कभी कभी तो मनुष्य का परामर्श दाता या उपदेशक के रूप में भी अज्ञात शत्रु रेह सकते हैं। जो आपको गलत परामर्श या उपदेश भी दे सकते है। अतः मनुष्य को अपने विवेक ओर बुद्धि का प्रयोग करना चाहिए।
मंगलवार, 18 सितंबर 2018
किस प्रकार के शत्रुओं से अधिक सतर्क रहना चाहिए ?
कभी कभी तो मनुष्य का परामर्श दाता या उपदेशक के रूप में भी अज्ञात शत्रु रेह सकते हैं। जो आपको गलत परामर्श या उपदेश भी दे सकते है। अतः मनुष्य को अपने विवेक ओर बुद्धि का प्रयोग करना चाहिए।
शनिवार, 16 जून 2018
क्यों खुद की गलतियों से ज्यादा दुसरतों की गलती से सिख लेनी चाहिए।
ऐसी बहुतसि गलतियां है जिन्हें एक बार करने के बाद सायद हमे उस गलती को सुधारनेका या तो फिर उस गलती से सीखने का समय ही नहीं मिल पाता हैं। अतः जो दूसरे लोग है जो बहुत सि गलतियां की और उन्हें अपना जान माला का लूकसांन उठाना पढ़ा हैं। वो लोग अपनी गलतियों को सुधार नहीं पाये हों। उन लोगो से सीखनी चाहिए। वो मनुष्य अवश्य ही बुद्धिमान होगा जो दुसरो की गलतियों से सिख लेता है। कहा जाता है की मुंह का जला झाश भी फूंक फूंक कर पिता है। सायद वो ठीक भी है। पर अगर दुशरे लोग उस जले को देख कर कुछ नहीं सीखते हैं तो वाकेहि वो निर्बुद्धि हैं।
कुछ गलतियां ऐसी होती हैं जिन्हें करने पर मनुष्य जीवित ही नहीं रेह पाता। अतः दूसरों की की गयी गलती से सीखनी चाहिए । इस से स्वयं की जीवन की भी रक्षा होती हैं। एहि सत्य है और नीति हैं।
पर आज के आधुनिक युग में इस नीतियों का अनुशरण कम ही लोग कर सकते हैं। क्योंकि आज की युवा पीढ़ी पूरी तरह से नसे मे धूत है। उसे ये ज्ञात होने पर की तम्बाकू और सिगरेट के सेवन से कर्कट रोग यानी कैंसर होता है। फिर भी अपनी अदातों को सुधारने की जगह उसे अधिक मात्र मे सेवन करता है। उन्हें इस जिज़ का भी ज्ञान होता है की बहुत से लोग कर्कट रोग से मृत्यु को प्राप्त हो गए पर फिर भी तम्बाकू का सेवन नहीं छोड़ेंगे। ऐसे ही लोगो को निर्बुद्धि कहते है।
गुरुवार, 14 जून 2018
किस प्रकार के कर्मो को स्वयं स्वहस्त से ही करनी चाहिए ?
