नीति शाश्त्र के अन्तगर्त ये भी आती है की मनुष्य को सोच समझ कर किसी से शत्रुता करनी चाहिए। अब कोई ये प्रश्न कर सकता है की ये अपने हाथ मे थोड़े ही है की हम किस से मित्रत करे या शत्रुता । पर ये ध्यान देना आवश्यक है की हम किसे शत्रुता कर रहे हैं। नीति शास्त्र मे कहा गया है की किसी भी परीस्थिति में भी चिकित्सक, नाइ, बाबरचि, राज कर्मचारी (सरकारी कर्मचारी), गहन मित्र और अपने जीवन साथी से कतापि शत्रुता नही रखनी चाहिए। क्योंकि ये सभी को आपके कमजोरी और व्यक्ति गत विषय का ज्ञान होता है। इनसे शत्रुता करने पर ये हो सकता है की वे सब आपके व्यक्ति गत रहस्य समाज और शत्रु के सामने प्रकाशित कर दे। इस तरह आपके इज़्ज़त और प्राण दोनो ही खतरे में पड़ सकते हैं। मनुष्य को जंहा तक हो सके इन सब से शत्रुता करने से बचना चाहिये।
अगर चिकित्सक से शत्रुता किया जाये तो चिकित्सक आपके रोग का पूरा ज्ञान रखता है और ये संभावना बनी रहती है की वो आपके रोग को बिगाड़ कर आपकी जान ले सकता है। राज़ कर्मचारी (सरकारी कर्मचारी) अपने पद, शक्ति और सामर्थ्य का उपयोग कर आपको दंड दिला सकता है। नाइ के साथ भी शत्रुता नहीं करनी चाहिए क्योंकि नाइ के सामने जब आप बाल य दाढ़ी काटते हैं। उसके पास पूरा अवशर होता है की आप के अनजान अवश्था में आप पर किसी प्रकार का प्राण घातक आक्रमण कर दे। अपने बाबरचि से शत्रुता करने पर वो आपके खाने में विष मिला कर मार सकता है। नीति शास्त्र का ये कहना है की हमे उन सबसे कभी भी शत्रुता नहीं करनी चाहिए जिन्हें हमारी व्यक्तिगत रहस्यों की जानकरी होती है। क्योंकि इनसे हमारी मान, शम्मान और प्राणो का खतरा बना रहता है।
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