु से बाद विबाद शत्रुता या गुरु का अपमान नहीं करनी चाहिए?
मंगलवार, 18 सितंबर 2018
किस प्रकार के शत्रुओं से अधिक सतर्क रहना चाहिए ?
कभी कभी तो मनुष्य का परामर्श दाता या उपदेशक के रूप में भी अज्ञात शत्रु रेह सकते हैं। जो आपको गलत परामर्श या उपदेश भी दे सकते है। अतः मनुष्य को अपने विवेक ओर बुद्धि का प्रयोग करना चाहिए।
शनिवार, 16 जून 2018
क्यों खुद की गलतियों से ज्यादा दुसरतों की गलती से सिख लेनी चाहिए।
ऐसी बहुतसि गलतियां है जिन्हें एक बार करने के बाद सायद हमे उस गलती को सुधारनेका या तो फिर उस गलती से सीखने का समय ही नहीं मिल पाता हैं। अतः जो दूसरे लोग है जो बहुत सि गलतियां की और उन्हें अपना जान माला का लूकसांन उठाना पढ़ा हैं। वो लोग अपनी गलतियों को सुधार नहीं पाये हों। उन लोगो से सीखनी चाहिए। वो मनुष्य अवश्य ही बुद्धिमान होगा जो दुसरो की गलतियों से सिख लेता है। कहा जाता है की मुंह का जला झाश भी फूंक फूंक कर पिता है। सायद वो ठीक भी है। पर अगर दुशरे लोग उस जले को देख कर कुछ नहीं सीखते हैं तो वाकेहि वो निर्बुद्धि हैं।
कुछ गलतियां ऐसी होती हैं जिन्हें करने पर मनुष्य जीवित ही नहीं रेह पाता। अतः दूसरों की की गयी गलती से सीखनी चाहिए । इस से स्वयं की जीवन की भी रक्षा होती हैं। एहि सत्य है और नीति हैं।
पर आज के आधुनिक युग में इस नीतियों का अनुशरण कम ही लोग कर सकते हैं। क्योंकि आज की युवा पीढ़ी पूरी तरह से नसे मे धूत है। उसे ये ज्ञात होने पर की तम्बाकू और सिगरेट के सेवन से कर्कट रोग यानी कैंसर होता है। फिर भी अपनी अदातों को सुधारने की जगह उसे अधिक मात्र मे सेवन करता है। उन्हें इस जिज़ का भी ज्ञान होता है की बहुत से लोग कर्कट रोग से मृत्यु को प्राप्त हो गए पर फिर भी तम्बाकू का सेवन नहीं छोड़ेंगे। ऐसे ही लोगो को निर्बुद्धि कहते है।


