जो मित्र आपकी हर समय हर चीज पर प्रशंसा करता है । वो कदापि मित्र नहीं हो सकता। वो आस्तीन में रहने वाले सांप के सामान हे जब भी आपका एकाग्रता भंग होगा तब वो दंश लेगा। अतः बुद्धिमान को सावधान रहने की अति आवश्यकता है। निंदा करने वाला सदा मित्र ही होता है । क्योंकि वो सामनेवाले की कमियों को देखता है। उस निंदक से, हम लक्ष्य तय करना और एकाग्र रहने में सक्षम होते हैं।
रविवार, 22 अगस्त 2021
अपने परम शत्रु की कभी निंदा नहीं करनी चाहिए बल्कि उसकी प्रशंसा करनी चाहिए।
बुद्धिमान व्यक्ति कभी अपनी शत्रु का निंदा नहीं करता और खास कर शत्रु के सामने तो कभी भी नहीं। शत्रु का तात्पर्य यहां अपने किसी भी प्रकार का प्रतिद्वंदी से हो सकता है। चाहे वो व्यवसायिक प्रतिद्वंदी हो या वैचारिक प्रतिद्वंदी। जब हम शत्रु की प्रशंसा करते हैं तो हम उसकी एकाग्रता, लक्ष्य और निर्धारण शक्ति पे चोट करते है। जैसे ही उसकी प्रशंसा होती है उसकी पकड़ और बुद्धि में शीतलता आना प्रारंभ हो जाता है। उसका मन स्वभाव से खुश होने लगता है। उसकी बुद्धि और भावना असीमित समझ, लक्ष्य और शत्रु के प्रति पूर्ण एकाग्रता टूटने लगती है। जैसे ही उसकी एकाग्रता भंग होगी वैसे ही उस पर प्रहार करना चाहिए। वो सब कुछ जानकर भी कुछ नहीं कर सकता । क्योंकि उसकी बुद्धि के ऊपर प्रशंसा का परदा पड़ गया है। बुद्धिमान को कभी भी स्वयं की प्रशंसा किसी और से सुनने की इच्छा कदापि नहीं रखनी चाहिए। अगर कोई प्रशंसा कर भी दे तो बुद्धि उस प्रशंसा में रुके नहीं रेहान चाहिए। प्रशंसा एक विष के समान हे। जिसे शत्रु को पिलानी चाहिए ताकि आप स्वयं विजयी हो सके ना की आप स्वयं शत्रु से विष पी ले।
रविवार, 25 अप्रैल 2021
"मन चंगा तो कठौती में गंगा" के अनर्थ सोच |
साधारणतः हमारे आस पास धार्मिक भावनाओं को लेकर एक कहावत कही जाती है "मन चंगा तो कठौती में गंगा" । कुछ ना समझ लोग या यूं कहें आज कल के पढ़े लिखे लोग इसे गलत तरह से समझते है और इसका अर्थ भी गलत निकालते है और गलत उपदेश भी देते है। जैसे कि एक बार एक माँ ने अपने बेटे को उसके जन्म दिन पर कहा की वो मंदिर जाकर दर्शन कर आये। इस पर बेटे ने कहा मम्मी "मन चंगा तो कठौती में गंगा" तो मंदिर क्यों जाऊं।
एक और बात है । एक व्यक्ति की मृत्यु हो गयी थी और उनका चिता भस्म गंगा में प्रभाहीत करना था। उनकी पत्नी ने अपने बेटे से कहा कि वो वाराणसी जाके उनकी चिता भस्म को गंगा में प्रभाहीत कर दे और पिंड दान भी कर आये। इस पर अपनी कार्यालय की व्यस्तता पर बेटे ने कहा मम्मी "मन चंगा तो कठौती में गंगा"। फिर कहा गंगा में प्रभाहीत करने से क्या होगा । उसे अपने पास की नदी में प्रभाहीत कर देते हैं। फिर उसकी माँ ने कहा की तेरे अपने पिता की आत्मा की शांति के लिए गंगा में ही प्रभाहीत करना आवश्यक है। तब बेटा कहता है ये सब अंधविश्वास है। वह बेटा पहले "मन चंगा और कठौती में गंगा" जैसे कहावत कहता है । जो किसी एक संत ने कहा था। पश्चात इसे एक अन्धविश्वाश कहता है। इस कहावत में कोई बुराई नहीं है। जिसे एक प्रसिद्ध संत ने अपनी सोच और आध्यात्मिक स्थिति के अनुसार कहा था। पर आज के युग के लोग इन आध्यात्मिक कहावतों को बिना जाने और अनुभव किये अपनी अवशर और परिस्थिति के अनुसार उपयोग करते हैं।
