मनुष्य अपने जीवन में बहुत सा कर्म करता है। कुछ अच्छे होते है और बुरे होते हैं। उन अच्छे और बुरे कर्मो के कारण मनुष्य को उन कर्मो का फल भी अच्छे और बुरे के रूप मे मिलता है। हम बहुत से कर्म स्वयं के लाभ हेतु अन्य किसी से कर्म करवाते है।
पर ऐसे बहुत से कर्म मनुष्य के जीवन मे आते हैं। जिन्हें मनुष्य को स्वयं स्वहस्त से करना चाहिए। जैसे दान, पूजा, सेवा, गुरु की सेवा, यज्ञ आहुति, देव दर्शन, गुरु दर्शन, पूर्वजों को पिंड दान, पितृ ओर मात के मृत देह को मुखाग्नि, तीर्थाटन, अपने बच्चों का पालन, प्रशाशन आदि।
विशेष कर धर्म और आध्यात्मिक कर्मो को स्वयं स्वहस्त से ही करना चाहिए। यदि इस प्रकार के कर्मो को किसी और के हाथो करवाया जाता है तो वो भी उस कर्म का पुण्य का भागी बनजाता है। अतः किये कर्मो का पुण्य घट जाता है। अतः इस प्रकार के कर्म स्वयं स्वहस्त से करना चाहिए अथवा अपनी अर्धांगी य अपने स्व पुत्र से करवाना चाहिए। अगर अपनी अर्धांगिनी या स्वपुत्र से धार्मिक कर्म करवाया जाता है तो अपनी पत्नी या पुत्र को प्राप्त पुण्य देर सवेर स्वयं प्राप्त हो जाती है।
गुरु की सेवा स्वयं स्वहस्त से करने से विशेष कृपा उस सेवक पर होती है। देव दर्शन स्वयं करने से उसका पुण्य भी स्वयं को प्राप्त होता है। यज्ञ आहुति स्वहस्त देने से उस आहुति के देवता को वो आहुति प्राप्त होती और देवता की आयु बढ़ जाती है और उस देवता की आशीर्वाद उस मनुष्य को प्राप्त होता है। अगर इस प्रकार किसी और से करवाया जाये तो वो भी इसका भागी बन जाता है।
अपने संतानों का पालन पोषण स्वयं से अच्छा और कोई नहीं कर सकता। यदि कोई मनुष्य अपने बच्चों का पालन और पोषण किसी और से करवाता है तो ये संभावनाएं अवश्य ही बनी रहती है की उन बच्चों को सही शिक्षा ना मिल सके और सही पोषण भी ना मिल पाये या तो फिर उसे असामाजिक कार्य भी सिखाया जाये।
अपने संतानों और नाति पोतों को भी स्वयं ही लाड़ प्यार करना चाहिए ताकि उनका लगाव उनके माता, पिता, दादा और दादी से बना रहे। अन्यथा अगर कोई ओर उनको लाड प्यार करता है तो उनका लगाब उसे बढ़ जाता है और अपने माता पिता से मोह कम हो जाता है। तब पुत्र और पोत्र अपने माता पिता पितामह और पितामही का श्राद य पिंड नहीं करता और बंचित रखता है।
गुरुवार, 14 जून 2018
किस प्रकार के कर्मो को स्वयं स्वहस्त से ही करनी चाहिए ?
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