सोमवार, 5 दिसंबर 2022

क्यों इस अति आधुनिक काल में आत्महत्यायों के संख्या बहुत अधिक हो गयी है?

इसी अति आधुनिक काल में एक चीज हमेशा से सुनने मिलती है और यह चीज हर न्यूज पेपर में छपती भी है। वो है आत्महत्या। किसी अमुक आदमी ने फलाने जगह पर आत्महत्या करली है। वो इतने करोड़ संपति का मालिक था और बहुत बड़े बंगला में रहता था। आखिर ऐसा हो क्यों रहा है की सम्पन और धनवान व्यक्ति भी आत्मा हत्या कर रहे है। इन सबका मेरे नजरिए से देखें तो इनमे कुछ चीज की कमी है वो है दृढ़ धैर्य और विश्वास । जो सिर्फ आध्यात्मिकता से ही आता है। पहले हम अपने बचपन में सुनते थे की फलाना गरीब व्यक्ति ने गरीबी से दंग आकार आत्महत्या कर ली। पर आज सुनते है की वो फलाना अमीर आदमी ने आत्महत्या कर ली और अपने पीछे बहुत सारी संपति छोड़ गया है। आज देखें तो दिन व दिन आत्महत्याओं की संख्या बढ़ती जा रही है। इसका सबसे बड़ा कारण है मनुष्य में खासकर भारतीय लोगों में आध्यात्मिकता की कमी होना और अपने कामकाज में अत्यधिक तनाव का होना। तनाव होना भी स्वाभिक है पर इसका सही तरीके से प्रबंधन करना भी अति आवश्यक हो जाता है। मनुष्यों को तनाव होने का बहुत से कारण है आजकल । पर अपने अंदर उसे लड़ने की क्षमता विकसित करनी चाहिए । 
हमारे प्राचीन ऋषि मुनियों ने समाज के हर अंग पर पुरजोर काम किया और वैज्ञानिक विधि का ज्ञान अपनी लेखनियों की सहायता से पुस्तकों में लिखा। जैसे की शरीर की बीमारियों के लिए आयुर्वेद शास्त्र और मानसिक रोगों के लिए आध्यामिक शस्त्रों की रचना की। पर आज का मनुष्य अपने आप को बौद्धिक, वैज्ञानिक और तार्किक सोच वाला कहता है और प्राचीन हिंदू शास्त्रों को अतार्किक और अंधस्था कहता हैं। इतने वैज्ञानिक और तार्किक सोचवाले होने पर भी दिन प्रतिदिन मानसिक रोगियों की संख्या बढ़ती जा रही है। हम भारतीय हमेशा ऐसा सोचते है की पश्चिमी देश बहुत ही विकसित और सफल हैं। ये भारतीयों की एक भ्रम मात्रा है। अमेरिका जैसे विकसित देशों में धनवान और समृद्ध लोगो होने पर भी वांहा मानसिक रोगियों और पागलखानों की संख्या बढ़ती जा रही है।  तो एक प्रश्न आता है की आध्यात्मिकता मनुष्य को कैसे आत्महात्यों से रोक सकती है। उदाहरण स्वरूप नीचे एक कहानी समझाया जा रहा है।
मानो एक कंपनी में कुछ कर्मचारी काम करते है और उनका बोस उन्हें दिशा निर्देश देता है काम करने के लिए। बॉस कहता है तुम बस काम करो सही हो या गलत हो में संभाल लूंगा तुम बस काम पर ध्यान दो। वो सभी कर्मचारी पूरे मन से काम करते है और अपने उप्पर कोई तनाव नहीं रखते । अगर कुछ प्रॉब्लम आता है तो वे अपने बॉस के साथ विचार विमर्श कर लेते है और उस प्रॉब्लम को सामना करने के लिए वो पूरी तरह से अपने बॉस पर निर्भर है। और उन्हें पूरा विश्वास रहता है की उनका बॉस सब ठीक कर देगा और ठीक हो भी जाता है। तो आनंद से वो इस कंपनि में काम करते है। उसी तरह आध्यात्मिक व्यक्ति संसार में होने वाली किसी भी प्रकार की समस्या का समाधान वो परमेश्वर पर छोड़ देता है जो वो खुद समाधान नहीं कर सकता । वो यह विश्वास रखता है की ईश्वर उसकी समस्या का समाधान कर देंगे। इस तरह से वो तनाव मुक्त रहता है और उसे पूरा विश्वास रखता है । अगर कोई व्यक्ति पूरा विश्वास करता है तो वो पूरी तरह से तनाव मुक्त रहेगा और अगर थोड़ा भी करता है तो उसका तनाव थोड़ा कम हो जायेगा। अगर बिल्कुल भी नहीं करता तो भी उसका तनाव ऐसा रहेगा की उसे थोड़ा सहार मिल जाएगा आध्यात्मिक से की वो आत्महत्या न करें । आध्यात्मिक व्यक्ति के भाव ऐसे ही होते है । इस प्रकार भाव होने से मनुष्य को मानसिक बल मिलता है और उसके अंदर धैर्य, विश्वास और समस्या से लड़ने का सामर्थ्य प्राप्त करता है। वो हमेशा अपने आपको परमेश्वर के कृपा और संरक्षण में महसूस करता है। आध्यात्मिक मनुष्य की मानसिकता ऐसी होती है की वो दुनिया को नश्वर मानता है और आत्मसंतुष्टि अनुभव करता है। दुःख होने पर अपने बॉस के पास जाकर उनसे अपनी बात बताता है अर्थात परमेश्वर से प्रार्थना करता है । उसे इस बात का पूर्ण विश्वास होता है की परमेश्वर उसकी सहायता अवश्य ही करेंगे और उसके साथ वैसे ही होता भी है। जो जैसा भाव करता है उसे वैसा फल प्राप्त होता है। बहुत से आध्यामिक पुस्तक भी ऐसी मानसिकता बनाने में बहुत काम करती हैं जैसेकी श्रीमद्भगवद्गीता। श्रीमद्भागवत गीत में भगवान कृष्ण ने कहा है "योग क्षेमम बहाम्ह्यम" अर्थात मैं परमेश्वर उनकी हर तरह से सहायता और बल देता हूं जो मुझ से योग क्षेम रखते है या पूरी तरह से मुझ पर निर्भरशील रहते हैं। ऐसी अध्यात्मिक किताब पढ़ने से मनुष्यों में परमेश्वर के प्रति विश्वास उत्पन होता है और परमेश्वर पर निर्भरशील रहते हैं। उन्हें ऐसा लगाने लागत है की वो अकेले नहीं हैं इस संसार में। कोई तो है जो उसकी सहायता कर सकता है और उसका आत्मबल बढ़ता है। 
ऐसा देखा गया है की बहुत से लोगों ने इसलिए आत्महत्या करली हैं क्योंकि वो अकेले थे इस दुनिया में। ऐसे मानशिकता के लोग इसलिए आत्महत्या कर लेते है क्योंकि उन्हें अपने आसपास कोई उनको सहारा देने वाला नही मिल और वो अकेलापन महसूस करते हैं। अगर किसी आध्यात्मिक व्यक्ति से पूछो अकेलापन क्या होता है तो शायद वो नहीं बता पाएगा। क्योंकि वो अपने आपको सदैव परमेश्वर के पास ही महसूस करता है। आध्यात्मिक व्यक्ति एकांत में रहता है पर वो अकेला नहीं रहता। वो अपने आपको परमेश्वर से हमेशा जुड़ा पाता है। अकेले रहनेवाले लोगो को भी आध्यामिक भाव को अपनाना चाहिए। इस प्रकार आत्महत्या करने से बचा जा सकता है ।


