बुधवार, 16 नवंबर 2022

दुर्बल व्यक्ति कभी भी समाज में शांति और संतुलन की स्थापना नहीं कर सकता |

हमारे देश में अक्सर ऐसे लोग मिल जाते है जो कहते रहते ही की गांधीवादी बनो । अहिंसा का पालन करो और कोई एक गाल पे थपड़ मारे तो उसे दूसरा गाल दिखा दो। पर उसके साथ किसी भी प्रकार उसे मारो मत या हिंसा का सहारा मत लो। ऐसे करने से उस आदमी में पश्चाताप का एहसास होगा और समाज में हिंसा कम हो जायेगी। समाज में शांति की स्थापना होगी। इस तरह की सोच समाज को बरबाद कर देगी और तबाह कर देगी । ऐसी सोच सिर्फ मूर्ख रखते हैं। समाज में कल्याण और शांति स्थापन करने के शक्ति का भी संतुलन होना अति आवश्यक है। हमारे प्राचीन ग्रंथो में बहुत से कथा कहानियां पाई जाती है। 
हिरण कभी शेर से शांति वार्ता कर नहीं सकता क्योंकि हिरण की वो सामर्थ्य ही नहीं है। जो गांधीवादी बोलते हैं की सारे अस्त्र और शस्त्रों को फेक दो । ये बेवकूफी वाला काम है। प्राचीन काल में जब जब असुरों ने तपस्या कर देवताओं से अधिक शक्तिशाली होने का प्रयत्न किया तब तब देवताओं ने अपनी शक्ति सामर्थ्य का वृद्धि कराया। ताकि देव और असुरों में संतुलन बना रहे। शक्ति और सामर्थ्य में संतुलन रखना समाज और जाती के लिए कल्याण कारक होता है। जंगल में अपने देखा होगा की दो समान शक्ति वाले पशु कभी भी नहीं लढ़ते। क्योंकि एक को दूसरे से भय बना रहता है। अगर युद्ध होता भी हे तो दोनों को ही क्षति होती है और तभी ही किसी पशु की प्राण जायेगी जब दोनों के बीच शक्ति का असंतुलन बढ़ जाएगा। पूर्व में जितने भी विश्वयुद्ध हुए हैं उनसबका एक ही कारण है शक्ति की असंतुलनता। जब लगभग बहुत से देशों के पास परमाणु बम उपस्थित है। उसी कारण से सभी देशों के बीच एक भय है की कहीं हमारे ऊपर भी परमाणु बम ना फेक दिया जाए। इस संदर्भ में हिंदी कहावत है की "मरता क्या ना करता"। जो देश परमाणु बम के आक्रमण से नष्ट हो रहा हो । वो देश अंतिम क्षण में किसी भी शक्तिशाली देश के ऊपर परमाणु बम फेक देगा। ये एक सीधा सा मनोविज्ञान है। जंगल में शेर कभी बाघ को मारकर बाघ मांस नहीं खायेगा। शेर को भी पता है अगर में बाघ का शिकार किया भी तो शायद बाघ का हमला भी उसके लिए पतन घातक हो सकता है।
भारत में आज़ादी के बाद ऐसे बहुत से बेवकूफ नेता हुए । जो ये कहते थे कि हमारे देश में सैन्य शक्ति की क्या आवश्यकता है। हम तो शांति प्रिय देश हैं। सैन्य शक्ति को बैन कर दिया जाना चाहिए। हम तो शांति के पैरवी करनेवाले हैं और कुछ विदेशी ताकतों ने हमारी सैन्य शक्ति को बंद करवाना भी चाहते थे। हमारे अपने बेवकूफ नेताओं की वजह से हथियार बनान भी लगभग बंद कर दिया गया था फैक्ट्रियों में और उन फैक्टरियों में जूते चप्पल बनाया जरहा था। ठीक उसी समय हमारे पड़ोसी देश चीन ने आक्रमण कर दिया ये सोच कर की भारत तो कमजोर है और वो युद्ध जीत भी गया। हमारी कुछ जमीन भी उनके कब्जे में चली गई।
अगर में सच कहूं तो प्रतेक मनुष्य के जीवन में एक शत्रु का होना अति आवश्यक है। इसे उसकी सामर्थ्य, योग्यता और शक्ति जानने में सहायक होती है। हमारे देश भारत का भाग्य बहुत अच्छा था की बेवकूफ नेताओं के सोच पर नहीं रहा और भारत को दो पड़ोसी शत्रु मिलगाए । एक पाकिस्तान और चीन, जिसने भारत को लड़ने और स्मार्थ्य बढ़ने पर विवश कर दिया । हमे चीन और पाकिस्तान का मन ही मन धन्यवाद भी करना चाहिए।
यही प्रकृति का नियम है की शक्तिशाली लोग ही दुर्बल लोगों पर शासन करते हैं। अगर समय रहते दुर्बल लोग अगर अपनी शक्ति में वृद्धि नहीं करते तो निश्चय ही भविष्य में वो खत्म कर दिए जाएंगे और गुलाम बना लिए जायेंगे। यही आदि काल से होता आया है और होता रहेगा। सनातन धर्म में कहीं ऐसा नहीं कहा ही की मार खाकर बैठ जाओ और पलटवार मत करो । लोगों ने अहिंसा का अर्थ ही बदल दिया है। महाभारत में कहा गया है की "अहिंस परमो धर्म । धर्म हिंसा तथैव च ||" बेशक अहिंसा परम धर्म है पर धर्म की रक्षा में हिंसा करना उसे भी अच्छा है।  मनुष्य के पास इतनी तो सामर्थ्य अवश्य ही होना चाहिए की वो अपनी रक्षा कर सके। कोई भगवान नहीं उतारेंगे आपकी रक्षा करने। इसलिए सनातन धर्म में ऐसे बहुत से देवी देवता उपस्थित है जो अस्त्र और शस्त्र धारण किए हुए हैं।

जय महाकाल