मनुष्य अपने जीवन में बहुत सा कर्म करता है। कुछ अच्छे होते है और बुरे होते हैं। उन अच्छे और बुरे कर्मो के कारण मनुष्य को उन कर्मो का फल भी अच्छे और बुरे के रूप मे मिलता है। हम बहुत से कर्म स्वयं के लाभ हेतु अन्य किसी से कर्म करवाते है।
पर ऐसे बहुत से कर्म मनुष्य के जीवन मे आते हैं। जिन्हें मनुष्य को स्वयं स्वहस्त से करना चाहिए। जैसे दान, पूजा, सेवा, गुरु की सेवा, यज्ञ आहुति, देव दर्शन, गुरु दर्शन, पूर्वजों को पिंड दान, पितृ ओर मात के मृत देह को मुखाग्नि, तीर्थाटन, अपने बच्चों का पालन, प्रशाशन आदि।
विशेष कर धर्म और आध्यात्मिक कर्मो को स्वयं स्वहस्त से ही करना चाहिए। यदि इस प्रकार के कर्मो को किसी और के हाथो करवाया जाता है तो वो भी उस कर्म का पुण्य का भागी बनजाता है। अतः किये कर्मो का पुण्य घट जाता है। अतः इस प्रकार के कर्म स्वयं स्वहस्त से करना चाहिए अथवा अपनी अर्धांगी य अपने स्व पुत्र से करवाना चाहिए। अगर अपनी अर्धांगिनी या स्वपुत्र से धार्मिक कर्म करवाया जाता है तो अपनी पत्नी या पुत्र को प्राप्त पुण्य देर सवेर स्वयं प्राप्त हो जाती है।
गुरु की सेवा स्वयं स्वहस्त से करने से विशेष कृपा उस सेवक पर होती है। देव दर्शन स्वयं करने से उसका पुण्य भी स्वयं को प्राप्त होता है। यज्ञ आहुति स्वहस्त देने से उस आहुति के देवता को वो आहुति प्राप्त होती और देवता की आयु बढ़ जाती है और उस देवता की आशीर्वाद उस मनुष्य को प्राप्त होता है। अगर इस प्रकार किसी और से करवाया जाये तो वो भी इसका भागी बन जाता है।
अपने संतानों का पालन पोषण स्वयं से अच्छा और कोई नहीं कर सकता। यदि कोई मनुष्य अपने बच्चों का पालन और पोषण किसी और से करवाता है तो ये संभावनाएं अवश्य ही बनी रहती है की उन बच्चों को सही शिक्षा ना मिल सके और सही पोषण भी ना मिल पाये या तो फिर उसे असामाजिक कार्य भी सिखाया जाये।
अपने संतानों और नाति पोतों को भी स्वयं ही लाड़ प्यार करना चाहिए ताकि उनका लगाव उनके माता, पिता, दादा और दादी से बना रहे। अन्यथा अगर कोई ओर उनको लाड प्यार करता है तो उनका लगाब उसे बढ़ जाता है और अपने माता पिता से मोह कम हो जाता है। तब पुत्र और पोत्र अपने माता पिता पितामह और पितामही का श्राद य पिंड नहीं करता और बंचित रखता है।
मंगलवार, 5 जून 2018
अगर किसी भी रोग का निदान औषधी से नहीं होता है तो क्या करें।
शारीरिक पीड़ा भी एक प्रकार का दुःख ही है। इसे आम तोर पर लोग बीमारी या रोग कहते हैं। जब तक मनुष्य इस भौतिक शरीर के साथ इस मृत लोक मे रहेगा । तब तक उसे सभी प्रकार के यातनाओं को भी भोगना पड़ेगा।
ऐसे बहुत से लोग मेने देखा है जो बीमार होने पर डॉक्टर के पास जाते हैं और डॉक्टर उन्हें मेडिसिन्स भी बताता है। वो जब तक मेडिसिन्स खाते रहते हैं तब तक उनका शरीर ठीक रहता है और जब मेडिसिन बंद होता जाता है। फिर से उनका शरीर पूर्व के भांति बीमार या उसे अधिक बीमार हो जाता है। उन्हें कोई उपाय सूझता ही नहीं है । बार बार उन्हें डॉक्टर के पास भागना पड़ता है और डॉक्टर मेडिसिन बदल बदल कर देता है या तो फिर वो मरीज़ डॉक्टर ही बदलता है। अंत मे अगर बीमारी ठीक नही होता तो वो बहुत तनाब में चला जाता है। फिर या तो डॉक्टर को कोसता है या फिर भगवान को।