जय महाकाल 

बुधवार, 16 नवंबर 2022

दुर्बल व्यक्ति कभी भी समाज में शांति और संतुलन की स्थापना नहीं कर सकता |

हमारे देश में अक्सर ऐसे लोग मिल जाते है जो कहते रहते ही की गांधीवादी बनो । अहिंसा का पालन करो और कोई एक गाल पे थपड़ मारे तो उसे दूसरा गाल दिखा दो। पर उसके साथ किसी भी प्रकार उसे मारो मत या हिंसा का सहारा मत लो। ऐसे करने से उस आदमी में पश्चाताप का एहसास होगा और समाज में हिंसा कम हो जायेगी। समाज में शांति की स्थापना होगी। इस तरह की सोच समाज को बरबाद कर देगी और तबाह कर देगी । ऐसी सोच सिर्फ मूर्ख रखते हैं। समाज में कल्याण और शांति स्थापन करने के शक्ति का भी संतुलन होना अति आवश्यक है। हमारे प्राचीन ग्रंथो में बहुत से कथा कहानियां पाई जाती है। 
हिरण कभी शेर से शांति वार्ता कर नहीं सकता क्योंकि हिरण की वो सामर्थ्य ही नहीं है। जो गांधीवादी बोलते हैं की सारे अस्त्र और शस्त्रों को फेक दो । ये बेवकूफी वाला काम है। प्राचीन काल में जब जब असुरों ने तपस्या कर देवताओं से अधिक शक्तिशाली होने का प्रयत्न किया तब तब देवताओं ने अपनी शक्ति सामर्थ्य का वृद्धि कराया। ताकि देव और असुरों में संतुलन बना रहे। शक्ति और सामर्थ्य में संतुलन रखना समाज और जाती के लिए कल्याण कारक होता है। जंगल में अपने देखा होगा की दो समान शक्ति वाले पशु कभी भी नहीं लढ़ते। क्योंकि एक को दूसरे से भय बना रहता है। अगर युद्ध होता भी हे तो दोनों को ही क्षति होती है और तभी ही किसी पशु की प्राण जायेगी जब दोनों के बीच शक्ति का असंतुलन बढ़ जाएगा। पूर्व में जितने भी विश्वयुद्ध हुए हैं उनसबका एक ही कारण है शक्ति की असंतुलनता। जब लगभग बहुत से देशों के पास परमाणु बम उपस्थित है। उसी कारण से सभी देशों के बीच एक भय है की कहीं हमारे ऊपर भी परमाणु बम ना फेक दिया जाए। इस संदर्भ में हिंदी कहावत है की "मरता क्या ना करता"। जो देश परमाणु बम के आक्रमण से नष्ट हो रहा हो । वो देश अंतिम क्षण में किसी भी शक्तिशाली देश के ऊपर परमाणु बम फेक देगा। ये एक सीधा सा मनोविज्ञान है। जंगल में शेर कभी बाघ को मारकर बाघ मांस नहीं खायेगा। शेर को भी पता है अगर में बाघ का शिकार किया भी तो शायद बाघ का हमला भी उसके लिए पतन घातक हो सकता है।
भारत में आज़ादी के बाद ऐसे बहुत से बेवकूफ नेता हुए । जो ये कहते थे कि हमारे देश में सैन्य शक्ति की क्या आवश्यकता है। हम तो शांति प्रिय देश हैं। सैन्य शक्ति को बैन कर दिया जाना चाहिए। हम तो शांति के पैरवी करनेवाले हैं और कुछ विदेशी ताकतों ने हमारी सैन्य शक्ति को बंद करवाना भी चाहते थे। हमारे अपने बेवकूफ नेताओं की वजह से हथियार बनान भी लगभग बंद कर दिया गया था फैक्ट्रियों में और उन फैक्टरियों में जूते चप्पल बनाया जरहा था। ठीक उसी समय हमारे पड़ोसी देश चीन ने आक्रमण कर दिया ये सोच कर की भारत तो कमजोर है और वो युद्ध जीत भी गया। हमारी कुछ जमीन भी उनके कब्जे में चली गई।
अगर में सच कहूं तो प्रतेक मनुष्य के जीवन में एक शत्रु का होना अति आवश्यक है। इसे उसकी सामर्थ्य, योग्यता और शक्ति जानने में सहायक होती है। हमारे देश भारत का भाग्य बहुत अच्छा था की बेवकूफ नेताओं के सोच पर नहीं रहा और भारत को दो पड़ोसी शत्रु मिलगाए । एक पाकिस्तान और चीन, जिसने भारत को लड़ने और स्मार्थ्य बढ़ने पर विवश कर दिया । हमे चीन और पाकिस्तान का मन ही मन धन्यवाद भी करना चाहिए।
यही प्रकृति का नियम है की शक्तिशाली लोग ही दुर्बल लोगों पर शासन करते हैं। अगर समय रहते दुर्बल लोग अगर अपनी शक्ति में वृद्धि नहीं करते तो निश्चय ही भविष्य में वो खत्म कर दिए जाएंगे और गुलाम बना लिए जायेंगे। यही आदि काल से होता आया है और होता रहेगा। सनातन धर्म में कहीं ऐसा नहीं कहा ही की मार खाकर बैठ जाओ और पलटवार मत करो । लोगों ने अहिंसा का अर्थ ही बदल दिया है। महाभारत में कहा गया है की "अहिंस परमो धर्म । धर्म हिंसा तथैव च ||" बेशक अहिंसा परम धर्म है पर धर्म की रक्षा में हिंसा करना उसे भी अच्छा है।  मनुष्य के पास इतनी तो सामर्थ्य अवश्य ही होना चाहिए की वो अपनी रक्षा कर सके। कोई भगवान नहीं उतारेंगे आपकी रक्षा करने। इसलिए सनातन धर्म में ऐसे बहुत से देवी देवता उपस्थित है जो अस्त्र और शस्त्र धारण किए हुए हैं।

