शुक्रवार, 8 सितंबर 2023

आवाहन मंत्र से पहले और विसर्जन मंत्र के बाद मूर्तियों का कोई महत्व नहीं रहता । अतः विसर्जन करना अनिवार्य ही होता है।

आज के युग में हिंदू भावनाओं के साथ खेलना बहुत ही सरल है। क्योंकि खुद हिंदू ही अज्ञानता के साथ जी रहा है और बिना अपना ही हिंदू सनातनी शास्त्र पढ़े समझे अपने ही धर्म पर उंगली उठा रहा है। हिंदुओं को समझना चाहिए की उन्हें अपने ही शास्त्रों को अच्छे से पढ़े और समझे।

वृक्ष के नीचे पड़े हुए कुछ देवी देवताओं के फोटो और मूर्तियां और गणपति के विसर्जन के पश्चात जो मूर्तियां समुद्र और नदियों में पूरी तरह से घुलती नहीं हैं तो उसे दूसरे धर्म के लोग और खुद पढ़े लिखे हिंदू जो खुद के शास्त्र भी नहीं पढ़े है  ये देखकर बोलते है पूजा के टाइम गणपति बापा मौर्य, जय श्री राम और जय माता दी करते है और देवी देवताओं की मूर्तियों को, चित्रों को और यंत्रों को यंहा वहां फेक देते हैं । जिनसे उनका अपमान होता है। 

देखो शास्त्रों के अनुसार मूर्तियों का महत्व तब आता हैं । जब उनमें आवाहन मंत्र, प्राण संचरण मंत्र, पंच प्राण आदि दिए जाते है और मंत्रों से मूर्तियों को भावित करते हैं। तब मूर्ति, चित्र और यंत्र जागृत होते हैं और पूजा के पश्चात उन्हें विसर्जन आदि मंत्रों से देवता को उनके स्वस्थान को आदर और भक्ति सहित भेज दिया जाता है। उसके पश्चात उस मूर्ति में कोई देवता नहीं रहता हैं। उस मूर्तियों को नदी, तलाब और समुद्र आदि जलाशयों में प्रवाहित कर दिया जाता है। इसे देवता और देवी का कोई असमान नहीं होता । जो मूर्तियां या चित्र मिट्टी, लकड़ी और कागज़ आदि से बनते है। अर्थात जो लंबे समय तक नहीं रखे जा सकते उन्हें पार्थिव मूर्तियां कहा जाता है और उन्हें विसर्जन करना अनिवार्य है। क्योंकि ऐसी मूर्तियां धीरे धीरे नष्ट खंडित होने लगती है समय के अंतराल में । जो मूर्तियां पत्थर और धातुओं से बनती हैं। जिन्हे मंदिर और गृह में रखे जाते हैं। उनमें सिर्फ प्राण प्रतिष्ठा मंत्र ही पढ़े जाते हैं। अगर किसी तरह से ऐसे मूर्तियां चित्र या यंत्र खंडित होते है तो उन्हें भी विसर्जन करना अनिवार्य हो जाता है। आजकल कुछ ऐसे लोग है जो नदी और जलाशयों में मूर्ति प्रवाहित करने से मना करते हैं ताकि जलाशयों में प्रदूषण ना हो। भले ही १०० कंपनियों के ड्रेनेज लाइन समुद्र और नदियों में छोड़ तो उसे पॉल्यूशन नहीं होता है। पॉल्यूशन सिर्फ नदियों, तलाब और समुद्र में सिर्फ मूर्ति विसर्जन और फुल पते डालने से होता है। इसी कारण लोग देवी देवताओं के खंडित मूर्ति और चित्रों को पेड़ों के नीचे छोड़ जाते हैं। मूर्ति आजकल प्लास्टर ऑफ पेरिस से बनती है। जिसे मूर्तियां पानी में सरलता से घुलती नहीं हैं और जलाशयों में प्रदूषण होता है। पर इस से विसर्जन के पश्चात देवी देवताओं का कोई अनादर नही होता है। गणेश चतुर्थी आदि त्योहारों में मूर्तियां मिटी आदि से ही बनाना चाहिए।  

बुधवार, 6 सितंबर 2023

क्या प्याज और लहसुन मांसाहार है सनातन धर्म है?

