रविवार, 12 मार्च 2017

नीति शास्त्र और धर्म अधर्म का ज्ञान

अगर कोई व्यक्ति नीति शास्त्र का यथार्थ अभ्यास और पालन करत है। तो उस व्यक्ति को स्वतः ही पता चल जायेगा की कौनसा काम करने से उसे अच्छा परिणाम मिलेगा और किसे करने से अच्छा परिणाम नही मिलेगा। तातपर्य उसे सभी धर्म अधर्म का ज्ञान हो जाता है।- चाणक्य

चाणक्य कहते हैं नीति शास्त्र का अभ्यास करने वाला और नीति शास्त्र में बताये गए उपदेशो का पालन करने वाला कभी किसी भी काम में असफल नहीं हो सकता। क्योंकि उसे स्वतः ही सभी अच्छे बुरे घटनाओं का आभाश होने लगता है। उसे ये भी ज्ञान हो जाता है की कौन सा काम करने से सफलता मिलेगी और किस काम को करने से असफलता का मुंह देखना पड़ेगा। नीति सास्त्र को जाननेवाले लगभग सब कुछ जाननेवाला वन जाता है। स्वतः ही बिना अस्त्र और सास्त्र के सत्रु परास्त हो जाते हैं। जिस प्रकार से चाणक्य ने घंना नंद के पूरे वंश का नाश कर दिया था। महाभारत में भी कई नीतिशास्त्र के ज्ञाताओं के बारे में जानने मिलता हैं। जैसे की कृष्ण, विदुर और संकूनि, ये सभी नीति शास्त्रों धुरंधर माने जाते थे। संकुनि ने ये प्रण लिए थे की वो कौरव वंश का पूरी तरह से नाश कर देंगे। वास्तविक रूप से महाभारत युद्ध का मुख्य सूत्र धार शंकुनि था।। नीति शास्त्र का अभ्यास करने से समाज में धर्म का शासन बना रहता है।

गुरुवार, 9 मार्च 2017

नीति शाश्त्र का श्रोत (प्रथम अध्याय-1)

में तीनों लोकों के अधिपति भगवान विष्णु जी को नतमस्तक हो कर नमस्कार करता हूँ । बिभीन प्रकार शस्त्रों का जो सार शास्त्रा है उस राजनीति शास्त्रा उसका में व्यख्यान करता हूँ । -चाणक्य

चाणक्य सभी शास्त्रों को मंथन करने के बाद जो अमृत रूप में प्राप्त नीति शास्त्र है उसका व्यख्यान करने से पहले तिनिलोकों के स्वामी भगवान विष्णु को नमस्कार करते हैं। क्योंकि सभी शास्त्र का उद्गम स्थान तो भगवान श्री विष्णु का कंठ हैं। चाहे वो वेद हो या पुराण । किसी भी चीज़ का सुरुआत करने से पहले परमेश्वर का स्मरण करना चाहिए और उस परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए की "है प्रभु मे जो काम तेरा स्मरण करके सुरु करता हूँ उस काम में मुझे तु निर्विघ्न सफल बना।  नीति शास्त्र में भी केइ प्रकार के शाखाएं होती हैं । उनमें से कुछ है जैसे की युद्ध नीति, राजनीति और कूटनीति आदि। प्राचीन काल में जो लोग राजापाठ संभालते हैं या राजाओं को जो सलाह देते हैं। उन्हें राजनीति का अभ्यास करते हैं। राजनीति शास्त्र में ये बताया गया है की राजा को कैसा होना चाहिए और एक राज को कीन नियमों को पालन करना चाहिए।