जय महाकाल

शनिवार, 21 मई 2022

बुद्धिमान मनुष्य को मूर्ख व्यक्ति से बाद विवाद कदापि नहीं करनी चाहिए।

बुद्धिमान मनुष्य कभी ना कभी मूर्ख मनुष्य के साथ बाद विवाद में पड़ ही जाता है। जिसके कारण बुद्धिमान मनुष्य खुद कष्ट में पड़ता है । कभी कभी तो बुद्धिमान मनुष्य को आर्थिक और जानमाल का नष्ट होने का भी खतरा बन जाता है। अतः बुद्धिमान मनुष्य को चाहिए की वो मूर्ख व्यक्ति से वार्तालाप कम या बाद विवाद करना परहेज करें । परहेज करने में ही बुद्धिमान मनुष्य का हित है।
एक कहानी है जो बुद्धिमान खरगोस और मूर्ख गधे की बीच चले बाद विवाद का । जो मुझे एक बनिया मित्र ने मुझे समझाया था। जिससे मैं मेरे जीवन में अवश्य ही अनुशरन करता हूं और मेरे जीवन में बहुद लाभ हुए हैं। वो कहानी कुछ ऐसा है।
गधा सबको बोल रहा था की आकाश का रंग पीला है। ऐसा बोलते बोलते खरगोश तक पहुंचता है और खरगोश को आकाश की तरफ देख कर बोलता है की आकाश का रंग पीला है। खरगोश आश्चर्य होकर कहा - ना आकाश कर रंग तो नीला है। इस से गधा थोड़ा गुस्से में आकर कहा नहीं आकाश का रंग पीला है तुम्हे कुछ नहीं पता है। खरगोश असमंजस में था की ये गधा क्या बोल रहा है। खरगोश के ज्ञान के अनुसार आकाश का रंग तो नीला है और अनुभव से आकाश नीला ही दिखता है। गधा अपनी बात पर ही अड़ गया न टस से मस हुआ और ना ही वो खरगोश की बात सुनना चाहता था। खरगोश भी अपनी जिद्द पर अड़ गया की वो गधे से ये मनवा के रहेगा की आकाश नीला है। खरगोश ने गधे से कहा चलो किसी से भी पूछ लो की आकाश नीला है। बारी बारी कर आते जाते सबसे से पूछते पर कोई कुछ उत्तर नहीं देता। अंत में गधे ने कहा ठीक है । जंगल के राजा शेर के पास जाते है और वो जो बोलेंगे वो सही होगा। दोनो शेर के पास जाते है और अपने बाद विवाद का विषय उसे बताते हैं। शेर थोड़ा समय सोचता है और ये आदेश देता है की खरगोश को बंदी बना लो और जेल में डाल दो। खरगोश डर जाता है और आश्चर्य हो जाता है की शेर ऐसा कैसे कर सकता है क्योंकि वो सही है इस विषय में। खरगोश जेल में कई दिन गुजार देता है । फिर किसी दिन खरगोश को शेर से मिलने का मौका मिलता है तो खरगोश शेर से पूछता है की गधे और उसके बीच हुई बाद विवाद में वो सही था फिर भी आपने मुझे जेल में डाल दिया लेकिन क्यों। तब शेर कहता है की मैने तुम्हे जेल में इसलिए नहीं डाला की तुम सही हो या गलत । मैने इसलिए जेल में डाल की तुम ज्ञानी और बुद्धिमान हो और तुमने अपने बराबरी के लोगों से बाद विवाद नहीं किया और गधे से बाद विवाद कर बैठे और उसे समझाने में जिद्द पकड़ लिए। तुम्हे जेल में डाल था तुम्हारी सीख के लिए ताकी तुम समझ जाओ की अज्ञानी को समझाना समय की बरबादी और ज्ञान का नष्ट होना है। तुमने अपना समय भी व्यर्थ किया, आते जाते लोगों का समय भी नष्ट किया और मेरा भी समय नष्ट किया। तुम्हे पता है । आते जाते लोगों को ये पता था की तुम सही हो फिर किसी ने कुछ कहा नहीं। क्योंकि की उन्हें पता था की गधा इसे कभी नहीं मानेगा। खरगोश को अपनी भूल समझ में आ गई थी और उसने शेर को धन्यवाद दिया इस सीख के लिए और अपने घर चला आया । इस कहानी के सारांश स्वरूप ये सामने आता है की मूर्ख को एक बार ही ज्ञान दो अगर माने तो ठीक । नहीं तो कदापि उसे बाद विवाद नहीं करनी चाहिए।
धन्यवाद, 🙏 जय जगन्नाथ💐

सबके अहंकार का शत्रु समय है।

प्रत्येक मनुष्य अपने जीवन में किसी ना किसी बात को लेकर अहंकार करता ही है। मनुष्य को अहंकार आना एक स्वाभाविक क्रिया है। पर इसे नियंत्रण में रखना अति आवश्यक है। क्योंकि प्रत्येक जीव को अपने आप पर अहंकार होता ही है। पर उस अहंकार को बाहर नहीं आने देना चाहिए और उसका कुप्रभाव संसार पर नहीं पड़नी चाहिए। जंगल में रहनेवाला शेर भी अपने आप को अहंकार वस जंगल का राजा मान लेता है और ऐसा सोचता है की जंगल में सब कुछ उसके अधीन है । सिर्फ तब तक जब तक उसके सामने कोई समान शक्ति वाला शेर या अधिक शक्तिवाला शेर उस जंगल में नहीं आ जाता। 
ऊंट और पहाड़ की एक संक्षिप्त कहानी है जो उनके अहंकार से संबंधित है। कहानी कुछ ऐसी है । मरुभूमि में रहने वाला ऊंट भी अपने आप को ऊंचा मानकर अहंकार करता है की इस दुनिया में उसे कोई ऊंचा नहीं है। सिर्फ तब तक जब तक ऊंट पहाड़ के नीचे नहीं आता । पहाड़ के नीचे आने से ऊंट का अहंकार चूर चूर हो जाता ही। उसी तरह पहाड़ को भी अहंकार होता है की उसके जैसा संसार में कोई ऊंचा नहीं है और उसे कोई चढ़ नही सकता। पर समय आने पर एक ऊंट भी उस पहाड़ के ऊपर चढ़ जाता है और पहाड़ उस ऊंट के नीचे होता है। तो कहने का तात्पर्य ये है की बड़ा कौन है। कुछ लोग कहेंगे पहाड़ और कुछ लोग कहेंगे ऊंट। पर में मेरे समझ से कहूंगा "समय" जिसने दोनो को बड़ा बनने का मौका दिया पर अहंकार के घेरे में दोनों आ गए। समय से ऊंचा और समय से बड़ा शक्तिशाली कोई नहीं है। अतः अहंकार करना इस मनुष्य जीवन में पूरी तरह से व्यर्थ ही है। हां ये स्वभाव में है। मनुष्य का स्वभाव भी ज्ञान प्राप्त करना और अहंकार को ज्ञान के द्वारा नियंत्रण में रखना ।

हरी ॐ 🙏

रविवार, 22 अगस्त 2021

अपने परम शत्रु की कभी निंदा नहीं करनी चाहिए बल्कि उसकी प्रशंसा करनी चाहिए।

बुद्धिमान व्यक्ति कभी अपनी शत्रु का निंदा नहीं करता और खास कर शत्रु के सामने तो कभी भी नहीं। शत्रु का तात्पर्य यहां अपने किसी भी प्रकार का प्रतिद्वंदी से हो सकता है। चाहे वो व्यवसायिक प्रतिद्वंदी हो या वैचारिक प्रतिद्वंदी। जब हम शत्रु की प्रशंसा करते हैं तो हम उसकी एकाग्रता, लक्ष्य और निर्धारण शक्ति पे चोट करते है। जैसे ही उसकी प्रशंसा होती है उसकी पकड़ और बुद्धि में शीतलता आना प्रारंभ हो जाता है। उसका मन स्वभाव से खुश होने लगता है। उसकी बुद्धि और भावना असीमित समझ, लक्ष्य और शत्रु के प्रति पूर्ण एकाग्रता टूटने लगती है। जैसे ही उसकी एकाग्रता भंग होगी वैसे ही उस पर प्रहार करना चाहिए। वो सब कुछ जानकर भी कुछ नहीं कर सकता । क्योंकि उसकी बुद्धि के ऊपर प्रशंसा का परदा पड़ गया है। बुद्धिमान को कभी भी स्वयं की प्रशंसा किसी और से सुनने की इच्छा कदापि नहीं रखनी चाहिए। अगर कोई प्रशंसा कर भी दे तो बुद्धि उस प्रशंसा में रुके नहीं रेहान चाहिए। प्रशंसा एक विष के समान हे। जिसे शत्रु को पिलानी चाहिए ताकि आप स्वयं विजयी हो सके ना की आप स्वयं शत्रु से विष पी ले।
जो मित्र आपकी हर समय हर चीज पर प्रशंसा करता है । वो कदापि मित्र नहीं हो सकता। वो आस्तीन में रहने वाले सांप के सामान हे जब भी आपका एकाग्रता भंग होगा तब वो दंश लेगा। अतः बुद्धिमान को सावधान रहने की अति आवश्यकता है। निंदा करने वाला सदा मित्र ही होता है । क्योंकि वो सामनेवाले की कमियों को देखता है। उस निंदक से, हम लक्ष्य तय करना और एकाग्र रहने में सक्षम होते हैं।