में उन लोगों को ससे रोग निदान का उपाय आपको स्वतः ही समझ आ जायेगा। जो लोग किसी बीमारी से परेशान हैं। उन्हें ये याद करना होगा की यह बीमारी उनको कब से हुई है और उस समय से अब तक आपकी दिन चर्या में और अपनी जीवन में क्या परिवर्तन हुए हैं पहले के दिनचर्या और जीवन में। क्यों की मनुष्य ऐसे दिनचर्या को अपनी जीवन में ग्रहण कर लेता है जिन से बहुत प्रकार की बीमारियां होने की सम्भावनाएं बढ़ जाती है।
मनुष्य को स्थान और कार्य विशेष को भी ध्यान मे रखना चाहिए। क्योंकि इनसे भी बीमारियां होने की संभावनाएं होती हैं।
उदारहरण स्वरूप कुछ लोगो को सर्दी खासी कभी पीछा नहीं छोड़ती । इसका कारण उनकी जीवन शैली ही होती है। ऐसे बहुत से लोगों को रात में दही, छास य
ठंडी चीज़े खाने की आदत होती हैं। जिनसे इन्हें ये बीमारी होती है। आयुर्वेद में कहा गया है की रात्रि में दही खान विष के समान है।
रोग निदान का ये उपाय मेरे स्वानुभूत है।
बुधवार, 2 मई 2018
किस प्रकार सांसारिक मनुष्यों को भौतिक संसार में जीवन यापन करना चाहिए।
पर संसार में मनुष्य को अगर रहना है तो कमल के फूल के भांति रहना चाहिए। जिस प्रकार कमल पानी में रहकर भी पानी से गीला नही होता उसी प्रकार मनुष्य को संसार के सभी भोगों को भोग कर उन भोगों के मोह से छूट जाना चाहिए। संसार के भोग भोगने की कामना कदापि नहीं रखनी चाहिए। मनुष्य को संसार के सारे क्रिया कलापो को करने के बाद भी उसमे अपना मन का मोह विल्कुल नहीं रखनी चाहिए अर्थात मन के लगाव को प्रभु के प्रति ही लगाना चाहिए।
जब कमल का फूल पानी के कीचड़ में खिलता है और संसार को अपने सुंदरता का परिचय देता है। जिस पानी मे कमल खिलता है वो पानी उसके भोग के समान है। उस पानी के कीचड़ और दल दल उस कमल के फूल के लिए सांसारिक दुःख के समान है। अतः भोग और दुःखो से उप्पर उठना चाहिए।
रविवार, 14 जनवरी 2018
जंहा वैद्य, वणिक और ब्राह्मण नहीं रहते उस स्थान, राज्य और देश में क्यों कदापि नहीं रहना चाहिए ?
जंहा वैद्य ना हो उस जगह पर अवश्य ही बीमार लोग रहते होंगे और उनके संपर्क में आते ही स्वस्थ व्यक्ति भी बीमार हो जायेगा।
वैद्य ना होने से अवश्य ही साधारण मनुष्य का स्वास्थ्य खतरे में पड़ सकता है और जिसे उसकी मृत्यु भी हो सकती है। अतः जंहा रहते हो वंह वैद्य य चिकित्सा के साधन होना अति आवश्यक है।
गुरुवार, 11 जनवरी 2018
किस प्रकार के मनुष्यों को ज्ञान देना चाहिए और किस प्रकार के मनुष्यों को ज्ञान नहीं देनी चाहिए।
रविवार, 22 अक्टूबर 2017
क्यों क्षमा प्राप्त शत्रु से कतपि मित्रता नहीं करनी चाहिए और पूर्ण विश्वाश नहीं करनी चाहिए ?
