नीति शास्त्रो के नियमा अनुशार अगर किसी से शत्रुता होती है तो उसके साथ पूर्ण रूप से शत्रुता निभानी चाहिए और अगर किसी कारण वश शत्रु को क्षमा दान देना पड़े तो क्षमा के पश्चात उसे कतपि पूर्ण रूप से मित्रता और विश्वाश नहीं करनी चाहिए।
जिस प्रकार आस्तीन या घर में रहे हुए सांप पर पूर्ण रूप से यह नहीं कहा जा सकता की सांप नहीं कांटने की संभावना कितनी है। उसी प्रकार शत्रु से मित्र बने हुए लोगो पर स्वयं के प्राण संकट में पड़ने का खतरा बना रहता है। अतः इस प्रकार के शत्रुओ से सचेत रहना आवश्यक होता है।
क्षमा दान के पश्चात हो सकता है की वो शत्रु से बने मित्र व्यक्ति के भाव बदल जाये और उसके मन में प्रतिशोध के भाव जागृत हो जाये। इस प्रकारके से शत्रु कभी भी सामने से प्रहार नहीं करते परन्तु अप्रत्यक्ष रूप मे प्रहार करते है। इससे हो सकता है की आपकी कीर्ति, सम्मान और प्राण खतरे मे पड़ जाये।
बिच्छू का स्वभाव हमेशा डंक मारना होता है। उसी प्रकार किसी प्रकार के शत्रु का स्वभाव अपने शत्रु का विनाश करना होता। चाहे वो प्रतेक्ष हो या अप्रतेक्ष रूप से।
धन्यबाद








