गुरुवार, 9 मार्च 2023

उर्धगमन करना कठिन है और अधोगमन सरल है।

इस भौतिक संसार में ऊपर की तरफ जाना बहुत कठिन है और नीच की तरफ गिरना सरल। ऊपर की तरफ जाने को हम उर्धोगमन और नीचे की तरफ जाने को अधोगमन कहते है। संसार की हर स्थान और कार्य में ये उर्धोगमन और अधोगमन का नियम लागू होता है।
भौतिक क्रीडा जगत में, एक पर्वतारोही को पहाड़ पर चढ़ना अत्यधिक कठिन भरा कार्य है। जबकि उसे नीचे की तरफ गिरने में कोई कठिनाई और प्रयत्न की जरूरत नहीं होती है। गिरते ही प्राण जाने की संभावना भी होती है। 
किसी भी मनुष्य को अपनी प्रतिष्ठा, ख्याति और सम्मान स्थापन करने में बहुतसा समय, परिश्रम और मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। वहीं उसी प्रतिष्ठा, ख्याति और सम्मान को नष्ट करने में कोई कठिनाई, परिश्रम और मुश्किलों का सामना नहीं करना पड़ता है। बस पल भर में नष्ट किए जा सकते है। अगर कोई एक त्रुटिपूर्ण कार्य किए जाए तो।
तपस्वी कई वर्षो की तपस्या से अर्जित शक्ति और पुण्य को संचित करता है। अपनी तपस्या की शक्ति और पुण्य से संसार की कोई भी वस्तु को प्राप्त कर सकता है। तपस्वी को सदैव सावधान रहना चाहिए। ताकि उसके कोई सामान्य पापाचार कार्य होने पर भी उसकी सारी शक्ति, सामर्थ्य और पुण्य क्षीण हो सकते हैं। वर्षो की तपस्या से अर्जित शक्ति, सामर्थ्य और पुण्य क्षणभर में नष्ट हो जा सकते है।
एक ब्रह्मचारी अपने बाल्यकाल से ही ब्रह्मचर्य की दीक्षा लिया हुआ है। अपने बाल्यकाल से ही वो नारी की तरफ दृष्टि नहीं डालता है और वीर्य रक्षा में तत्पर रहता है। योग साधना से अपने वीर्य को संचित करता है और योग अभ्यास से वीर्य को उर्धगामन करता है। पर अचानक स्त्री के संसर्ग में आने पर काम शुख भोगने की इच्छा तीव्र हो जाती है और क्षणिक शूख के लिए मैथुन करता है  और अपनी संचित वीर्य का अधोगमन करता है। इतने दिन की तपस्या को क्षण भर में ही नष्ट कर देता है।
किसी चरित्रवान मनुष्य को चरित्रवान बने रहने में बहुत संयमता का पालन करना पड़ता है और उसी व्यक्ति को चरित्रहीन बनने में समय नहीं लगता। अतः मनुष्य को उर्धगमन करनी चाहिए और क्षणिक शुख से अधोगमन की और अग्रसर नहीं होना चाहिए। अधोगमन एक सहज प्राकृतिक प्रक्रिया है। उर्धगमन करना ही मनुष्य का परम लक्ष्य होना चाहिए। तो ही वो संसार से परे जा सकता है और दुसरो से अलग होकर कुछ बन सकत है। सफल और असफल मनुष्य के बीच यही अंतर होता है। साधारण मनुष्य और ब्रह्मऋषि (योगी) के बीच यही अंतर होता है।

जय महाकाल


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