जिस प्रकार आस्तीन या घर में रहे हुए सांप पर पूर्ण रूप से यह नहीं कहा जा सकता की सांप नहीं कांटने की संभावना कितनी है। उसी प्रकार शत्रु से मित्र बने हुए लोगो पर स्वयं के प्राण संकट में पड़ने का खतरा बना रहता है। अतः इस प्रकार के शत्रुओ से सचेत रहना आवश्यक होता है।
क्षमा दान के पश्चात हो सकता है की वो शत्रु से बने मित्र व्यक्ति के भाव बदल जाये और उसके मन में प्रतिशोध के भाव जागृत हो जाये। इस प्रकारके से शत्रु कभी भी सामने से प्रहार नहीं करते परन्तु अप्रत्यक्ष रूप मे प्रहार करते है। इससे हो सकता है की आपकी कीर्ति, सम्मान और प्राण खतरे मे पड़ जाये।
बिच्छू का स्वभाव हमेशा डंक मारना होता है। उसी प्रकार किसी प्रकार के शत्रु का स्वभाव अपने शत्रु का विनाश करना होता। चाहे वो प्रतेक्ष हो या अप्रतेक्ष रूप से।
धन्यबाद
सोमवार, 16 अक्टूबर 2017
सफलता की कुंजी क्या है और कैसे सफलता प्राप्त करें
मुझे एक कहानी याद आती है जो मैने किसी महान व्यक्ति से सूनी थी की एक साधु था वो बहुत दिनों से कठोर साधना कर रहा था । पर उसे उस साधना का सिद्धि प्राप्त नहीं हो रहा था या उसे कुछ अनुभूति भी नहीं हो रही थी। तब उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था। कुछ दिनों के पश्चात उसने एक स्त्री को देखा जो सुंदर थी पर वो स्वेच्छा चरी थी। वो स्त्री पर किसी प्रकार का नियम या अनुशाशन नहीं था। किसी भी पुरुष के साथ रहना और संग करना उसका स्वभाव था। एक दिन वो स्त्री जंगल में विचरण कर रही थी और किसी नई पुरुष की तलाश थी ताकि वो अपने कामुक इच्छाओं को पूरा कर सके। जब कोई ना मिले तो तड़प उठती थी। कामुकता की पुष्टि में डूबी हुई थी।
साधु को तब आभाष होता है की एकाग्रता कामुकता के जैसे होनी चाहिए। जब हम अपने मन मे किसी कमुक भाव को लाते है तो हम कामुकता मे डूब जाते है और तब तक उस भाव मे डूबे रहते हैं । जबतक वो पूरी नहीं हो जाती। वो साधु अब समझ गया था की उसकी साधना मे किस चीज की कमी रेह गयी थी। जिस तरह हमार ध्यन स्वतः ही कामुक वस्तुओं पर टिक जाती है । उसी प्रकार हमारा ध्यान होना चाहिए। अतः एकाग्रता का अभ्यास करना चाहिए।
धन्यवाद
रविवार, 15 अक्टूबर 2017
किस प्रकार के लोगों से शत्रुता कभी भी नहीं करनी चाहिए।
शनिवार, 14 अक्टूबर 2017
मनुष्य को किस से ज्ञान लेना चाहिए और किस से ज्ञान नहीं लेना चाहिए?
रविवार, 1 अक्टूबर 2017
किसी समस्या या रोग का समाधान कैसे करें?
सांप का जहर ही सांप के जहर का निराकरण करती है और दूसरी चीज़ जंहा सांप रहता है। वहीं उसी इलाके के वृक्ष और जड़ी बुट्टी उस जहर का भी इलाज़ कर सकते है।
गर्मी के मौसम में होने वाली विमारीयों का इलाज़ गर्मी के मौसम में होने वाले फलों में होता है। सर्दी में होने वाले फल सर्दी के मौसम के रोगों का औसध होता है।
मधमखि दंश का इलाज़ मध से ही हो सकता है। नीति शाश्त्र केहत है। प्रकृति अगर हमे किसी प्रकार की विपति या रोग देती है तो साथ ही वो हमे इसका निराकरण और औसध भी प्रदान करती है।