इस कहावत को संत रविदास जी ने अपनी आध्यात्मिक स्थिति और उचाई के अनुसार कहा था। लोग कोई धार्मिक कार्य में बस छुटकारा पाने के लिए इस प्रकार के कहावतों का सहारा लेते हैं। राबिदास जी को ईश्वर को हर स्थान में, हर वस्तु में देखने का अनुभव और अभ्यास था। एहि ज्ञान वो समाज को और उनके अनुयायिओं को इस कहावत से देते थे। पर आज का मनुष्य इतना शिक्षित होने पर भी अर्थ का अनर्थ कर बैठता है। मंदिर ना जाने के बहाने से वो ये कहता है। पर मनोरंजन के लिए वो थिएटर, पब और पार्टी करने यंहा वंहा जा सकता है। तब वो ये नही बोलता की मनोरंजन तो घर में भी हो सकता है।
आज के युग का मनुष्य तो बिना स्नान के प्रतिष्ठित मंदिरों में ऐसे ही प्रवेश कर लेता है और कहता है "मन चंगा और कठौती में गंगा"। पर उसके मन में "अत्र तत्र सवत्र ईश्वर" का भाब बिल्कुल ही नहीं हैं। मनुष्य को अवश्य ही धार्मिक अंधत्व से बाहर निकलना अति आवश्यक है। पर इतना शिक्षित होने पर भी अपने मन मे अशिक्षित विचार और आचरण भी समाज के लिए सही नहीं है। हर धार्मिक कार्य अन्धविश्वाश के साथ जोड़ कर नहीं देखना चाहिए। प्रत्येक हिन्दू धार्मिक कार्य का महत्व अवश्य ही है । उसका अनुसंधान अवश्य ही होना चाहिए। ये हिन्दू धार्मिक कार्य मनुष्य के शरीर और मन से जुड़े हुए हैं।
"मन चंगा तो कठौती में गंगा" ये कहावत की सार्थकता एक और तरह से भी मिलती है। अगर कोई व्यक्ति की मृत्यु हुई है और उसका पुत्र अपने पिता के चित्त भष्म को गंगा में प्रभाहीत करने में शारीरिक या आर्थिक रूप से संक्षम नहीं है तो उस स्थिति में । उसे अपने पास के किसी भी जलासय में जाकर, उस जलासय को मन में माता गंगा का ही रूप समझ कर चिता भस्म को प्रभाहीत कर सकते है।
यंहा इसे कहने का तात्पर्य यह था कि धार्मिक अर्थो को अनर्थ की ओर न मोड़े। जो धार्मिक कार्य करने में अगर मनुष्य समर्थ है तो ईश्वर की खुशी के लिए उसे पूर्ण विधि विधान से संपन्न करना चाहिए।
🙏 जय महाकाल🙏
गुरुवार, 25 मार्च 2021
क्यों वृद्ध व्यक्तियों के साथ बैठने से मनुष्य की उम्र बढ़ जाती है ?
साधारणतः ऐसा कहा जाता कि अगर कोई कम आयु का व्यक्ति किसी वृद्ध व्यक्ति के साथ बेठता है और बातचीत करता है तो उसकी उम्र बढ़ जाती है। इसका क्या तात्विक अर्थ है । क्या यह सच है की युवा व्यक्ति की आयु बढ़ जाती है। उम्र का बढ़ने का तात्विक अर्थ यह है कि उस युवा व्यक्ति का अनुभव उस वृद्ध व्यक्ति के बराबर हो जाता है। वो वृद्ध व्यक्ति की आयु अधिक होने पर उन्हें सभी प्रकार का ज्ञान और अनुभव जो जीवन मे मिला वो अधिक होगा। जभी उस ज्ञान और अनुभव को किसी बच्चे या युवा व्यक्ति से आदान प्रदान करते है तो उस बच्चे या युवा व्यक्ति का ज्ञान और अनुभव उस वृद्ध व्यक्ति के बराबर हो जाता है। इसे ही आयु बढ़ना कहते हैं। उस वृद्ध व्यक्ति ने जीवन में कितना कुछ देखा होगा, कितना कुछ सुन होगा और जाना होगा। जब भी वो किसी के साथ ज्ञान और अपना अनुभव बांटता है उस व्यक्ति का आयु भी उस बृद्ध व्यक्ति अनुभव जितना हो जाता है।
जय महाकाल🙏
अगर अपने शत्रु या प्रतिद्वंदी को असफल करना चाहते हो तो क्या करना चाहिए ?
