आज के युग में हिंदू भावनाओं के साथ खेलना बहुत ही सरल है। क्योंकि खुद हिंदू ही अज्ञानता के साथ जी रहा है और बिना अपना ही हिंदू सनातनी शास्त्र पढ़े समझे अपने ही धर्म पर उंगली उठा रहा है। हिंदुओं को समझना चाहिए की उन्हें अपने ही शास्त्रों को अच्छे से पढ़े और समझे।
वृक्ष के नीचे पड़े हुए कुछ देवी देवताओं के फोटो और मूर्तियां और गणपति के विसर्जन के पश्चात जो मूर्तियां समुद्र और नदियों में पूरी तरह से घुलती नहीं हैं तो उसे दूसरे धर्म के लोग और खुद पढ़े लिखे हिंदू जो खुद के शास्त्र भी नहीं पढ़े है ये देखकर बोलते है पूजा के टाइम गणपति बापा मौर्य, जय श्री राम और जय माता दी करते है और देवी देवताओं की मूर्तियों को, चित्रों को और यंत्रों को यंहा वहां फेक देते हैं । जिनसे उनका अपमान होता है।
देखो शास्त्रों के अनुसार मूर्तियों का महत्व तब आता हैं । जब उनमें आवाहन मंत्र, प्राण संचरण मंत्र, पंच प्राण आदि दिए जाते है और मंत्रों से मूर्तियों को भावित करते हैं। तब मूर्ति, चित्र और यंत्र जागृत होते हैं और पूजा के पश्चात उन्हें विसर्जन आदि मंत्रों से देवता को उनके स्वस्थान को आदर और भक्ति सहित भेज दिया जाता है। उसके पश्चात उस मूर्ति में कोई देवता नहीं रहता हैं। उस मूर्तियों को नदी, तलाब और समुद्र आदि जलाशयों में प्रवाहित कर दिया जाता है। इसे देवता और देवी का कोई असमान नहीं होता । जो मूर्तियां या चित्र मिट्टी, लकड़ी और कागज़ आदि से बनते है। अर्थात जो लंबे समय तक नहीं रखे जा सकते उन्हें पार्थिव मूर्तियां कहा जाता है और उन्हें विसर्जन करना अनिवार्य है। क्योंकि ऐसी मूर्तियां धीरे धीरे नष्ट खंडित होने लगती है समय के अंतराल में । जो मूर्तियां पत्थर और धातुओं से बनती हैं। जिन्हे मंदिर और गृह में रखे जाते हैं। उनमें सिर्फ प्राण प्रतिष्ठा मंत्र ही पढ़े जाते हैं। अगर किसी तरह से ऐसे मूर्तियां चित्र या यंत्र खंडित होते है तो उन्हें भी विसर्जन करना अनिवार्य हो जाता है। आजकल कुछ ऐसे लोग है जो नदी और जलाशयों में मूर्ति प्रवाहित करने से मना करते हैं ताकि जलाशयों में प्रदूषण ना हो। भले ही १०० कंपनियों के ड्रेनेज लाइन समुद्र और नदियों में छोड़ तो उसे पॉल्यूशन नहीं होता है। पॉल्यूशन सिर्फ नदियों, तलाब और समुद्र में सिर्फ मूर्ति विसर्जन और फुल पते डालने से होता है। इसी कारण लोग देवी देवताओं के खंडित मूर्ति और चित्रों को पेड़ों के नीचे छोड़ जाते हैं। मूर्ति आजकल प्लास्टर ऑफ पेरिस से बनती है। जिसे मूर्तियां पानी में सरलता से घुलती नहीं हैं और जलाशयों में प्रदूषण होता है। पर इस से विसर्जन के पश्चात देवी देवताओं का कोई अनादर नही होता है। गणेश चतुर्थी आदि त्योहारों में मूर्तियां मिटी आदि से ही बनाना चाहिए।
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