 क्या प्याज और लहसुन मांसाहार है? हमारे सनातन धर्म में बहुत से कहानियां हैं जो प्याज और लहसुन से जोड़ दिया गया है। इसकी वास्तिविकता के बारे में जानेंगे। जितने भी वैष्णव संप्रदाय के लोग है वो प्याज, लहसुन और मसूर की दालों का सेवन नहीं करते क्योंकि की वो इसे मांशहार मानते है। मांसाहार भोजन को आमिश और शाकाहार भोजन को निरामिष भी कहा जाता है। इस दो प्रकार के भोजन के अलावा दो और प्रकार के भोजन भी है तामसिक और सात्विक भोजन। मांसाहार भोजन को हम तामसिक भोजन कह सकते हैं। पर प्याज लहसुन जिस भोजन में उपयोग हुआ हो उसे मांसहार भोजन नहीं कह सकते जब तक उसमे किसी जीव का मांस उपयोग नहीं हुआ हो। सभी मांसहार भोजन तामसिक है। पर सभी तामसिक भोजन मांसहार नहीं है। ऐसा क्यों, प्याज, लहसुन और मसूर की दाल खाने से मनुष्य में गर्मी पढ़ती है और तामसिक प्रवृति का उदय होता है। जो सात्विक व्रत या साधना करते हैं। ये उनके साधना मार्ग में रुकावट उत्पन करेगा और उलझा देगा। अतः इसी कारण वैष्णव और सात्विक मार्ग में ऐसे भोजनों का सेवन नहीं करते है। प्याज, लहसुन और मसूर ये पौधों से ही प्राप्त होते हैं। इसी कारण इसे बहुत से लोककथाओं को जोड़ दिया गया है। मेरी मम्मी से भी मेने एक ऐसे ही कहानी सुनी थी। जिसमें एक ऋषि था जो गलती से एक राक्षसी से शादी कर लिए । उस ऋषि का एक गाय था। तो वो ऋषि एक दिन स्नान करने गया था और वो राक्षसी को मांस खाने का मन हुआ तो उसने वो गाय को मारकर उस के मांस को पक्का लिया और खा गई। उस गाय का सिर्फ चमड़ा बचा था । उसका पति वो चमड़ा देखकर श्राप दे देगा जानकरके उसने वो चमड़ा को जमीन में गाढ़ देता है और पति को बोलती है की गाय कहीं खो गई है। कुछ दिन के पश्चात उस चमड़े से उसकी बाहर की परद से लहसुन का पौधा और अंदर के रक्तवाले परद से प्याज का पौधा जन्म लेता है। तो वो ऋषि को पता चलता है तो वो अपने पत्नी को श्राप देकर मार डालती है। ऐसी अनेकों कहानी है जो प्याज और लहसुन से जुड़ी हुई है। साधारण लोगों को समझाने के लिए ये कहानी बनाई।गई थी क्योंकि चमड़े से पौधों का जन्म संभव नहीं हो सकता। प्रॉब्लम प्याज लहसुन और मसूर के गुण स्वभाव से है। प्याज और लहसुन आयुर्वेद के अनुसार शरीर में ऊष्मा वीर्य बनाती है। जिससे कामुक भाव मतलब सेक्सुअल डिजायर्स को बहुत बढ़ता है। जो अध्यात्म मार्ग का शत्रु है। इसिकरण इसे वैष्णव और सात्विक साधक सेवन नहीं करते है। प्याज और लहसुन में बहुत से औषधि गुण भी रखते है। अतः इसे मांसहार कहना गलत है। हां पर ये तामसिक जरूर है।

रविवार, 20 अगस्त 2023

मृत्यु संस्कार या अंतिम संस्कार का ११ से १३ दिन ही क्यों पालन किया जाता है? इसका वैज्ञानिक रहस्य क्या है?

