इसी अति आधुनिक काल में एक चीज हमेशा से सुनने मिलती है और यह चीज हर न्यूज पेपर में छपती भी है। वो है आत्महत्या। किसी अमुक आदमी ने फलाने जगह पर आत्महत्या करली है। वो इतने करोड़ संपति का मालिक था और बहुत बड़े बंगला में रहता था। आखिर ऐसा हो क्यों रहा है की सम्पन और धनवान व्यक्ति भी आत्मा हत्या कर रहे है। इन सबका मेरे नजरिए से देखें तो इनमे कुछ चीज की कमी है वो है दृढ़ धैर्य और विश्वास । जो सिर्फ आध्यात्मिकता से ही आता है। पहले हम अपने बचपन में सुनते थे की फलाना गरीब व्यक्ति ने गरीबी से दंग आकार आत्महत्या कर ली। पर आज सुनते है की वो फलाना अमीर आदमी ने आत्महत्या कर ली और अपने पीछे बहुत सारी संपति छोड़ गया है। आज देखें तो दिन व दिन आत्महत्याओं की संख्या बढ़ती जा रही है। इसका सबसे बड़ा कारण है मनुष्य में खासकर भारतीय लोगों में आध्यात्मिकता की कमी होना और अपने कामकाज में अत्यधिक तनाव का होना। तनाव होना भी स्वाभिक है पर इसका सही तरीके से प्रबंधन करना भी अति आवश्यक हो जाता है। मनुष्यों को तनाव होने का बहुत से कारण है आजकल । पर अपने अंदर उसे लड़ने की क्षमता विकसित करनी चाहिए ।
हमारे प्राचीन ऋषि मुनियों ने समाज के हर अंग पर पुरजोर काम किया और वैज्ञानिक विधि का ज्ञान अपनी लेखनियों की सहायता से पुस्तकों में लिखा। जैसे की शरीर की बीमारियों के लिए आयुर्वेद शास्त्र और मानसिक रोगों के लिए आध्यामिक शस्त्रों की रचना की। पर आज का मनुष्य अपने आप को बौद्धिक, वैज्ञानिक और तार्किक सोच वाला कहता है और प्राचीन हिंदू शास्त्रों को अतार्किक और अंधस्था कहता हैं। इतने वैज्ञानिक और तार्किक सोचवाले होने पर भी दिन प्रतिदिन मानसिक रोगियों की संख्या बढ़ती जा रही है। हम भारतीय हमेशा ऐसा सोचते है की पश्चिमी देश बहुत ही विकसित और सफल हैं। ये भारतीयों की एक भ्रम मात्रा है। अमेरिका जैसे विकसित देशों में धनवान और समृद्ध लोगो होने पर भी वांहा मानसिक रोगियों और पागलखानों की संख्या बढ़ती जा रही है। तो एक प्रश्न आता है की आध्यात्मिकता मनुष्य को कैसे आत्महात्यों से रोक सकती है। उदाहरण स्वरूप नीचे एक कहानी समझाया जा रहा है।
मानो एक कंपनी में कुछ कर्मचारी काम करते है और उनका बोस उन्हें दिशा निर्देश देता है काम करने के लिए। बॉस कहता है तुम बस काम करो सही हो या गलत हो में संभाल लूंगा तुम बस काम पर ध्यान दो। वो सभी कर्मचारी पूरे मन से काम करते है और अपने उप्पर कोई तनाव नहीं रखते । अगर कुछ प्रॉब्लम आता है तो वे अपने बॉस के साथ विचार विमर्श कर लेते है और उस प्रॉब्लम को सामना करने के लिए वो पूरी तरह से अपने बॉस पर निर्भर है। और उन्हें पूरा विश्वास रहता है की उनका बॉस सब ठीक कर देगा और ठीक हो भी जाता है। तो आनंद से वो इस कंपनि में काम करते है। उसी तरह आध्यात्मिक व्यक्ति संसार में होने वाली किसी भी प्रकार की समस्या का समाधान वो परमेश्वर पर छोड़ देता है जो वो खुद समाधान नहीं कर सकता । वो यह विश्वास रखता है की ईश्वर उसकी समस्या का समाधान कर देंगे। इस तरह से वो तनाव मुक्त रहता है और उसे पूरा विश्वास रखता है । अगर कोई व्यक्ति पूरा विश्वास करता है तो वो पूरी तरह से तनाव मुक्त रहेगा और अगर थोड़ा भी करता है तो उसका तनाव थोड़ा कम हो जायेगा। अगर बिल्कुल भी नहीं करता तो भी उसका तनाव ऐसा रहेगा की उसे थोड़ा सहार मिल जाएगा आध्यात्मिक से की वो आत्महत्या न करें । आध्यात्मिक व्यक्ति के भाव ऐसे ही होते है । इस प्रकार भाव होने से मनुष्य को मानसिक बल मिलता है और उसके अंदर धैर्य, विश्वास और समस्या से लड़ने का सामर्थ्य प्राप्त करता है। वो हमेशा अपने आपको परमेश्वर के कृपा और संरक्षण में महसूस करता है। आध्यात्मिक मनुष्य की मानसिकता ऐसी होती है की वो दुनिया को नश्वर मानता है और आत्मसंतुष्टि अनुभव करता है। दुःख होने पर अपने बॉस के पास जाकर उनसे अपनी बात बताता है अर्थात परमेश्वर से प्रार्थना करता है । उसे इस बात का पूर्ण विश्वास होता है की परमेश्वर उसकी सहायता अवश्य ही करेंगे और उसके साथ वैसे ही होता भी है। जो जैसा भाव करता है उसे वैसा फल प्राप्त होता है। बहुत से आध्यामिक पुस्तक भी ऐसी मानसिकता बनाने में बहुत काम करती हैं जैसेकी श्रीमद्भगवद्गीता। श्रीमद्भागवत गीत में भगवान कृष्ण ने कहा है "योग क्षेमम बहाम्ह्यम" अर्थात मैं परमेश्वर उनकी हर तरह से सहायता और बल देता हूं जो मुझ से योग क्षेम रखते है या पूरी तरह से मुझ पर निर्भरशील रहते हैं। ऐसी अध्यात्मिक किताब पढ़ने से मनुष्यों में परमेश्वर के प्रति विश्वास उत्पन होता है और परमेश्वर पर निर्भरशील रहते हैं। उन्हें ऐसा लगाने लागत है की वो अकेले नहीं हैं इस संसार में। कोई तो है जो उसकी सहायता कर सकता है और उसका आत्मबल बढ़ता है।
ऐसा देखा गया है की बहुत से लोगों ने इसलिए आत्महत्या करली हैं क्योंकि वो अकेले थे इस दुनिया में। ऐसे मानशिकता के लोग इसलिए आत्महत्या कर लेते है क्योंकि उन्हें अपने आसपास कोई उनको सहारा देने वाला नही मिल और वो अकेलापन महसूस करते हैं। अगर किसी आध्यात्मिक व्यक्ति से पूछो अकेलापन क्या होता है तो शायद वो नहीं बता पाएगा। क्योंकि वो अपने आपको सदैव परमेश्वर के पास ही महसूस करता है। आध्यात्मिक व्यक्ति एकांत में रहता है पर वो अकेला नहीं रहता। वो अपने आपको परमेश्वर से हमेशा जुड़ा पाता है। अकेले रहनेवाले लोगो को भी आध्यामिक भाव को अपनाना चाहिए। इस प्रकार आत्महत्या करने से बचा जा सकता है ।
जय महाकाल
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