अगर अपने शत्रु को हर परिस्थिति में हराना चाहते हो। तो कभी भी शत्रु का विरोध नहीं करना चाहिए। सदैब उसकी झूठी प्रशंसा करते ही रहना चाहिए। उसकी झूठी प्रशंसा करने पर शत्रु के मन में अहंकार का जन्म होगा और वही अहंकार उसे नीचे गिराने में सहाय होता है। अहंकारी मनुष्य सभी प्रकार का पाप करने में अग्रशर होता रहता है। जभी उसका पाप बढ़ेगा उसे नीचे गिरने में भी अधिक समय नहीं लगेगा। शत्रु का विरोध करने पर शत्रु को एक लक्ष्य प्राप्त हो जाता है और वो उस लक्ष्य को प्राप्त करने में पूरी एकग्रता से जुड़ जाता है। अतः शत्रु को कभी भी लक्ष्य साधने में सफल नहीं होने देना चाहिए। जो मनुष्य को स्वयं की प्रशंशा सुनना अच्छा लगता है वो मनुष्य जीवन में कभी भी सफल नहीं हो पाता है। सफल व्यक्ति स्वयं को सदैव प्रशंसा से दूर रखता है और अपनी निंदाओ को अवश्य ही सुनता है। जो व्यक्ति सफलता के शिखर पर पहुंचे होते है। वो अपने प्रशंसकों के वजह से नहीं बल्कि अपने निंदकों के वजह से सफलता की शिखर को छूते हैं। स्वयं की प्रशंसा ही सभी पाप की बीज होती है। कभी भी किसी भी मनुष्य को प्रशंसा की इच्छा नहीं करनी चाहिए।
जय महाकाल🙏
रविवार, 21 मार्च 2021
क्या शत्रु को क्षमा करना वीरता का काम है?
अपने हर तरह के शत्रु को क्षमा करना कदापि वीरता का काम नहीं है। हां, अगर कोई शत्रु सच मे बहुत कमजोर है, बीमार है, और जो अपने बराबरी पर खड़ा नहीं हो सकता उसे माफ किया जा सकता है। पर ऐसा शत्रु जो धनवान है और शक्तिशाली भी है और वो आपसे हार गया है । ऐसे शत्रु को कभी माफ नहीं करना चाहिए और कभी भी उसका संगत नहीं करनी चाहिए। भले ही उसकी हत्या तो नहीं कर सकते पर मित्रता भी नहीं करनी चाहिए। जो इस तरह के शत्रु को माफ करता है । वो देर सबेर शत्रु के हाथों भबिष्य में परास्त होता है या अपने जीवन से ही हाथ धो बेठता है। अतः शत्रु को माफ कर देना कतापी बुद्धिमानी नहीं है और नहीं वीरता की निशानी है। सदैब ही अपनी शत्रु पर नज़र रखते रहना चाहिए और उसकी कमज़ोरी को ढूंढते रहना चाहिए। जरूरत पड़ने पर शत्रुकि कमज़ोरी पर वार करना चाहिए।
रविवार, 14 मार्च 2021
किस तरहा के लीगों के साथ संगत करनी चाहिए?