रविवार, 25 अप्रैल 2021

"मन चंगा तो कठौती में गंगा" के अनर्थ सोच |

साधारणतः हमारे आस पास धार्मिक भावनाओं को लेकर एक कहावत कही जाती है "मन चंगा तो कठौती में गंगा" । कुछ ना समझ लोग या यूं कहें आज कल के पढ़े लिखे लोग इसे गलत तरह से समझते है और इसका अर्थ भी गलत निकालते है और गलत उपदेश भी देते है। जैसे कि एक बार एक माँ ने अपने बेटे को उसके जन्म दिन पर कहा की वो मंदिर जाकर दर्शन कर आये। इस पर बेटे ने कहा मम्मी "मन चंगा तो कठौती में गंगा" तो मंदिर क्यों जाऊं। 
एक और बात है । एक व्यक्ति की मृत्यु हो गयी थी और उनका चिता भस्म गंगा में प्रभाहीत करना था। उनकी पत्नी ने अपने बेटे से कहा कि वो वाराणसी जाके उनकी चिता भस्म को गंगा में प्रभाहीत कर दे और पिंड दान भी कर आये। इस पर अपनी कार्यालय की व्यस्तता पर बेटे ने कहा मम्मी "मन चंगा तो कठौती में गंगा"। फिर कहा गंगा में प्रभाहीत करने से क्या होगा । उसे अपने पास की नदी में प्रभाहीत कर देते हैं। फिर उसकी माँ ने कहा की तेरे अपने पिता की आत्मा की शांति के लिए गंगा में ही प्रभाहीत करना आवश्यक है। तब बेटा कहता है ये सब अंधविश्वास है। वह बेटा पहले "मन चंगा और कठौती में गंगा" जैसे कहावत कहता है । जो किसी एक संत ने कहा था। पश्चात इसे एक अन्धविश्वाश कहता है। इस कहावत में कोई बुराई नहीं है। जिसे एक प्रसिद्ध संत ने अपनी सोच और आध्यात्मिक स्थिति के अनुसार कहा था। पर आज के युग के लोग इन आध्यात्मिक कहावतों को बिना जाने और अनुभव किये अपनी अवशर और परिस्थिति के अनुसार उपयोग करते हैं।
इस कहावत को संत रविदास जी ने अपनी आध्यात्मिक स्थिति और उचाई के अनुसार कहा था। लोग कोई धार्मिक कार्य में बस छुटकारा पाने के लिए इस प्रकार के कहावतों का सहारा लेते हैं। राबिदास जी को ईश्वर को हर स्थान में, हर वस्तु में देखने का अनुभव और अभ्यास था। एहि ज्ञान वो समाज को और उनके अनुयायिओं को इस कहावत से देते थे। पर आज का मनुष्य इतना शिक्षित होने पर भी अर्थ का अनर्थ कर बैठता है। मंदिर ना जाने के बहाने से वो ये कहता है। पर मनोरंजन के लिए वो थिएटर, पब और पार्टी करने यंहा वंहा जा सकता है। तब वो ये नही बोलता की मनोरंजन तो घर में भी हो सकता है।
आज के युग का मनुष्य तो बिना स्नान के प्रतिष्ठित मंदिरों में ऐसे ही प्रवेश कर लेता है और कहता है "मन चंगा और कठौती में गंगा"। पर उसके मन में "अत्र तत्र सवत्र ईश्वर" का भाब बिल्कुल ही नहीं हैं। मनुष्य को अवश्य ही धार्मिक अंधत्व से बाहर निकलना अति आवश्यक है। पर इतना शिक्षित होने पर भी अपने मन मे अशिक्षित विचार और आचरण भी समाज के लिए सही नहीं है। हर धार्मिक कार्य अन्धविश्वाश के साथ जोड़ कर नहीं देखना चाहिए। प्रत्येक हिन्दू धार्मिक कार्य का महत्व अवश्य ही है । उसका अनुसंधान अवश्य ही होना चाहिए। ये हिन्दू धार्मिक कार्य मनुष्य के शरीर और मन से जुड़े हुए हैं। 
"मन चंगा तो कठौती में गंगा" ये कहावत की सार्थकता एक और तरह से भी मिलती है। अगर कोई व्यक्ति की मृत्यु हुई है और उसका पुत्र अपने पिता के चित्त भष्म को गंगा में प्रभाहीत करने में शारीरिक या आर्थिक रूप से संक्षम नहीं है तो उस स्थिति में । उसे अपने पास के किसी भी जलासय में जाकर, उस जलासय को मन में माता गंगा का ही रूप समझ कर चिता भस्म को प्रभाहीत कर सकते है। 
यंहा इसे कहने का तात्पर्य यह था कि धार्मिक अर्थो को अनर्थ की ओर न मोड़े। जो धार्मिक कार्य करने में अगर मनुष्य समर्थ है तो ईश्वर की खुशी के लिए उसे पूर्ण विधि विधान से संपन्न करना चाहिए।

🙏 जय महाकाल🙏

गुरुवार, 25 मार्च 2021

क्यों वृद्ध व्यक्तियों के साथ बैठने से मनुष्य की उम्र बढ़ जाती है ?

साधारणतः ऐसा कहा जाता कि अगर कोई कम आयु का व्यक्ति किसी वृद्ध व्यक्ति के साथ बेठता है और बातचीत करता है तो उसकी उम्र बढ़ जाती है। इसका क्या तात्विक अर्थ है । क्या यह सच है की युवा व्यक्ति की आयु बढ़ जाती है। उम्र का बढ़ने का तात्विक अर्थ यह है कि उस युवा व्यक्ति का अनुभव उस वृद्ध व्यक्ति के बराबर हो जाता है। वो वृद्ध व्यक्ति की आयु अधिक होने पर उन्हें सभी प्रकार का ज्ञान और अनुभव जो जीवन मे मिला वो अधिक होगा। जभी उस ज्ञान और अनुभव को किसी बच्चे या युवा व्यक्ति से आदान प्रदान करते है तो उस बच्चे या युवा व्यक्ति का ज्ञान और अनुभव उस वृद्ध व्यक्ति के बराबर हो जाता है। इसे ही आयु बढ़ना कहते हैं। उस वृद्ध व्यक्ति ने जीवन में कितना कुछ देखा होगा, कितना कुछ सुन होगा और जाना होगा। जब भी वो किसी के साथ ज्ञान और अपना अनुभव बांटता है उस व्यक्ति का आयु भी उस बृद्ध व्यक्ति अनुभव जितना हो जाता है। 

जय महाकाल🙏

अगर अपने शत्रु या प्रतिद्वंदी को असफल करना चाहते हो तो क्या करना चाहिए ?

अगर अपने शत्रु को हर परिस्थिति में हराना चाहते हो। तो कभी भी शत्रु का विरोध नहीं करना चाहिए। सदैब उसकी झूठी प्रशंसा करते ही रहना चाहिए। उसकी झूठी प्रशंसा करने पर शत्रु के मन में अहंकार का जन्म होगा और वही अहंकार उसे नीचे गिराने में सहाय होता है। अहंकारी मनुष्य सभी प्रकार का पाप करने में अग्रशर होता रहता है। जभी उसका पाप बढ़ेगा उसे नीचे गिरने में भी अधिक समय नहीं लगेगा। शत्रु का विरोध करने पर शत्रु को एक लक्ष्य प्राप्त हो जाता है और वो उस लक्ष्य को प्राप्त करने में पूरी एकग्रता से जुड़ जाता है। अतः शत्रु को कभी भी लक्ष्य साधने में सफल नहीं होने देना चाहिए। जो मनुष्य को स्वयं की प्रशंशा सुनना अच्छा लगता है वो मनुष्य जीवन में कभी भी सफल नहीं हो पाता है। सफल व्यक्ति स्वयं को सदैव प्रशंसा से दूर रखता है और अपनी निंदाओ को अवश्य ही सुनता है। जो व्यक्ति सफलता के शिखर पर पहुंचे होते है। वो अपने प्रशंसकों के वजह से नहीं बल्कि अपने निंदकों के वजह से सफलता की शिखर को छूते हैं। स्वयं की प्रशंसा ही सभी पाप की बीज होती है। कभी भी किसी भी मनुष्य को प्रशंसा की इच्छा नहीं करनी चाहिए।

जय महाकाल🙏

रविवार, 21 मार्च 2021

क्या शत्रु को क्षमा करना वीरता का काम है?