जिस तरह प्रकृति रेगिस्तान के जीवों में पानी सरक्षण के गुण विकसित करवा लेती है। उसी प्रकर सभी दुःख और विमरीयों का इलाज़ भी विकसित कर लेती हैं।
शनिवार, 20 मई 2017
मध्यम मार्ग क्या है और मध्यम मार्ग का ही अनुशरण क्यों करना चाहिए
जो मनुष्य किसी भी क्षेत्र मे सफल होना चाहते है तो उसे मध्यम मार्ग का अवश्य ही अनुशरण करना चाहिए।
तो हमे यह जानना जरूरी है की क्या है ये माध्यम मार्ग। मध्यम मार्ग का अर्थ है किसी भी चीज़ का ना बहुत ज्यादा करना है और ना ही बहुत कम करना है। मध्यम ही करना है।
मध्यम मार्ग सर्व प्रथम भगवान कृष्ण के द्वार श्रीमद् भागवत गीता में अर्जुन को बताया गया। जिसमें कृष्ण अर्जुन से कहते है। है अर्जुन तो योगी बन, और तु योगआरूढ़ हो। योग उसीका सिद्ध होता है जो माध्यम मार्ग को अपनाता है। अर्थात जो अधिक निद्रा लेता है और जो बिल्कुल निद्रा लेता ही नहीं। जो अधिक भोजन करता है और जो बिल्कुल भोजन नहीं करता। इन दोनों ही तरहा के लोगो का योग कदापि सिद्ध नहीं होते । योगी तो वही बनता है या योग सिद्ध वही बनता है जो पर्याप्त निद्रा लेता है ओर जो पर्याप्त भोजन करता है । ना आवश्यकता से अधिक और नही आवश्यकता से कम। इसे ही मध्यम मार्ग कहते है।
भगवान बुद्ध को भी माध्यम मार्ग के कारण ही महाज्ञान की प्राप्ति हुई थी। एक समय बुद्ध की जीवन में ऐसा आया की बुद्ध भोजन ओर निद्रा का पूरी तरह त्याग कर दिए थे। इस कारण उनका सरीर क्षिण होने लगा और बुद्ध का ज्ञान का प्यास पूरा नहीं हो पाया। उन्हें इसका आभास तब हुआ जब वो वीणा बजा रहे थे। जब वो वीणा का तार भीड़ रहे थे तब वीणा का तार बहुत तन जाता जिसे तार जल्दी है टूट जाती थी और जब तार को थोड़ा ढ़िल देकर बांधा जाता तो उस वीणा का वादन सही से नही होता था। कुछ प्रयत्न के पश्चात तार सही से बंध गयी। जो ना ही बहुत ही ज्यादा भीड्डा गया था और नही बहुत ही ढ़िल दि गयी थी। उस वीणा से मधुर स्वर निकल रहे थे और नही तार जल्दी टूट रही थी। इस तरह बुद्ध को ज्ञान हुआ की साधना मार्ग की सफलता माध्यम मार्ग के अनुशरण से ही है।
तो मनुष्य को अगर किसी भी क्षेत्र मे सफल होना चाहता है तो अवश्य ही उसे माध्यम मार्ग का अनुशरण करना चाहिए।
एक और कहानी से भी मध्यम मार्ग की सिख मिलती है। जिस मे दो लकड हरा रहते है । वो दोनो मित्र साथ रहते है और साथ ही जंगल मे लकडिया काटते हैं। एक लकड़हारा सुबह से साम तक बिना रुके लकड़ी काटता है और दूसरा लकड़हारा एक वृक्ष काटने के बाद विश्राम करता है। साथ ही साथ अपनी कुल्हाड़ी की धार को भी तेज़ करता था। अंत मे देखने पर ये पता चलता है की दूसरे लकड़हरा ने पहले वाले से ज्यादा लकड़ी काटि है। जब हम किसी काम को लगातार करते हैं। उसे करते करते शरीर थक जाता है। जिसे कार्य करने की क्षमता पर पडता है। अतः किसी भी कार्य को करने में माध्यम मार्ग का अनुशरण ही उचित है।
शनिवार, 13 मई 2017
मनुष्य को कभी भी अत्यधिक कठोर क्यों नहीं होना चाहिए ?
