रविवार, 14 जनवरी 2018

जंहा वैद्य, वणिक और ब्राह्मण नहीं रहते उस स्थान, राज्य और देश में क्यों कदापि नहीं रहना चाहिए ?

नीति शास्त्र के अंतर्गत ये बताई गयी है की मनुष्य को किस प्रकार के देश प्रदेश गांव या विस्तार में रहना चाहिए। स्थान और जगह का प्रभाव मनुष्य के जीवन पर बहुत पड़ता है। अतः नीति शास्त्र में कहा गया है की जंहा वैद्य वणिक और ब्राह्मण ना हो उस देश प्रदेह य गांव में कदापि नही रहना चाहिए। इसके पीछे एक बहुत है बड़ा रहष्य छूपा हुआ है।
जंहा वैद्य ना हो उस जगह पर अवश्य ही बीमार लोग रहते होंगे और उनके संपर्क में आते ही स्वस्थ व्यक्ति भी बीमार हो जायेगा।

वैद्य ना होने से अवश्य ही साधारण मनुष्य का स्वास्थ्य खतरे में पड़ सकता है और जिसे उसकी मृत्यु भी हो सकती है। अतः जंहा रहते हो वंह वैद्य य चिकित्सा के साधन होना अति आवश्यक है।

दूसरी चीज़ जंहा रहते हो य रहना है वंहा वणिक का होना आवश्यक है। क्योंकि अगर वणिक है तो अवश्य ही वंहा धन या पैसो का आदान प्रदान होगा और अगर धन या पैसो का आदान प्रदान होता है तो वंहा काम मिलनेगी संभावना अधिक होगी और आजीविका चलानेके स्रोत भी होंगे।तो मनुष्य को अजिबिक के साधन सरलता से प्राप्त हो जायेगा।

तीसरी  चीज़ वंहा ब्राह्मणों का होना भी अति आवश्यक है। आज कल के भुद्धि जीवो के मन मे प्रश्न जरूर आएगा की ब्राह्मण का क्या महत्वपूर्णता है। प्राचीन काल मे जो ज्ञानवान होते थे और जिन्होंने वेद शास्त्र, पुराण, उपनिषद ओर नीतियों का ज्ञान होता था । उन्हें वो ब्राह्मण कहते थे। ब्राह्मण के रहने से लोगो को धर्म अधर्म का ज्ञान होता है और वह अच्छा दिशानिर्देश करते है। बहुत से मुश्किल परिस्थितियों मे वो लोगो को सलाह देते है। सायद इसी कारण बहुत से राजाओं के राज्य सभा में उच्चकोटि के ज्ञानी ब्राह्मण हुआ करते थे ताकि वो राजाओ को सलाह दे सके। जिस देश में ब्राह्मण नहीं होते थे। उन देशो के राजाओं ने बहुत से निर्दोषों को सूलि पर चढ़ा दिया गया था। अर्थात उस देश या स्थान मे नहीं रहना चाहिए जिस जगह प्रशासनिक अधिकारियों या मंत्रियों का कोई सलाहकार अगर नहीं होता है।

गुरुवार, 11 जनवरी 2018

किस प्रकार के मनुष्यों को ज्ञान देना चाहिए और किस प्रकार के मनुष्यों को ज्ञान नहीं देनी चाहिए।

नीति शास्त्रों मे अगर ये कहा गया है की किस प्रकार के लोगों से ज्ञान ग्रहण करनी चाहिए । तो नीति शाश्त्र के अंतर्गत ये भी कहा गया है की किस प्रकार के लोगों को ज्ञान देनी चाहिए और किस प्रकार के लोगों को ज्ञान नहीं देनी चाहिए। ज्ञान देना और नहीं देने का प्रयोजन समाज और मनुष्य की सुरक्षा से जुड़ा हुआ मानते है। ज्ञान उसे ही देनी चाहिए जो उस ज्ञान को पानेका सामर्थ्य और योग्यता रखते है। सदैब ये ध्यान रखनी चाहिए की जब हम किसी को विशेष ज्ञान देते है। उस मनुष्य की परीक्षा भी ले लेनी चाहिए की वो उस ज्ञान का अधिकारी है या नहीं। अन्यथा समाज में रहनेवाले लोगों का जीवन अशुरक्षित हो जायेगी। इसी कारण ऋषि मुनियों ने मंत्र और तंत्र आदि रहष्य मई विद्याओं को साधारण मनुष्यों से दूर रखा था।

जिस प्रकार आज किसी भी क्षेत्र में तकनीकी पढ़ाई के लिए विशेष परीक्षाएं देनी पड़ती है। उसी तरह प्राचीन काल में गुरु उनके शिष्यों से विशेष परीक्षा लेते थे। ये परीक्षायें उनके स्वभाव, सोच, उनकी व्यक्तित्व और मानसिकता पर आधारित होती थी। उन परीक्षाओं में उत्तीर्ण होने वाले को ही गुरु विशेष ज्ञान देते थे।