अपने हर तरह के शत्रु को क्षमा करना कदापि वीरता का काम नहीं है। हां, अगर कोई शत्रु सच मे बहुत कमजोर है, बीमार है, और जो अपने बराबरी पर खड़ा नहीं हो सकता उसे माफ किया जा सकता है। पर ऐसा शत्रु जो धनवान है और शक्तिशाली भी है और वो आपसे हार गया है । ऐसे शत्रु को कभी माफ नहीं करना चाहिए और कभी भी उसका संगत नहीं करनी चाहिए। भले ही उसकी हत्या तो नहीं कर सकते पर मित्रता भी नहीं करनी चाहिए। जो इस तरह के शत्रु को माफ करता है । वो देर सबेर शत्रु के हाथों भबिष्य में परास्त होता है या अपने जीवन से ही हाथ धो बेठता है। अतः शत्रु को माफ कर देना कतापी बुद्धिमानी नहीं है और नहीं वीरता की निशानी है। सदैब ही अपनी शत्रु पर नज़र रखते रहना चाहिए और उसकी कमज़ोरी को ढूंढते रहना चाहिए। जरूरत पड़ने पर शत्रुकि कमज़ोरी पर वार करना चाहिए।

रविवार, 14 मार्च 2021

किस तरहा के लीगों के साथ संगत करनी चाहिए?

मनुष्य के जीवन में बहुत से लोग आते हैं और चले जाते हैं। पर कुछ लोगों का प्रभाव उस मनुष्य के जीवन भर रहता ही हैं। यह प्रभाब अच्छे भी हो सकते है और खराब भी हो सकते हैं। जैसे बुजुर्गो ने कहा है अच्छे लोगों के साथ रहोगे तो अच्छा बनोंगे और बुरे लोगों के साथ रहोगें तो बुरा बनोगे। बहुतसिं कहावतें भी हमारे समाज में प्रचालित है । जैसे कि " एक गंदी मछली पूरी तालाब को गंदी कर देती हैं" और "एक खराब आम टोकरी में रखे हुए सभी आमों को खराब कर देती है। अतः किसी भी मनुष्य को समाज स्व बहिस्कृत मनुष्य का संगत कतापी नहीं करनी चाहिए। जिस मनुष्य का समाज में कोई पहचान नहीं सम्मान नहीं उनका संगत कतापी नहीं करनी चाहिए। अगर कोई उसका संगत करता है तो उस मनुष्य की व्यक्तित्व भी वैसा ही माना जाता है। अगर मान लिया जाए कि एक शराबी हैं जो हमेशा नशे में धूत रहता है और उसका एक मित्र है जो उसके साथ हमेशा रहता है। अगर उसका मित्र ये कहता है कि वो शराब नही पिता तो कतापी कोई उसकी बातों पे विश्वाश नहीं करेगा। चोर का मित्र जो हमेशा चोर के साथ रहता है और कहे कि चोरी उसने नहीं कि । तो पुलिस कभी उसकी बात मान नहीं सकते।
यह एक मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि जो मनुष्य जिसके साथ अधिक समय रहता है । उसकी मानशिकता उसके जैसे ही हो जाती है। चाहे वो मनुष्य कितना ही दृढ़ निश्चयी क्यों ना हो। अपराधी प्रबृत्ति के लोगो के साथ रहने से अपराधी जैसे मानशिकता हो जाती है और अंततः आपराधिक प्रवृतियों में सलंग्न हो जाते है। अगर मनुष्य ज्ञानी और आध्यात्मिक विचार वालोँ के साथ अगर अधिक समय गुजारता है तो वो ज्ञानी और अध्यात्म वादी बनता हैं। 
जो मनुष्य सदा दुःखी रहने वाले के साथ समय।व्यतीत करता है । वो मनुष्य भी सदा दुःखी रहता है। एक व्यक्ति की मनोस्थिति दुशरे मनुष्य के मन पर भी पड़ता है। अतः सदा खुश मिज़ाज़ मनुष्य का संगत करें। मनुष्य अगर आपराधिक प्रबृत्ति, दुःखी, चुगल खोर, नीच मानशिकता और समाज से बहिस्कृत मनुष्य का संगत करता है तो उसे भी समाज का तिरस्कार शुननी पड़ेगी और उसकी मानशिकता भी वैसे ही हो जाएगी। अपने संगत को अवश्य ही सुधारना चाहिए और अच्छे लोगों का संगत करनी चाहिए। जैसे ही कोई अच्छे लोगों का संगत चालू कर देता है वैसे ही बुरे संगत का असर खत्म होना सुरु।हो जाता है।

जय महाकाल

क्यों अपने गुरु से बाद विबाद शत्रुता या गुरु का अपमान नहीं करनी चाहिए?

भारतीय वेद, पुराण और शास्त्रों में गुरु को परमेश्वर की संज्ञा दी गयी है। कुछ संत और ऋषियों ने तो गुरु को ईश्वर से भी ऊपर माना है। क्योंकि गुरु प्राप्ति की आवश्यकता ईश्वर प्राप्ति की आवश्यकता से पहले आता है। अतः गुरु को प्रथम स्थान पर रखा गया है और द्वितीय स्थान पर ईश्वर को रखा गया है। 
जब कोई शिष्य गुरु से ज्ञान प्राप्त करता है। तब उस शिष्य को ये नियम अवश्य ही प्राप्त करना चाहिए कि वो गुरु से किसी भी प्रकार का मिथ्य भाषण ना करें। गुरु जैसा कहें वैसा ही करें। 
जब गुरु किसी अपने शिष्य को ज्ञान देता है। गुरु भली भांति यह ज्ञान होता है कि शिष्य की क्या कमज़ोरी है और शिष्य को कैसा ठीक किया जाए। अतः शिष्य को कभी भी गुरु के साथ बगाबत नहीं करनी चाहिए। नहीं तो गुरु के क्रोध होने पर शिष्य के प्राण भी जा सकते है। गुरु उस माली के जैसा है । जिसे अच्छे से पता है किस फुल की बृक्ष को किस प्रकार का खाद देना है। बृक्ष को कितनी कटाई छटाई करनी है। गुरु को अपने शिष्य के बारे में यह भी पता है कि शिष्य को कोनसा ज्ञान या विद्या पचेकि और कोनसा ज्ञान नहीं पचेगी। 
अपने गुरु का कभी भी अपमान नहीं करना चाहिए भले ही गुरु शिष्य को कितना ही दूसरो के सामने अपमानित करें। अगर गुरु अपने शिष्य को अपमानित करता है तो अवश्य ही उसमे शिष्य का हित छिपा हुआ होगा। गुरु के सामने ऊँची आवाज़ में बात करना, गुरु के सामने पैर फैलाकर बैठना, गुरु के खाने से पहले भोजन खा लेना सरासर गलत है। इसे गुरु कुपित होते हैं और गुरु शिष्य को वो ज्ञान नहीं देता है जिस ज्ञान को शिष्य प्राप्त करना चाहता है। अतः नीति के हिसाब से अपने गुरु से किसी भी प्रकार का शत्रुता, बाद विबाद कताहि नहीं करनी चाहिए।
ओम गुरु देवाय नमः

मंगलवार, 18 सितंबर 2018

किस प्रकार के शत्रुओं से अधिक सतर्क रहना चाहिए ?

