जब कोई शिष्य गुरु से ज्ञान प्राप्त करता है। तब उस शिष्य को ये नियम अवश्य ही प्राप्त करना चाहिए कि वो गुरु से किसी भी प्रकार का मिथ्य भाषण ना करें। गुरु जैसा कहें वैसा ही करें।
जब गुरु किसी अपने शिष्य को ज्ञान देता है। गुरु भली भांति यह ज्ञान होता है कि शिष्य की क्या कमज़ोरी है और शिष्य को कैसा ठीक किया जाए। अतः शिष्य को कभी भी गुरु के साथ बगाबत नहीं करनी चाहिए। नहीं तो गुरु के क्रोध होने पर शिष्य के प्राण भी जा सकते है। गुरु उस माली के जैसा है । जिसे अच्छे से पता है किस फुल की बृक्ष को किस प्रकार का खाद देना है। बृक्ष को कितनी कटाई छटाई करनी है। गुरु को अपने शिष्य के बारे में यह भी पता है कि शिष्य को कोनसा ज्ञान या विद्या पचेकि और कोनसा ज्ञान नहीं पचेगी।
अपने गुरु का कभी भी अपमान नहीं करना चाहिए भले ही गुरु शिष्य को कितना ही दूसरो के सामने अपमानित करें। अगर गुरु अपने शिष्य को अपमानित करता है तो अवश्य ही उसमे शिष्य का हित छिपा हुआ होगा। गुरु के सामने ऊँची आवाज़ में बात करना, गुरु के सामने पैर फैलाकर बैठना, गुरु के खाने से पहले भोजन खा लेना सरासर गलत है। इसे गुरु कुपित होते हैं और गुरु शिष्य को वो ज्ञान नहीं देता है जिस ज्ञान को शिष्य प्राप्त करना चाहता है। अतः नीति के हिसाब से अपने गुरु से किसी भी प्रकार का शत्रुता, बाद विबाद कताहि नहीं करनी चाहिए।
ओम गुरु देवाय नमः
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