Pनीति शास्त्र के नियमों के अनुसार जो अत्यधिक कठोर होता है । उसे एक दिन जरूर टूटना पड़ता है और उसकी आयु भी बहुत कम होती है। ये भी प्रकृति का एक तरह का नियम है। जीभ प्रत्येक मनुष्यों में जन्म से होता है और दांत उसके बाद आता है। पर जीभ मनुष्य के मृत्यु तक उसके साथ रहता है और दांत कुछ समय के पश्चात झड़ जाते है। अतः मनुष्य को कभी भी अधिक कठोर नहीं बनना चाहिए।
दांत का टूटने का कारण उसके कठोर स्वभाव है और जीभ की आयु अधिक होने की कारण उसका लचीला स्वभाव है। मनुष्य को सदेब जगह, माहोल और आसपास के लोगो के अनुशार अपने स्वभाव मे लचीलापन लाना चाहिए। वैज्ञानिक सिद्धान्त के अनुशार वही जिव इस पृथ्वी पर जीवित रेह पाये जो पर्यावरण के साथ लचीला बन पाये अर्थात परिवर्तित हो पाये। बकि के जिब विलुप्त हो गए जो पर्यावरण के साथ बदल ना सके।
जीवन के नियम भी कुछ इसी प्रकार के हैं । समुद्र में जब कोई तैराकी तैरता है । वो समुद्र के लहरो के साथ तैरता है तो वो जीवत बचता है और अगर लहरो के विपरीत दिशा में अगर तैहरता है तो अवश्य ही उसे मृत्यु का सामना करना पड़ेगा। नाविक हमेसा लहरो की दिशा मे ही नाव को चलाता है अन्यथा वो अपने लक्ष्य तक कभी नहीं पहुंच सकता।
एक उदाहरण ओर भी है। जल का स्वभाव भी लचीला होता है । इस कारण वो किसी भी मार्ग से बहने का रास्ता ढूंढने में सफल हो जाता है।
पानी जब लचीला होता है उसे काटा या तोड़ा नहीं जा सकता । पर वही पानी जब कठोर और ठोश बन जाता है। तब उसे तोड़ना या काटना बहुत ही सरल बन जाता है। अतः मनुष्य को सदैब सरल और लचीला होना चाहिए।
हरी औम
शुक्रवार, 12 मई 2017
मनुष्य को कभी भी अति सरल क्यों नहीं होनी चाहिए ?
चाणक्य का एक सुंदर कहावत सुनने या जानने में मिलता है । जिसमें चाणक्य केहता है की सीधा वृक्ष को लकड़हारा जल्दी काटने को चाहता है और टेढ़े मेढ़े वृक्ष को वो ऐसे ही छोड़ देता है ये सोच कर की वो उसे बाद मे काटेगा और सोच समझकर काटेगा। मनुष्य के इस समाज में भी कुछ ऐसे ही नियम लागू होते है। कोई भी मनुष्य किसी भी सक्त और कटु वाक्य बोलने वाले व्यक्ति से कभी भी नहीं उलझता है क्यों की उसे किसी तरह अपने बातो में फ़साना और उसे धोका देना कभी सरल नहीं होगा। उसे कुछ बोलने के बदले स्वयं की भी कुछ हानि हो सकती है। सादे और सरल स्वभाव के व्यक्ति को अपने बातो मे फ़साना और उसे किसी प्रकार धोका देना अत्यंत सरल होता है।
ये नियम सिर्फ मनुष्य समाज मे ही लागू होता है ऐसा नहीं है। ये तो प्रकृति का नियम है। आप निश्चित ही जानते होंगे की कांटो से भरा फूल को तोड़ना सरल नहीं है और उसे कोई तोड़ना चाहता भी नहीं क्योंकि कोई कांटो से उलझना चाहता ही नहीं।
दूसरा भी एक इस नियम का प्रमाण है की कोई भी व्यक्ति विषधर और हींशक जीवों से स्वयं को दूर ही रखता है और सरल स्वभाव के जीवों को मारकर खाता है। बलि हमेशा बकरे या भेड़ो की ही चढ़ति है नाकि शेर, वाघ या चीताह की।
भले ही मनुष्य कितना भी बुद्धिमान हो पर वो किसिना किसी बात पर दुशरे मनुष्य से लड़ता जरूर है। ये साबित करता है की मनुष्य भी एक तरह का पशु ही है। कभी भी किसी भी समय शत्रु बना लेता है ।अपने शत्रु को परास्त करने के लिए उसे हमेशा सतर्क रहना चाहिए। अपने सरलता का हमेशा प्रदर्शन नहीं करना चाहिए। शदैब वार्तालाप मे गंभीर भाव लान अति आवश्यक होता है।