सनातन हिंदू धर्म में मृत्यु संस्कार या जिसे अंतिम संस्कार कहा जाता है । उसे ११ या १३ दिन तक ही क्यों पालन किया जाता है। कुछ इसे अंधविश्वास कहते है कुछ इसे आत्मा की मुक्ति के लिए आवश्यक मानते है। इसकी वैज्ञानिकता क्या है। क्या इसके पीछे कोई वैज्ञानिक कारण भी छिपा हुआ है। हम वर्तमान कुछ वर्ष पूर्व घटी एक घटना पर नजर डालते है जो करना महामारी के रूप में सामने आया था। सरकार हर किसी पर नजर रखी हुई थी। कहीं कोई अगर कोरोना रोगी का पता चलता, उस परिवार के लोगों को १४ दिन की क्वारेंटाइन कर दिया जाता था । ताकि ये रोग और किसी को संक्रमित ना करें। इस क्वारेंटाईन में लोग किसी सार्वजनिक जगहों पर नहीं जा सकते थे और अपने घरों में ही रहते थे। डॉक्टरों के अनुसार १४ दिन कोरोन वायरस का इनक्यूबेशन पीरियड है अर्थात वृद्धि समय ।अगर कोई व्यक्ति किसी कोरोना वायरस रोगी के संपर्क में अगर आया है तो उसमे कम से कम १४ दिन के समय अंतराल में उस व्यक्ति में भी कोरोना वायरस रोग के लक्षण दिखने लगेंगे। 
प्राचीन काल में किसी परिवार में कोई व्यक्ति मार जाता था और मृत्यु का कारण ज्यादातर नहीं पता होता था। संभावित उस व्यक्ति की मृत्यु किसी संक्रमण से हुआ हो और वो संक्रमण महामारी के रूप में जनसमाज में फैल सकता हो। इसी कारण जनसमुदाय के मुखियाओं ने या राजा के आदेश अनुसार या ऋषि मुनि और आयुर्वेद आचार्यों द्वारा एक नियम बनाया गया की जिस परिवार में किसी सदस्य की अगर मृत्यु होती है तो उसे ११ से १३ दिन तक सार्वजनिक जगहों से निष्कासित रहना होगा। सार्वजनिक जगह जैसे मंदिर, कुंवा, नदी, विवाह, त्योहार, गुरुकुल आदि। क्योंकि ये जगह ऐसी हुआ करती थी की समाज के सभी लोग इन जगहों पर आया करते थे और उनमें संक्रमण फैलने का खतरा होता था। भारत के कुछ जगहों पर इसे ११ दिन तक और कुछ जगहों पर इसे मृत्यु सूतक क्रिया को १३ दिन भी पालन किया जाता है। ओडिशा में इसे सुदी क्रिया या सुद्धिकरण भी कहा जाता है। ऋषि मुनियों और आयुर्वेदाचार्यों को ये अच्छे से पता होता था की संक्रमण १० से १२ दिनों के अंदर शरीर में रोग के लक्षण दिख जाते हैं। जो परिवार इस मृत्यु सूतक का पालन करते थे उनको सारे जरूरी सामान बाहर के लोग लाकर दूर से दे दिया करते थे। उन मृतुसूतक के दीनो में उस परिवार में भोजन बिना तेल मसाले का बनता था। क्योंकि आयुर्वेद के अनुसार अधिक तेल मसाला संक्रमण को शरीर में बढ़ा देगा अगर संक्रमण किसी को है तो। १०वे दिन किसी जल स्रोत के पास जाकर जान साधारण जनसुमदाय नहीं जाता हो वांग अपने पुरुष अपने बाल, दाढ़ी, और नाखूनों को कटवाते हैं। क्योंकि बाल, दाढ़ी और नाखूनों में भी सम्मान फैलानेवाले जीव रहते हैं। स्त्रियां भी अपने वालों को दही या रीठा जैसे फल के रस से धोती है और नाखून कटवाते है। पुरुष मुंडन होने पर सिरपर हल्दी लगता है।पुरुष और स्त्री जलासय में अलग अलग स्थानों पर हल्दी,चंदन आदि से स्नान करते हैं। स्नान के पश्चात नीम और तुलसी आदि पत्तो का सेवन करते है। यांहा बता दूं की हल्दी, नीम और तुलसी आती एंटी बैक्टिरियल और एंटी वायरल हैं ये शरीर में रहने वाले संक्रमण को मरता है अगर अभी भी संक्रमण है तो। स्नान के पश्चात परिवार के सभी लोग घी और मद का मिश्रण सेवन करते है। आयुर्वेद के अनुसार घी और मद समान मात्रा में जहर होता है और उसकी विषम मात्रा में ही सेवन करना चाहिए। विषम मात्रा बैक्टीरिया और वायरस के लिए जहर का काम करता ही और मार देता है। पश्चात धार्मिक आदि कार्य ब्राह्मण द्वारा संपादित किया जाता है । गांव के मुखिया और जन समुदाय को जब पूरी तरह से आश्वासन मुलजाता ही की मृतक के परिवार में कोई भी संक्रमित नहीं है तब जन समुदायके साथ उस परिवार को मिलाया जाता है और सार्वजनिक कार्यों में उन्हें समीलित करने की अनुमति मिल जाती है। सनातन हिंदू धर्म में कोई भी नियम या विधि ऐसे ही नहीं जोड़ी गई ही। इसका कुछ न कुछ वैज्ञानिक कारण अवश्य ही छुपी हुई है।

