नीति शास्त्र के अनुशार ज्ञान ग्रहण किसी से भी किया जा सकता है। चाहे वो छोटी जात्त को हो या भी गरीब हो। अधिक वयस्क वाला हो य अल्प वयस्क का हो। मानो तो ज्ञान ऐसी एक मूल्यवान वस्तु है जो कजरे के ढेर से भी चूना चा सकता है। नीति शाश्त्र केहत है ज्ञान देने वाला अगर चांडाल भी हो तो भी उसे वो ज्ञान ले लेनी चाहिए। ज्ञान मे कोई ऐसा भेद नहीं है की ऐसा कहा ज सके की ये अशुद्ध है और ये ज्ञान सूद्ध है। ज्ञान कभी असूद्ध हो ही नही सकता और ज्ञान छुत अछूत से परे मानी जाती है। जब कभी भी कोई ज्ञान मिल रहा हो उसे बिना हिचकिचे ग्रहण करना चाहिए। जैसे हीरा भले ही कोयले की खान से पाई जाती है। फिर भी लोग उसे अति मूल्यवान समझकर ग्रहण तो करते ही हैं। उसी प्रकार ज्ञान का महत्व होता है। कमल भी कीचड़ मे खिलता है । अतः कमल की सुंदरता से लोग मोहित रेहते हैं । पर उसका उद्गम स्थली का इतना महत्व नहीं होता। सर्वथा सर्व अवस्थाओं मे ज्ञान को ग्रहण करनी चाहिए। अगर सत्रु से भी ज्ञान की प्राप्ति हो रही हो तो बिना संकोच के उस वो ज्ञान भी सीखना चाहिए। ज्ञान प्रकाश स्वरूप है और थोड़ा स भी प्रकाश अंधेरे को दूर करने में सक्षम होता है।हरी ओम, हरी ओम हरी ओम ।


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