धन्यवाद
रविवार, 12 मार्च 2017
नीति शास्त्र और धर्म अधर्म का ज्ञान
अगर कोई व्यक्ति नीति शास्त्र का यथार्थ अभ्यास और पालन करत है। तो उस व्यक्ति को स्वतः ही पता चल जायेगा की कौनसा काम करने से उसे अच्छा परिणाम मिलेगा और किसे करने से अच्छा परिणाम नही मिलेगा। तातपर्य उसे सभी धर्म अधर्म का ज्ञान हो जाता है।- चाणक्य
चाणक्य कहते हैं नीति शास्त्र का अभ्यास करने वाला और नीति शास्त्र में बताये गए उपदेशो का पालन करने वाला कभी किसी भी काम में असफल नहीं हो सकता। क्योंकि उसे स्वतः ही सभी अच्छे बुरे घटनाओं का आभाश होने लगता है। उसे ये भी ज्ञान हो जाता है की कौन सा काम करने से सफलता मिलेगी और किस काम को करने से असफलता का मुंह देखना पड़ेगा। नीति सास्त्र को जाननेवाले लगभग सब कुछ जाननेवाला वन जाता है। स्वतः ही बिना अस्त्र और सास्त्र के सत्रु परास्त हो जाते हैं। जिस प्रकार से चाणक्य ने घंना नंद के पूरे वंश का नाश कर दिया था। महाभारत में भी कई नीतिशास्त्र के ज्ञाताओं के बारे में जानने मिलता हैं। जैसे की कृष्ण, विदुर और संकूनि, ये सभी नीति शास्त्रों धुरंधर माने जाते थे। संकुनि ने ये प्रण लिए थे की वो कौरव वंश का पूरी तरह से नाश कर देंगे। वास्तविक रूप से महाभारत युद्ध का मुख्य सूत्र धार शंकुनि था।। नीति शास्त्र का अभ्यास करने से समाज में धर्म का शासन बना रहता है।
गुरुवार, 9 मार्च 2017
नीति शाश्त्र का श्रोत (प्रथम अध्याय-1)
में तीनों लोकों के अधिपति भगवान विष्णु जी को नतमस्तक हो कर नमस्कार करता हूँ । बिभीन प्रकार शस्त्रों का जो सार शास्त्रा है उस राजनीति शास्त्रा उसका में व्यख्यान करता हूँ । -चाणक्य
चाणक्य सभी शास्त्रों को मंथन करने के बाद जो अमृत रूप में प्राप्त नीति शास्त्र है उसका व्यख्यान करने से पहले तिनिलोकों के स्वामी भगवान विष्णु को नमस्कार करते हैं। क्योंकि सभी शास्त्र का उद्गम स्थान तो भगवान श्री विष्णु का कंठ हैं। चाहे वो वेद हो या पुराण । किसी भी चीज़ का सुरुआत करने से पहले परमेश्वर का स्मरण करना चाहिए और उस परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए की "है प्रभु मे जो काम तेरा स्मरण करके सुरु करता हूँ उस काम में मुझे तु निर्विघ्न सफल बना। नीति शास्त्र में भी केइ प्रकार के शाखाएं होती हैं । उनमें से कुछ है जैसे की युद्ध नीति, राजनीति और कूटनीति आदि। प्राचीन काल में जो लोग राजापाठ संभालते हैं या राजाओं को जो सलाह देते हैं। उन्हें राजनीति का अभ्यास करते हैं। राजनीति शास्त्र में ये बताया गया है की राजा को कैसा होना चाहिए और एक राज को कीन नियमों को पालन करना चाहिए।
मंगलवार, 6 दिसंबर 2016
नीति शास्त्र का परीचय