सोमवार, 13 मार्च 2023

क्या आध्यात्मिक दृष्टि से धन संपत्ति कमाना, संचय या भोग करना पाप है ?

जैसे की आज के बड़े बड़े साधु और संन्यासी अपने उपदेशों में ये कह देते हैं की धन संजय करना पाप है और धन एक माया है। यही धन आपको भोग और विलास की ओर ले जायेगा। संसार के भोग को भोगना भी पाप है। जबकि वोही खुद साधु और सन्यासी आज कल करोड़ों की संपति रखते हैं और अपने अनुयायियों से करोड़ों में दान ग्रहण करते है। ये महापाखंड हैं। मुझे याद आता है मिथिला नरेश जनक जी का जिन्हे बड़े बड़े ऋषि मुनि योगी यति और सन्यासी प्रणाम किया करते थे। वो राजाकार्यों में भी मन लगाते थे और आध्यात्मिक कार्यों में भी। वो राजा होकर सभी प्रकार के भोग विलास शुख  भी भोगते और विपुल संपति के स्वामी थे। आज कल के साधु, सन्यासी, यति और योगियों को यह समझना चाहिए की धन संपति और भोग में कोई पाप नहीं है और नाहीं यह मोक्ष प्राप्ति के अवरोधक हैं। पाप तो धन संपति और भोग विलास की कामना में हैं। जनक जी सब ईश्वरीय इच्छा समझ कर कार्य करते थे । जिन्हे वो जानते थे की यह सब एक दिन नष्ट हो जाएगा, ये सब न्नश्वर है। इसी कारण जनक जी को राजऋषी की उपाधि दी गई थी और वो अष्टावक्र जैसे महान ऋषि के शिष्य रहे हैं। इस कहानी का सारांश यह है की भोग में दोष नहीं है, बल्कि भोग भोगने की इच्छा में है। अगर मानव शरीर मिला है तो शरीर को भोजन चाहिए, वस्त्र चाहिए और कामसुख भी चाहिए। पर इसे शरीर की आवश्यकता मानकर और ईश्वर की इच्छा मानकर ही भोगना चाहिए। प्रयत्न करना चाहिए की भोग की इच्छा उत्पन ना हो। शरीर को भूख लगा भोजन कर लिया, प्यास लगी पानी पी लिया, थकान लगी और निद्रा लगी सो गए। कुछ संत बोलेंगे ये तो सहज क्रिया है ना की भोग । भाई ये सब भोग ही है शरीर भोगता है । दोष भोग भोगने की इच्छा और कल्पना में है। क्योंकि अगर कामना उत्पन होती रही और मृत्यु के समय भी कमाना जाग गई तो मोक्ष असंभव हो जायेगा । भोग भोगने की इच्छा मनुष्य को ईश्वरीय भाव की जागृति होने नहीं देगी। इसी कारण जीवन में भोग भोगने की इच्छा को मारने की अभ्यास करते रहन चाहिए । पर जो भोग सहज प्राप्त हो रहा है उसे ईश्वरीय इच्छा समझ कर भोगना चाहिए। 
अगर धन और संपत्ति अर्जन करना या संचय करना पाप है। तो मनुष्य का भविष्य अंधकारमय होगा। सनातन धर्म के शास्त्रों में एक शास्त्र है अर्थशास्त्र । उस शास्त्र का भी कोई प्रयोजन नहीं रहेगा । या तो अर्थशास्त्र का होना गलत है या तो फिर पाखंडी साधु, संत और धर्म गुरु का प्रवचन गलत है। उसी प्रकार कामुक भोग अगर गलत है तो कामसूत्र जैसे शास्त्रों का होना भी गलत है।