मनुष्य अपने जीवन काल में बहुत से मित्र और बहुत ज्ञात या अज्ञात शत्रुओं को बना लेता है। कभी कभी तो स्वयं के मित्र भी अज्ञात शत्रु के रूप में रहते हैं। ज्ञात शत्रुओं से अज्ञात शत्रु अधिक प्राणघातक होते हैं। ऐसे शत्रु धर्म ओर नीति कतपि नहीं मानते। ऐसे शत्रु हमेशा गुप्त रूप से आस पास ही रहते हैं और अपने लक्ष्य की प्रतीक्षा करते रहते हैं। जिस मनुष्य को जान से मारने का लक्ष्य रखते हैं। उसके विषय में वो सभी प्रकार के जानकारियां इकठा कर लेते है। जैसे की वह मनुष्य के कब खाता है, कब सोता है, कब भ्रमण करने निकलता है और कब युद्ध का अभ्यास करता है। इस स्थिति में मनुष्य को हमेशा सतर्क रहना आवश्यक होता है।

अज्ञात शत्रु कभी भी सामने से प्रहार नहीं करते वह तो हमेश छूप छूप कर ही वार करते है। अतः इस प्रकार के शत्रुओं से सतर्क रहना चाहिए अथवा इनसे पूर्वानुमान के अनुशार ऐसे शत्रुओं से निपटने के वारे मे सोचन चाहिए। ऐसे अज्ञात शत्रु भेष बतल कर भी लक्षित व्यक्ति के आस पास ही रहते है। जैसे की एक रसोइया के रूप में जो खाने मे विष दे सकता है या वैद्य के रूप में जो रोग के विपरीत किसी प्रकार का औषधि खिला दे जिस से रोग विगड़ जाये और प्राण जाने की संभावना बढ़ जाए। अज्ञात शत्रु किसी प्रिय मित्र या प्रेमिका के रूप में भी हो सकती है। यहां अज्ञात शत्रु का अर्थ सिर्फ उस शत्रु से नहीं है जो अज्ञात अवस्था में आपकी प्राण ले जाये। अज्ञात शत्रु का अर्थ उस शत्रु से भी है जो आपकी सभी गुप्त बातें आपके किसी परम शत्रु या समाज में प्रकशित कर दे। जिस से मान और समान की हानि होने की भी सम्भावना बनी रहती है। ऐसे शत्रु मुख्यतः मनुष्य का कोई मित्र या प्रेमिका होती है। जो गुप्त बातो को आपके परम शत्रु य सामज में प्रकशित करें।
कभी कभी तो मनुष्य का परामर्श दाता या उपदेशक के रूप में भी अज्ञात शत्रु रेह सकते हैं। जो आपको गलत परामर्श या उपदेश भी दे सकते है। अतः मनुष्य को अपने विवेक ओर बुद्धि का प्रयोग करना चाहिए।

शनिवार, 16 जून 2018

क्यों खुद की गलतियों से ज्यादा दुसरतों की गलती से सिख लेनी चाहिए।

अक्शर हम अपने जीवन में कुछ ना कुछ गलत करते हैं और कसम खाते हैं की ऐसी गलती दुबारा नहीं करेंगे। बेशक एक बार गलती का एहसास होने पर हम उन गलतियों को दुबारा सायद नहीं करते। पर इसे ज्यादा महत्वपूर्ण की ये बात है की हम दुसरों की गलतियों से ज्यादा सीखें। अपनी गलती से सिखना अच्छी बात होती है । पर दूसरों की गलती से सीखना बहुत अच्छी बात होती है। 

          ऐसी बहुतसि गलतियां है जिन्हें एक बार करने के बाद सायद हमे उस गलती को सुधारनेका या तो  फिर उस गलती से सीखने का समय ही नहीं मिल पाता हैं। अतः जो दूसरे लोग है जो बहुत सि गलतियां की और उन्हें अपना जान माला का लूकसांन उठाना पढ़ा हैं। वो लोग अपनी गलतियों को सुधार नहीं पाये हों। उन लोगो से सीखनी चाहिए। वो मनुष्य अवश्य ही बुद्धिमान होगा जो दुसरो की गलतियों से सिख लेता है। कहा जाता है की मुंह का जला झाश भी फूंक फूंक कर पिता है। सायद वो ठीक भी है। पर अगर दुशरे लोग उस जले को देख कर कुछ नहीं सीखते हैं तो वाकेहि वो निर्बुद्धि हैं।
कुछ गलतियां ऐसी होती हैं जिन्हें करने पर मनुष्य जीवित ही नहीं रेह पाता। अतः दूसरों की की गयी गलती से सीखनी चाहिए । इस से स्वयं की जीवन की भी रक्षा होती हैं। एहि सत्य है और नीति हैं।

    पर आज के आधुनिक युग में इस नीतियों का अनुशरण कम ही लोग कर सकते हैं। क्योंकि आज की युवा पीढ़ी पूरी तरह से नसे मे धूत है। उसे ये ज्ञात होने पर की तम्बाकू और सिगरेट के सेवन से कर्कट रोग यानी कैंसर होता है। फिर भी अपनी अदातों को सुधारने की जगह उसे अधिक मात्र मे सेवन करता है। उन्हें इस जिज़ का भी ज्ञान होता है की बहुत से लोग कर्कट रोग से मृत्यु को प्राप्त हो गए पर फिर भी तम्बाकू का सेवन नहीं छोड़ेंगे। ऐसे ही लोगो को निर्बुद्धि कहते है।

गुरुवार, 14 जून 2018

किस प्रकार के कर्मो को स्वयं स्वहस्त से ही करनी चाहिए ?

मनुष्य अपने जीवन में बहुत सा कर्म करता है। कुछ अच्छे होते है और बुरे होते हैं। उन अच्छे और बुरे कर्मो के कारण मनुष्य को उन कर्मो का फल भी अच्छे और बुरे के रूप मे मिलता है। हम बहुत से कर्म स्वयं के लाभ हेतु अन्य किसी से कर्म करवाते है।
पर ऐसे बहुत से कर्म मनुष्य के जीवन मे आते हैं। जिन्हें मनुष्य को स्वयं स्वहस्त से करना चाहिए। जैसे दान, पूजा, सेवा, गुरु की सेवा, यज्ञ आहुति, देव दर्शन, गुरु दर्शन, पूर्वजों को पिंड दान, पितृ ओर मात के मृत देह को मुखाग्नि, तीर्थाटन, अपने बच्चों का पालन, प्रशाशन आदि।
विशेष कर धर्म और आध्यात्मिक कर्मो को स्वयं स्वहस्त से ही करना चाहिए। यदि इस प्रकार के कर्मो को किसी और के हाथो करवाया जाता है तो वो भी उस कर्म का पुण्य का भागी बनजाता है। अतः किये कर्मो का पुण्य घट जाता है। अतः इस प्रकार के कर्म स्वयं स्वहस्त से करना चाहिए अथवा अपनी अर्धांगी य अपने स्व पुत्र से करवाना चाहिए। अगर अपनी अर्धांगिनी या स्वपुत्र से धार्मिक कर्म करवाया जाता है तो अपनी पत्नी या पुत्र को प्राप्त पुण्य देर सवेर स्वयं प्राप्त हो जाती है।
गुरु की सेवा स्वयं स्वहस्त से करने से विशेष कृपा उस सेवक पर होती है। देव दर्शन स्वयं करने से उसका पुण्य भी स्वयं को प्राप्त होता है। यज्ञ आहुति स्वहस्त देने से उस आहुति के देवता को वो आहुति प्राप्त होती और देवता की आयु बढ़ जाती है और उस देवता की आशीर्वाद उस मनुष्य को प्राप्त होता है। अगर इस प्रकार किसी और से करवाया जाये तो वो भी इसका भागी बन जाता है।
अपने संतानों का पालन पोषण स्वयं से अच्छा और कोई नहीं कर सकता। यदि कोई मनुष्य अपने बच्चों का पालन और पोषण किसी और से करवाता है तो ये संभावनाएं अवश्य ही बनी रहती है की उन बच्चों को सही शिक्षा ना मिल सके और सही पोषण भी ना मिल पाये या तो फिर उसे असामाजिक कार्य भी सिखाया जाये।
अपने संतानों और नाति पोतों को भी स्वयं ही लाड़ प्यार करना चाहिए ताकि उनका लगाव उनके माता, पिता, दादा और दादी से बना रहे। अन्यथा अगर कोई ओर उनको लाड प्यार करता है तो उनका लगाब उसे बढ़ जाता है और अपने माता पिता से मोह कम हो जाता है। तब पुत्र और पोत्र अपने माता पिता पितामह और पितामही का श्राद य पिंड नहीं करता और बंचित रखता है।