हिन्दू धर्म के प्राचीन ग्रंथो मे ये लिखा है की मनुष्य अपने जीवन को सफल बनाना चाहता है तो उसे चार जिजो को पाने का लक्ष्य रखना चाहिए । वो चार प्रकार के लक्ष्य हैं -धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष । इन चारों में से धर्म का पहला स्थान है । धर्म का अर्थ है की मनुष्य को अपनी जिंदगी में क्या चीज़ करनी चाहिए और क्या चीज़ नहीं करनी चाहिए । इन सबका ज्ञान एक ही सास्त्र मे लिखा है । उस शास्त्र का नाम नीति शास्त्र है । जैसे ही इस शास्त्र का नाम कहा गया है । नीति का अर्थ होता है । कर्तव्य या नियम, इससे साधारण मनुष्य को भी ये ज्ञान हो जाता है की उसे अपने जीवन काल मे क्या करनी चाहिए और क्या नही करनी चाहिए । नीति शास्त्र के अनुसार अगर काम किया जाये तो उसे किसी प्रकार का पाप का दोष नहीं लगता। नीति शास्त्र मे भी केइ प्रकार के है । महाभारत और रामायण मे भी नीति शास्त्र का उलेख्य किया गया है । चाणक्य का नीति शास्त्र, बिदूर का नीति शास्त्र और शुक्र नीति शास्त्र के वर्णन मिलते है। नीति शास्त्रो में किंन परिस्थितियों में युद्ध करनी चाहिए या नहीं करनी चाहिए । उन सबका वर्णन मिलता है। महाभारत में जब अर्जुन अपने संबंधियों को अपने प्रतिद्वंदी के रूप में अपने सामने देखकर व्याकुल हो जाता है । उस समय भगवान कृष्ण उसे नीति ज्ञान के बारे में बताया था। श्री मद् भगवत गीता एक पूर्ण नीति शास्त्र ही है। इसमें मनुष्य को अपने जीवन में क्या करनी चाहिए ओर क्या नहीं करनी चाहिए उन सबका ज्ञान भरा हुआ है। अर्जुन कृष्ण से पूछता है । है प्रभु में अपने ही सगे और सम्भधियों का बध कैसे करूँ। ये तो नीति के विरुद्ध है। तब कृष्ण कहते है अर्जुन तु ज्ञानीयो के भाति वचनो को केहत है पर तु वास्तविकता से अनजान हैं। नीति सास्त्र केहता है। जो भी मनुष्य धर्म के विरुद्ध हो और अधर्म पर आरूढ़ हो वो कितना भी पुण्य आत्मा हो या सगा हो उसका साथ नही देना चाहिए। अगर युद्ध करना पड़े भी तो उनके साथ युद्ध करनी चाहिए। दुशरी तरफ वो सब तेरे सत्रु हैं। अगर तु उन्हें नहीं मारेगा तो वे तुझे मार देंगे। अतः तु नीति युक्त होकर धर्म आरूढ़ हो। तुझे किसी प्रकार का पाप नही लगेगा।
नीति शास्त्र में युद्ध नीति के बारे मे भी बताया गया है। युद्ध नीति मे ये बताया गया है की कब युद्ध करनी चाहिये और कब युद्ध नहीं करनी चाहिए। किस से युद्ध करना है और किस से युद्ध नहीं करना चाहिए। सबसे महत्व पूर्ण बात ये है की ये नीति शास्त्र किसीको नपुंसक और कायर नहीं बनाता है । जिस तरह से आज के बुद्धि जिविओं ने अहिंषा का परिभाषा बताते हैं । उसे जानकर कर कोई भी नपुंशक और कायरत्व को प्राप्त निश्चित होगा। वो अपनी और अपनी परिवार की रक्षा तक करनेमे भी असमर्थ होगा। नीति शास्त्र का अगर सही तरह से अनुशरण किया जाये तो जीवन में प्रत्येक क्षेत्र में सफलता आवश्य ही प्राप्त होगी। बिना अस्त्र और शास्त्र के अपने सत्रु का विनाश करने में सक्षम हो जाएंगे। नीति शास्त्र को जानने बाला कभी दुखी नहीं होता।
ऐसा नहीं है की झूट बोलना नहीं चाहिए पर कांह झूट बोलना चाहिए और कांहा झूट नहीं बोलना हैं। इसकी जानकारी नीति शास्त्र को जानने वाला बखूबी जानता है। महाभारत में एक प्रसंग आता है की सत्यबादि युधिस्ठिर को झूट बोल ने को कहा जाता है और युधिस्ठिर किसी भी तरहा का झूठ बोलने से मना कर देते हैं। फिर भगवान कृष्ण उन्हें समझाते है की अगर हम धर्म के रहा पर हैं तो नीति शास्त्र के अनुशार झूठ बोलने में कोई पाप नहीं हैं।



