अगर कोई मनुष्य धन उपार्जन और संचय नहीं करेगा तो वो भविष्य में होने वाली अनिश्चितता से नही बच पाएगा। इसीलिए अतित्काल में बहुत से राजवंश नष्ट हो गए क्योंकि वो धन संचित नही कर पाए। साधु, सन्यासी और कुछ धर्म गुरु एक उदाहरण देते ही की देखो धन संचित करनेवाला मनुष्य का जीवन मधुमक्खियों के जीवन जैसा जीता है। अंत में कोई मनुष्य आता है मधुमक्खी का छाता तोड़ कर संग्रहित मधु को चुरा ले जाता है। उसी प्रकार संचित धन को भी कोई ले जायेगा। यह तर्क पूर्ण रूप से अतर्किक है। मनुष्य हर मधुमक्खी के छाते से मद चुरा नहीं सकता । मधुमखियां अपना छाता कुछ ऊंचे वृक्ष के डालियों पर भी बनाते है। जो मनुष्य के लिए एक दुर्गम स्थान होता है । जांहासे किसी मनुष्य के लिए मद चुराना एक दुषाध्य सा काम लगता है। इसलिए सभी संचित धन को चुराया नहीं जा सकता। भले संचित मनुष्य उसका भोग ना कर पाए पर उसके परिवार के सदस्य भविष्य में उसका भोग जरूर कर सकेंगे। 
अगर धन संचित करना पाप है तो पुत्र प्राप्ति के लिए विवाह करना भी पाप है। क्योंकि मनुष्य का जीवन भी अनिश्चित है । हो सकत है जो पुत्र धन की प्राप्ति हुई हो वो कम वयश में ही मृत्यु को प्राप्त हो जाए और जो अपने पुत्र पर खर्चा किया वो भी व्यर्थ हो जाए सब। अगर धन संचित करना पाप है तो पढ़ाई लिखाई करना और ज्ञान का संचय करना भी पाप है। क्योंकि की मनुष्य का जीवन अनिश्चित है। सार संचित ज्ञान, विद्या, जानकारी और अनुभव नष्ट हो जायेगा मृत्यु के पश्चात। क्योंकि कोई भी वस्तु का संचय ऐसे देखोगे जीवन में तो व्यर्थ है क्योंकि जीव ही अनिश्चित है।
अतः अनिश्चित्तता से ना डरकर धन संचय करना चाहिए। यही संचित धन बहुत से अनिश्चित विपदा से आपकी बचाएगी।
तो फिर से बहुत से साधु, संत और धर्म गुरु ये बोलेंगे। शास्त्र कभी मिथ्या नहीं बोलते हैं। शास्त्र में ही लिखा है की धन संचित करना पाप है और उसकी प्रामाणिकता पेश करेंगे। मैं भी बोलता हूं शास्त्र झूट नहीं बोलते पर अधूरा शास्त्र पढ़ना भी गलत है। शास्त्र को धर्म और नीति के तराजू में तोलन भी आवश्यक है। शास्त्र को सही से समझना भी आती आवश्यक है। श्रीमद भगवत के प्रथम अध्याय में कृष्ण अर्जुन कहते है । तू युद्ध कर पार्थ। अगर युद्ध में तू विजयी होगा तो तेरी कीर्ति चारों दिशाओं में होगी और युद्ध से प्राप्त धन और राज्यों को तू जीवन भर भोगेगा। अगर युद्ध में तेरी मृत्यु होती है तो वीरगति को प्राप्त होगा स्वर्ग आदिलोक को तू प्राप्त होगा। यहां कृष्ण अर्जुन को भोग भोगने की बात कर रहे है। श्रीमद भागवत गीता परम शास्त्र है। कृष्ण झूट नहीं बोलेंगे। भोग में दोष नहीं है परंतु भोग भोगने की इच्छा में है। जो धर्मयुक्त भोग हो उसे भोगना चाहिए। मनुष्य अपने जीवन में शूख को भी भोगता है और दुःख को भी भोगता है। 
भोग भोगने की कामना में बार बार अवरोध उत्पन करना चाहिए। धन में अधिक कामना है तो जरूरतमंद मनुष्य को दान देना चाहिए। सुंदरता का अधिक कामना हो तो कुरूप मनुष्य को देखना चाहिए । अगर जीवन जीने की इच्छा हो तो समशान भूमि में जलती चिताओं को देखना चाहिए। ऐसे नजरिया या अभ्यासकरते रहने से कामनाएं नष्ट होती हैं। वो मनुष्य सभी वस्तुओं का भोग भोगकर भी योगी बनजाता है। ऐसे राजा जनक थे। जो भोग भोकर भी योगी बने गए थे।