मंगलवार, 6 दिसंबर 2016

नीति शास्त्र का परीचय

हिन्दू धर्म के प्राचीन ग्रंथो मे ये लिखा है की मनुष्य अपने जीवन को सफल बनाना चाहता है तो उसे चार जिजो को पाने का लक्ष्य रखना चाहिए । वो चार प्रकार के लक्ष्य हैं -धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष । इन चारों में से धर्म का पहला स्थान है । धर्म का अर्थ है की मनुष्य को अपनी जिंदगी में क्या चीज़ करनी चाहिए और क्या चीज़ नहीं करनी चाहिए । इन सबका ज्ञान एक ही सास्त्र मे लिखा है । उस शास्त्र का नाम नीति शास्त्र है । जैसे ही इस शास्त्र का नाम कहा गया है । नीति का अर्थ होता है । कर्तव्य या नियम, इससे साधारण मनुष्य को भी ये ज्ञान हो जाता है की उसे अपने जीवन काल मे क्या करनी चाहिए और क्या नही करनी चाहिए । नीति शास्त्र के अनुसार अगर काम किया जाये तो उसे किसी प्रकार का पाप का दोष नहीं लगता। नीति शास्त्र मे भी केइ प्रकार के है । महाभारत और रामायण मे भी नीति शास्त्र का उलेख्य किया गया है । चाणक्य का नीति शास्त्र, बिदूर का नीति शास्त्र और शुक्र नीति शास्त्र के वर्णन मिलते है। नीति शास्त्रो में किंन परिस्थितियों में युद्ध करनी चाहिए या नहीं करनी चाहिए । उन सबका वर्णन मिलता है। महाभारत में जब अर्जुन अपने संबंधियों को अपने प्रतिद्वंदी के रूप में अपने सामने देखकर व्याकुल हो जाता है । उस समय भगवान कृष्ण उसे नीति ज्ञान के बारे में बताया था। श्री मद् भगवत गीता एक पूर्ण नीति शास्त्र ही है। इसमें मनुष्य को अपने जीवन में क्या करनी चाहिए ओर क्या नहीं करनी चाहिए उन सबका ज्ञान भरा हुआ है। अर्जुन कृष्ण से पूछता है । है प्रभु में अपने ही सगे और सम्भधियों का बध कैसे करूँ। ये तो नीति के विरुद्ध है। तब कृष्ण कहते है अर्जुन तु ज्ञानीयो के भाति वचनो को केहत है पर तु वास्तविकता से अनजान हैं। नीति सास्त्र केहता है। जो भी मनुष्य धर्म के विरुद्ध हो और अधर्म पर आरूढ़ हो वो कितना भी पुण्य आत्मा हो या सगा हो उसका साथ नही देना चाहिए। अगर युद्ध करना पड़े भी तो उनके साथ युद्ध करनी चाहिए। दुशरी तरफ वो सब तेरे सत्रु हैं। अगर तु उन्हें नहीं मारेगा तो वे तुझे मार देंगे। अतः तु नीति युक्त होकर धर्म आरूढ़ हो। तुझे किसी प्रकार का पाप नही लगेगा।
      नीति शास्त्र में युद्ध नीति के बारे मे भी बताया गया है। युद्ध नीति मे ये बताया गया है की कब युद्ध करनी चाहिये और कब युद्ध नहीं करनी चाहिए। किस से युद्ध करना है और किस से युद्ध नहीं करना चाहिए। सबसे महत्व पूर्ण बात ये है की ये नीति शास्त्र किसीको नपुंसक और कायर नहीं बनाता है । जिस तरह से आज के बुद्धि जिविओं ने अहिंषा का परिभाषा बताते हैं । उसे जानकर कर कोई भी नपुंशक और कायरत्व को प्राप्त निश्चित होगा। वो अपनी और अपनी परिवार की रक्षा तक करनेमे भी असमर्थ होगा। नीति शास्त्र का अगर सही तरह से अनुशरण किया जाये तो जीवन में प्रत्येक क्षेत्र में सफलता आवश्य ही प्राप्त होगी। बिना अस्त्र और शास्त्र के अपने सत्रु का विनाश करने में सक्षम हो जाएंगे। नीति शास्त्र को जानने बाला कभी दुखी नहीं होता।
ऐसा नहीं है की झूट बोलना नहीं चाहिए पर कांह झूट बोलना चाहिए और कांहा झूट नहीं बोलना हैं। इसकी जानकारी नीति शास्त्र को जानने वाला बखूबी जानता है। महाभारत में एक प्रसंग आता है की सत्यबादि युधिस्ठिर को झूट बोल ने को कहा जाता है और युधिस्ठिर किसी भी तरहा का झूठ बोलने से मना कर देते हैं। फिर भगवान कृष्ण उन्हें समझाते है की अगर हम धर्म के रहा पर हैं तो नीति शास्त्र के अनुशार झूठ बोलने में कोई पाप नहीं हैं।