गुरुवार, 25 मार्च 2021

अगर अपने शत्रु या प्रतिद्वंदी को असफल करना चाहते हो तो क्या करना चाहिए ?

अगर अपने शत्रु को हर परिस्थिति में हराना चाहते हो। तो कभी भी शत्रु का विरोध नहीं करना चाहिए। सदैब उसकी झूठी प्रशंसा करते ही रहना चाहिए। उसकी झूठी प्रशंसा करने पर शत्रु के मन में अहंकार का जन्म होगा और वही अहंकार उसे नीचे गिराने में सहाय होता है। अहंकारी मनुष्य सभी प्रकार का पाप करने में अग्रशर होता रहता है। जभी उसका पाप बढ़ेगा उसे नीचे गिरने में भी अधिक समय नहीं लगेगा। शत्रु का विरोध करने पर शत्रु को एक लक्ष्य प्राप्त हो जाता है और वो उस लक्ष्य को प्राप्त करने में पूरी एकग्रता से जुड़ जाता है। अतः शत्रु को कभी भी लक्ष्य साधने में सफल नहीं होने देना चाहिए। जो मनुष्य को स्वयं की प्रशंशा सुनना अच्छा लगता है वो मनुष्य जीवन में कभी भी सफल नहीं हो पाता है। सफल व्यक्ति स्वयं को सदैव प्रशंसा से दूर रखता है और अपनी निंदाओ को अवश्य ही सुनता है। जो व्यक्ति सफलता के शिखर पर पहुंचे होते है। वो अपने प्रशंसकों के वजह से नहीं बल्कि अपने निंदकों के वजह से सफलता की शिखर को छूते हैं। स्वयं की प्रशंसा ही सभी पाप की बीज होती है। कभी भी किसी भी मनुष्य को प्रशंसा की इच्छा नहीं करनी चाहिए।

जय महाकाल🙏

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