गुरुवार, 9 मार्च 2023

उर्धगमन करना कठिन है और अधोगमन सरल है।

इस भौतिक संसार में ऊपर की तरफ जाना बहुत कठिन है और नीच की तरफ गिरना सरल। ऊपर की तरफ जाने को हम उर्धोगमन और नीचे की तरफ जाने को अधोगमन कहते है। संसार की हर स्थान और कार्य में ये उर्धोगमन और अधोगमन का नियम लागू होता है।
भौतिक क्रीडा जगत में, एक पर्वतारोही को पहाड़ पर चढ़ना अत्यधिक कठिन भरा कार्य है। जबकि उसे नीचे की तरफ गिरने में कोई कठिनाई और प्रयत्न की जरूरत नहीं होती है। गिरते ही प्राण जाने की संभावना भी होती है। 
किसी भी मनुष्य को अपनी प्रतिष्ठा, ख्याति और सम्मान स्थापन करने में बहुतसा समय, परिश्रम और मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। वहीं उसी प्रतिष्ठा, ख्याति और सम्मान को नष्ट करने में कोई कठिनाई, परिश्रम और मुश्किलों का सामना नहीं करना पड़ता है। बस पल भर में नष्ट किए जा सकते है। अगर कोई एक त्रुटिपूर्ण कार्य किए जाए तो।
तपस्वी कई वर्षो की तपस्या से अर्जित शक्ति और पुण्य को संचित करता है। अपनी तपस्या की शक्ति और पुण्य से संसार की कोई भी वस्तु को प्राप्त कर सकता है। तपस्वी को सदैव सावधान रहना चाहिए। ताकि उसके कोई सामान्य पापाचार कार्य होने पर भी उसकी सारी शक्ति, सामर्थ्य और पुण्य क्षीण हो सकते हैं। वर्षो की तपस्या से अर्जित शक्ति, सामर्थ्य और पुण्य क्षणभर में नष्ट हो जा सकते है।
एक ब्रह्मचारी अपने बाल्यकाल से ही ब्रह्मचर्य की दीक्षा लिया हुआ है। अपने बाल्यकाल से ही वो नारी की तरफ दृष्टि नहीं डालता है और वीर्य रक्षा में तत्पर रहता है। योग साधना से अपने वीर्य को संचित करता है और योग अभ्यास से वीर्य को उर्धगामन करता है। पर अचानक स्त्री के संसर्ग में आने पर काम शुख भोगने की इच्छा तीव्र हो जाती है और क्षणिक शूख के लिए मैथुन करता है  और अपनी संचित वीर्य का अधोगमन करता है। इतने दिन की तपस्या को क्षण भर में ही नष्ट कर देता है।
किसी चरित्रवान मनुष्य को चरित्रवान बने रहने में बहुत संयमता का पालन करना पड़ता है और उसी व्यक्ति को चरित्रहीन बनने में समय नहीं लगता। अतः मनुष्य को उर्धगमन करनी चाहिए और क्षणिक शुख से अधोगमन की और अग्रसर नहीं होना चाहिए। अधोगमन एक सहज प्राकृतिक प्रक्रिया है। उर्धगमन करना ही मनुष्य का परम लक्ष्य होना चाहिए। तो ही वो संसार से परे जा सकता है और दुसरो से अलग होकर कुछ बन सकत है। सफल और असफल मनुष्य के बीच यही अंतर होता है। साधारण मनुष्य और ब्रह्मऋषि (योगी) के बीच यही अंतर होता है।

जय महाकाल