सनातन हिंदू धर्म में मृत्यु संस्कार या जिसे अंतिम संस्कार कहा जाता है । उसे ११ या १३ दिन तक ही क्यों पालन किया जाता है। कुछ इसे अंधविश्वास कहते है कुछ इसे आत्मा की मुक्ति के लिए आवश्यक मानते है। इसकी वैज्ञानिकता क्या है। क्या इसके पीछे कोई वैज्ञानिक कारण भी छिपा हुआ है। हम वर्तमान कुछ वर्ष पूर्व घटी एक घटना पर नजर डालते है जो करना महामारी के रूप में सामने आया था। सरकार हर किसी पर नजर रखी हुई थी। कहीं कोई अगर कोरोना रोगी का पता चलता, उस परिवार के लोगों को १४ दिन की क्वारेंटाइन कर दिया जाता था । ताकि ये रोग और किसी को संक्रमित ना करें। इस क्वारेंटाईन में लोग किसी सार्वजनिक जगहों पर नहीं जा सकते थे और अपने घरों में ही रहते थे। डॉक्टरों के अनुसार १४ दिन कोरोन वायरस का इनक्यूबेशन पीरियड है अर्थात वृद्धि समय ।अगर कोई व्यक्ति किसी कोरोना वायरस रोगी के संपर्क में अगर आया है तो उसमे कम से कम १४ दिन के समय अंतराल में उस व्यक्ति में भी कोरोना वायरस रोग के लक्षण दिखने लगेंगे।
प्राचीन काल में किसी परिवार में कोई व्यक्ति मार जाता था और मृत्यु का कारण ज्यादातर नहीं पता होता था। संभावित उस व्यक्ति की मृत्यु किसी संक्रमण से हुआ हो और वो संक्रमण महामारी के रूप में जनसमाज में फैल सकता हो। इसी कारण जनसमुदाय के मुखियाओं ने या राजा के आदेश अनुसार या ऋषि मुनि और आयुर्वेद आचार्यों द्वारा एक नियम बनाया गया की जिस परिवार में किसी सदस्य की अगर मृत्यु होती है तो उसे ११ से १३ दिन तक सार्वजनिक जगहों से निष्कासित रहना होगा। सार्वजनिक जगह जैसे मंदिर, कुंवा, नदी, विवाह, त्योहार, गुरुकुल आदि। क्योंकि ये जगह ऐसी हुआ करती थी की समाज के सभी लोग इन जगहों पर आया करते थे और उनमें संक्रमण फैलने का खतरा होता था। भारत के कुछ जगहों पर इसे ११ दिन तक और कुछ जगहों पर इसे मृत्यु सूतक क्रिया को १३ दिन भी पालन किया जाता है। ओडिशा में इसे सुदी क्रिया या सुद्धिकरण भी कहा जाता है। ऋषि मुनियों और आयुर्वेदाचार्यों को ये अच्छे से पता होता था की संक्रमण १० से १२ दिनों के अंदर शरीर में रोग के लक्षण दिख जाते हैं। जो परिवार इस मृत्यु सूतक का पालन करते थे उनको सारे जरूरी सामान बाहर के लोग लाकर दूर से दे दिया करते थे। उन मृतुसूतक के दीनो में उस परिवार में भोजन बिना तेल मसाले का बनता था। क्योंकि आयुर्वेद के अनुसार अधिक तेल मसाला संक्रमण को शरीर में बढ़ा देगा अगर संक्रमण किसी को है तो। १०वे दिन किसी जल स्रोत के पास जाकर जान साधारण जनसुमदाय नहीं जाता हो वांग अपने पुरुष अपने बाल, दाढ़ी, और नाखूनों को कटवाते हैं। क्योंकि बाल, दाढ़ी और नाखूनों में भी सम्मान फैलानेवाले जीव रहते हैं। स्त्रियां भी अपने वालों को दही या रीठा जैसे फल के रस से धोती है और नाखून कटवाते है। पुरुष मुंडन होने पर सिरपर हल्दी लगता है।पुरुष और स्त्री जलासय में अलग अलग स्थानों पर हल्दी,चंदन आदि से स्नान करते हैं। स्नान के पश्चात नीम और तुलसी आदि पत्तो का सेवन करते है। यांहा बता दूं की हल्दी, नीम और तुलसी आती एंटी बैक्टिरियल और एंटी वायरल हैं ये शरीर में रहने वाले संक्रमण को मरता है अगर अभी भी संक्रमण है तो। स्नान के पश्चात परिवार के सभी लोग घी और मद का मिश्रण सेवन करते है। आयुर्वेद के अनुसार घी और मद समान मात्रा में जहर होता है और उसकी विषम मात्रा में ही सेवन करना चाहिए। विषम मात्रा बैक्टीरिया और वायरस के लिए जहर का काम करता ही और मार देता है। पश्चात धार्मिक आदि कार्य ब्राह्मण द्वारा संपादित किया जाता है । गांव के मुखिया और जन समुदाय को जब पूरी तरह से आश्वासन मुलजाता ही की मृतक के परिवार में कोई भी संक्रमित नहीं है तब जन समुदायके साथ उस परिवार को मिलाया जाता है और सार्वजनिक कार्यों में उन्हें समीलित करने की अनुमति मिल जाती है। सनातन हिंदू धर्म में कोई भी नियम या विधि ऐसे ही नहीं जोड़ी गई ही। इसका कुछ न कुछ वैज्ञानिक कारण अवश्य ही छुपी हुई है।