मंगलवार, 5 जून 2018

अगर किसी भी रोग का निदान औषधी से नहीं होता है तो क्या करें।

सनातन हिन्दू शास्त्रों में इस मृत लोक को दुःखों का घर काहा गया है। क्योंकि सभी प्रकार के कष्टो को एहीं भोगने पड़ते है। चाहे वो मानसिक हो या शारीरिक दुःख हो। इस मृत लोग में ऐसा कोई मनुष्य नहीं है जिसे दुःख नहीं हुआ है या आगे उसे दुःख नहीं होगा। वो मानव हो या महामानव या कोई अवतारी पुरुष। कोई भी दुःखों से इस मृत लोक मे वंचित नहीं रेह पाया है।
शारीरिक पीड़ा भी एक प्रकार का दुःख ही है। इसे आम तोर पर लोग बीमारी या रोग कहते हैं। जब तक मनुष्य इस भौतिक शरीर के साथ इस मृत लोक मे रहेगा । तब तक उसे सभी प्रकार के यातनाओं को भी भोगना पड़ेगा।
ऐसे बहुत से लोग मेने देखा है जो बीमार होने पर डॉक्टर के पास जाते हैं और डॉक्टर उन्हें मेडिसिन्स भी बताता है। वो जब तक मेडिसिन्स खाते रहते हैं तब तक उनका शरीर ठीक रहता है और जब मेडिसिन बंद होता जाता है। फिर से उनका शरीर पूर्व के भांति बीमार या उसे अधिक बीमार हो जाता है। उन्हें कोई उपाय सूझता ही नहीं है । बार बार उन्हें डॉक्टर के पास भागना पड़ता है और डॉक्टर मेडिसिन बदल बदल कर देता है या तो फिर वो मरीज़ डॉक्टर ही बदलता है। अंत मे अगर बीमारी ठीक नही होता तो वो बहुत तनाब में चला जाता है। फिर या तो डॉक्टर को कोसता है या फिर भगवान को।
में उन लोगों को ससे रोग निदान का उपाय आपको स्वतः ही समझ आ जायेगा। जो लोग किसी बीमारी से परेशान हैं। उन्हें ये याद करना होगा की यह बीमारी उनको कब से हुई है और उस समय से अब तक आपकी दिन चर्या में और अपनी जीवन में क्या परिवर्तन हुए हैं पहले के दिनचर्या और जीवन में। क्यों की मनुष्य ऐसे दिनचर्या को अपनी जीवन में ग्रहण कर लेता है जिन से बहुत प्रकार की बीमारियां होने की सम्भावनाएं बढ़ जाती है। 

मनुष्य को स्थान और कार्य विशेष को भी ध्यान मे रखना चाहिए। क्योंकि इनसे भी बीमारियां होने की संभावनाएं होती हैं। 

उदारहरण स्वरूप कुछ लोगो को सर्दी खासी कभी पीछा नहीं छोड़ती । इसका कारण उनकी जीवन शैली ही होती है। ऐसे बहुत से लोगों को रात में दही, छास य
ठंडी चीज़े खाने की आदत होती हैं। जिनसे इन्हें ये बीमारी होती है। आयुर्वेद में कहा गया है की रात्रि में दही खान विष के समान है।
रोग निदान का ये उपाय मेरे स्वानुभूत है।

जय महाकाल

बुधवार, 2 मई 2018

किस प्रकार सांसारिक मनुष्यों को भौतिक संसार में जीवन यापन करना चाहिए।

बहुत से आध्यात्मिक गुरु हमेशा ही ये ज्ञान बांटते फिरते हैं की ये संसार दुःखों का घर है। अतः इन सबका त्याग करनी चाहिए। इस भौतिक संसार को छोड़ने की बात करते हैं और कहते हैं। भोगों से दूर रहो। उन मूर्ख आध्यात्मिक गुरुओं को ये ज्ञात भी नहीं की यह मत्य लोक अर्थात भौतिक लोक भोगो के लिए ही बनाई गयी है और मनुष्य ने अनेको प्रकार के भोग के लिए ही जन्म लिया है । ताकि वो अपने भोग कामनाओं को पूरा कर सके। क्योंकि जब तक भोग की इच्छा समाप्त नहीं होती तब तक किसी भी प्राणि को मोक्ष प्राप्त नहीं होता। अतः अवश्य ही सभी प्रकार के भोग को भोगना चाहिए। यंहा सभी प्रकार के भोगो का तातपर्य धर्म युक्त प्राप्त सभी भोगो को।

मनुष्य को अगर संसार में रहना है और जीवन यापन करना है । तो अवश्य ही उसे भोग भोगने पड़ेंगे। अगर वो संसार के खाद्य पदार्थो को त्याग करता है और भोजन को नहीं खाता है तो वो अधिक समय तक जीवित भी नहीं रह सकता।
पर संसार में मनुष्य को अगर रहना है तो कमल के फूल के भांति रहना चाहिए। जिस प्रकार कमल पानी में रहकर भी पानी से गीला नही होता उसी प्रकार मनुष्य को संसार के सभी भोगों को भोग कर उन भोगों के मोह से छूट जाना चाहिए। संसार के भोग भोगने की कामना कदापि नहीं रखनी चाहिए। मनुष्य को संसार के सारे क्रिया कलापो को करने के बाद भी उसमे अपना मन का मोह विल्कुल नहीं रखनी चाहिए अर्थात मन के लगाव को प्रभु के प्रति ही लगाना चाहिए।
जब कमल का फूल पानी के कीचड़ में खिलता है और संसार को अपने सुंदरता का परिचय देता है। जिस पानी मे कमल खिलता है वो पानी उसके भोग के समान है। उस पानी के कीचड़ और दल दल उस कमल के फूल के लिए सांसारिक दुःख के समान है। अतः भोग और दुःखो से उप्पर उठना चाहिए।

रविवार, 14 जनवरी 2018

जंहा वैद्य, वणिक और ब्राह्मण नहीं रहते उस स्थान, राज्य और देश में क्यों कदापि नहीं रहना चाहिए ?