मनुष्य के जीवन में बहुत से लोग आते हैं और चले जाते हैं। पर कुछ लोगों का प्रभाव उस मनुष्य के जीवन भर रहता ही हैं। यह प्रभाब अच्छे भी हो सकते है और खराब भी हो सकते हैं। जैसे बुजुर्गो ने कहा है अच्छे लोगों के साथ रहोगे तो अच्छा बनोंगे और बुरे लोगों के साथ रहोगें तो बुरा बनोगे। बहुतसिं कहावतें भी हमारे समाज में प्रचालित है । जैसे कि " एक गंदी मछली पूरी तालाब को गंदी कर देती हैं" और "एक खराब आम टोकरी में रखे हुए सभी आमों को खराब कर देती है। अतः किसी भी मनुष्य को समाज स्व बहिस्कृत मनुष्य का संगत कतापी नहीं करनी चाहिए। जिस मनुष्य का समाज में कोई पहचान नहीं सम्मान नहीं उनका संगत कतापी नहीं करनी चाहिए। अगर कोई उसका संगत करता है तो उस मनुष्य की व्यक्तित्व भी वैसा ही माना जाता है। अगर मान लिया जाए कि एक शराबी हैं जो हमेशा नशे में धूत रहता है और उसका एक मित्र है जो उसके साथ हमेशा रहता है। अगर उसका मित्र ये कहता है कि वो शराब नही पिता तो कतापी कोई उसकी बातों पे विश्वाश नहीं करेगा। चोर का मित्र जो हमेशा चोर के साथ रहता है और कहे कि चोरी उसने नहीं कि । तो पुलिस कभी उसकी बात मान नहीं सकते।
यह एक मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि जो मनुष्य जिसके साथ अधिक समय रहता है । उसकी मानशिकता उसके जैसे ही हो जाती है। चाहे वो मनुष्य कितना ही दृढ़ निश्चयी क्यों ना हो। अपराधी प्रबृत्ति के लोगो के साथ रहने से अपराधी जैसे मानशिकता हो जाती है और अंततः आपराधिक प्रवृतियों में सलंग्न हो जाते है। अगर मनुष्य ज्ञानी और आध्यात्मिक विचार वालोँ के साथ अगर अधिक समय गुजारता है तो वो ज्ञानी और अध्यात्म वादी बनता हैं।
जो मनुष्य सदा दुःखी रहने वाले के साथ समय।व्यतीत करता है । वो मनुष्य भी सदा दुःखी रहता है। एक व्यक्ति की मनोस्थिति दुशरे मनुष्य के मन पर भी पड़ता है। अतः सदा खुश मिज़ाज़ मनुष्य का संगत करें। मनुष्य अगर आपराधिक प्रबृत्ति, दुःखी, चुगल खोर, नीच मानशिकता और समाज से बहिस्कृत मनुष्य का संगत करता है तो उसे भी समाज का तिरस्कार शुननी पड़ेगी और उसकी मानशिकता भी वैसे ही हो जाएगी। अपने संगत को अवश्य ही सुधारना चाहिए और अच्छे लोगों का संगत करनी चाहिए। जैसे ही कोई अच्छे लोगों का संगत चालू कर देता है वैसे ही बुरे संगत का असर खत्म होना सुरु।हो जाता है।
जय महाकाल
क्यों अपने गुरु से बाद विबाद शत्रुता या गुरु का अपमान नहीं करनी चाहिए?
भारतीय वेद, पुराण और शास्त्रों में गुरु को परमेश्वर की संज्ञा दी गयी है। कुछ संत और ऋषियों ने तो गुरु को ईश्वर से भी ऊपर माना है। क्योंकि गुरु प्राप्ति की आवश्यकता ईश्वर प्राप्ति की आवश्यकता से पहले आता है। अतः गुरु को प्रथम स्थान पर रखा गया है और द्वितीय स्थान पर ईश्वर को रखा गया है।
जब कोई शिष्य गुरु से ज्ञान प्राप्त करता है। तब उस शिष्य को ये नियम अवश्य ही प्राप्त करना चाहिए कि वो गुरु से किसी भी प्रकार का मिथ्य भाषण ना करें। गुरु जैसा कहें वैसा ही करें।
जब गुरु किसी अपने शिष्य को ज्ञान देता है। गुरु भली भांति यह ज्ञान होता है कि शिष्य की क्या कमज़ोरी है और शिष्य को कैसा ठीक किया जाए। अतः शिष्य को कभी भी गुरु के साथ बगाबत नहीं करनी चाहिए। नहीं तो गुरु के क्रोध होने पर शिष्य के प्राण भी जा सकते है। गुरु उस माली के जैसा है । जिसे अच्छे से पता है किस फुल की बृक्ष को किस प्रकार का खाद देना है। बृक्ष को कितनी कटाई छटाई करनी है। गुरु को अपने शिष्य के बारे में यह भी पता है कि शिष्य को कोनसा ज्ञान या विद्या पचेकि और कोनसा ज्ञान नहीं पचेगी।
अपने गुरु का कभी भी अपमान नहीं करना चाहिए भले ही गुरु शिष्य को कितना ही दूसरो के सामने अपमानित करें। अगर गुरु अपने शिष्य को अपमानित करता है तो अवश्य ही उसमे शिष्य का हित छिपा हुआ होगा। गुरु के सामने ऊँची आवाज़ में बात करना, गुरु के सामने पैर फैलाकर बैठना, गुरु के खाने से पहले भोजन खा लेना सरासर गलत है। इसे गुरु कुपित होते हैं और गुरु शिष्य को वो ज्ञान नहीं देता है जिस ज्ञान को शिष्य प्राप्त करना चाहता है। अतः नीति के हिसाब से अपने गुरु से किसी भी प्रकार का शत्रुता, बाद विबाद कताहि नहीं करनी चाहिए।
ओम गुरु देवाय नमः
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ (Atom)