नीति शास्त्र के अंतर्गत ये बताई गयी है की मनुष्य को किस प्रकार के देश प्रदेश गांव या विस्तार में रहना चाहिए। स्थान और जगह का प्रभाव मनुष्य के जीवन पर बहुत पड़ता है। अतः नीति शास्त्र में कहा गया है की जंहा वैद्य वणिक और ब्राह्मण ना हो उस देश प्रदेह य गांव में कदापि नही रहना चाहिए। इसके पीछे एक बहुत है बड़ा रहष्य छूपा हुआ है।
जंहा वैद्य ना हो उस जगह पर अवश्य ही बीमार लोग रहते होंगे और उनके संपर्क में आते ही स्वस्थ व्यक्ति भी बीमार हो जायेगा।

वैद्य ना होने से अवश्य ही साधारण मनुष्य का स्वास्थ्य खतरे में पड़ सकता है और जिसे उसकी मृत्यु भी हो सकती है। अतः जंहा रहते हो वंह वैद्य य चिकित्सा के साधन होना अति आवश्यक है।

दूसरी चीज़ जंहा रहते हो य रहना है वंहा वणिक का होना आवश्यक है। क्योंकि अगर वणिक है तो अवश्य ही वंहा धन या पैसो का आदान प्रदान होगा और अगर धन या पैसो का आदान प्रदान होता है तो वंहा काम मिलनेगी संभावना अधिक होगी और आजीविका चलानेके स्रोत भी होंगे।तो मनुष्य को अजिबिक के साधन सरलता से प्राप्त हो जायेगा।

तीसरी  चीज़ वंहा ब्राह्मणों का होना भी अति आवश्यक है। आज कल के भुद्धि जीवो के मन मे प्रश्न जरूर आएगा की ब्राह्मण का क्या महत्वपूर्णता है। प्राचीन काल मे जो ज्ञानवान होते थे और जिन्होंने वेद शास्त्र, पुराण, उपनिषद ओर नीतियों का ज्ञान होता था । उन्हें वो ब्राह्मण कहते थे। ब्राह्मण के रहने से लोगो को धर्म अधर्म का ज्ञान होता है और वह अच्छा दिशानिर्देश करते है। बहुत से मुश्किल परिस्थितियों मे वो लोगो को सलाह देते है। सायद इसी कारण बहुत से राजाओं के राज्य सभा में उच्चकोटि के ज्ञानी ब्राह्मण हुआ करते थे ताकि वो राजाओ को सलाह दे सके। जिस देश में ब्राह्मण नहीं होते थे। उन देशो के राजाओं ने बहुत से निर्दोषों को सूलि पर चढ़ा दिया गया था। अर्थात उस देश या स्थान मे नहीं रहना चाहिए जिस जगह प्रशासनिक अधिकारियों या मंत्रियों का कोई सलाहकार अगर नहीं होता है।

गुरुवार, 11 जनवरी 2018

किस प्रकार के मनुष्यों को ज्ञान देना चाहिए और किस प्रकार के मनुष्यों को ज्ञान नहीं देनी चाहिए।

नीति शास्त्रों मे अगर ये कहा गया है की किस प्रकार के लोगों से ज्ञान ग्रहण करनी चाहिए । तो नीति शाश्त्र के अंतर्गत ये भी कहा गया है की किस प्रकार के लोगों को ज्ञान देनी चाहिए और किस प्रकार के लोगों को ज्ञान नहीं देनी चाहिए। ज्ञान देना और नहीं देने का प्रयोजन समाज और मनुष्य की सुरक्षा से जुड़ा हुआ मानते है। ज्ञान उसे ही देनी चाहिए जो उस ज्ञान को पानेका सामर्थ्य और योग्यता रखते है। सदैब ये ध्यान रखनी चाहिए की जब हम किसी को विशेष ज्ञान देते है। उस मनुष्य की परीक्षा भी ले लेनी चाहिए की वो उस ज्ञान का अधिकारी है या नहीं। अन्यथा समाज में रहनेवाले लोगों का जीवन अशुरक्षित हो जायेगी। इसी कारण ऋषि मुनियों ने मंत्र और तंत्र आदि रहष्य मई विद्याओं को साधारण मनुष्यों से दूर रखा था।

जिस प्रकार आज किसी भी क्षेत्र में तकनीकी पढ़ाई के लिए विशेष परीक्षाएं देनी पड़ती है। उसी तरह प्राचीन काल में गुरु उनके शिष्यों से विशेष परीक्षा लेते थे। ये परीक्षायें उनके स्वभाव, सोच, उनकी व्यक्तित्व और मानसिकता पर आधारित होती थी। उन परीक्षाओं में उत्तीर्ण होने वाले को ही गुरु विशेष ज्ञान देते थे।

रविवार, 22 अक्टूबर 2017

क्यों क्षमा प्राप्त शत्रु से कतपि मित्रता नहीं करनी चाहिए और पूर्ण विश्वाश नहीं करनी चाहिए ?

नीति शास्त्रो के नियमा अनुशार अगर किसी से शत्रुता होती है तो उसके साथ पूर्ण रूप से शत्रुता निभानी चाहिए और अगर किसी कारण वश शत्रु को क्षमा दान देना पड़े तो क्षमा के पश्चात उसे कतपि पूर्ण रूप से मित्रता और विश्वाश नहीं करनी चाहिए।

जिस प्रकार आस्तीन या घर में रहे हुए सांप पर पूर्ण रूप से यह नहीं कहा जा सकता की सांप नहीं कांटने की संभावना कितनी है। उसी प्रकार शत्रु से मित्र बने हुए लोगो पर स्वयं के प्राण संकट में पड़ने का खतरा बना रहता है। अतः इस प्रकार के शत्रुओ से सचेत रहना आवश्यक होता है।

क्षमा दान के पश्चात हो सकता है की वो शत्रु से बने मित्र व्यक्ति के भाव बदल जाये और उसके मन में प्रतिशोध के भाव जागृत हो जाये। इस प्रकारके से शत्रु कभी भी सामने से प्रहार नहीं करते परन्तु अप्रत्यक्ष रूप मे प्रहार करते है। इससे हो सकता है की आपकी कीर्ति, सम्मान और प्राण खतरे मे पड़ जाये।
बिच्छू का स्वभाव हमेशा डंक मारना होता है। उसी प्रकार किसी प्रकार के शत्रु का स्वभाव अपने शत्रु का विनाश करना होता। चाहे वो प्रतेक्ष हो या अप्रतेक्ष रूप से।
धन्यबाद

सोमवार, 16 अक्टूबर 2017

सफलता की कुंजी क्या है और कैसे सफलता प्राप्त करें

सभी प्रकार की सफलता ध्यान या एकाग्रता से आती है। बिना एकाग्रता से मनुष्य किसी भी काम को करने में सफल नहीं होगा। अतः जीवन में सफलता का होना अति आवश्यक है। तो मन में एक प्रश्न और आती है की किस तरह की एकाग्रता होगी तो सफल का मिलना निश्चित हो जाता है।
मुझे एक कहानी याद आती है जो मैने किसी महान व्यक्ति से सूनी थी की एक साधु था वो बहुत दिनों से कठोर साधना कर रहा था । पर उसे उस साधना का सिद्धि प्राप्त नहीं हो रहा था या उसे कुछ अनुभूति भी नहीं हो रही थी। तब उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था। कुछ दिनों के पश्चात उसने एक स्त्री को देखा जो सुंदर थी पर वो स्वेच्छा चरी थी। वो स्त्री पर किसी प्रकार का नियम या अनुशाशन नहीं था। किसी भी पुरुष के साथ रहना और संग करना उसका स्वभाव था।  एक दिन वो स्त्री जंगल में विचरण कर रही थी और किसी नई पुरुष की तलाश थी ताकि वो अपने कामुक इच्छाओं को पूरा कर सके। जब कोई ना मिले तो तड़प उठती थी। कामुकता की पुष्टि में डूबी हुई थी।


साधु को तब आभाष होता है की एकाग्रता कामुकता के जैसे होनी चाहिए। जब हम अपने मन मे किसी कमुक भाव को लाते है तो हम कामुकता मे डूब जाते है और तब तक उस भाव मे डूबे रहते हैं । जबतक वो पूरी नहीं हो जाती। वो साधु अब समझ गया था की उसकी साधना मे किस चीज की कमी रेह गयी थी। जिस तरह हमार ध्यन स्वतः ही कामुक वस्तुओं पर टिक जाती है । उसी प्रकार हमारा ध्यान होना चाहिए। अतः एकाग्रता का अभ्यास करना चाहिए।
धन्यवाद