क्या प्याज और लहसुन मांसाहार है? हमारे सनातन धर्म में बहुत से कहानियां हैं जो प्याज और लहसुन से जोड़ दिया गया है। इसकी वास्तिविकता के बारे में जानेंगे। जितने भी वैष्णव संप्रदाय के लोग है वो प्याज, लहसुन और मसूर की दालों का सेवन नहीं करते क्योंकि की वो इसे मांशहार मानते है। मांसाहार भोजन को आमिश और शाकाहार भोजन को निरामिष भी कहा जाता है। इस दो प्रकार के भोजन के अलावा दो और प्रकार के भोजन भी है तामसिक और सात्विक भोजन। मांसाहार भोजन को हम तामसिक भोजन कह सकते हैं। पर प्याज लहसुन जिस भोजन में उपयोग हुआ हो उसे मांसहार भोजन नहीं कह सकते जब तक उसमे किसी जीव का मांस उपयोग नहीं हुआ हो। सभी मांसहार भोजन तामसिक है। पर सभी तामसिक भोजन मांसहार नहीं है। ऐसा क्यों, प्याज, लहसुन और मसूर की दाल खाने से मनुष्य में गर्मी पढ़ती है और तामसिक प्रवृति का उदय होता है। जो सात्विक व्रत या साधना करते हैं। ये उनके साधना मार्ग में रुकावट उत्पन करेगा और उलझा देगा। अतः इसी कारण वैष्णव और सात्विक मार्ग में ऐसे भोजनों का सेवन नहीं करते है। प्याज, लहसुन और मसूर ये पौधों से ही प्राप्त होते हैं। इसी कारण इसे बहुत से लोककथाओं को जोड़ दिया गया है। मेरी मम्मी से भी मेने एक ऐसे ही कहानी सुनी थी। जिसमें एक ऋषि था जो गलती से एक राक्षसी से शादी कर लिए । उस ऋषि का एक गाय था। तो वो ऋषि एक दिन स्नान करने गया था और वो राक्षसी को मांस खाने का मन हुआ तो उसने वो गाय को मारकर उस के मांस को पक्का लिया और खा गई। उस गाय का सिर्फ चमड़ा बचा था । उसका पति वो चमड़ा देखकर श्राप दे देगा जानकरके उसने वो चमड़ा को जमीन में गाढ़ देता है और पति को बोलती है की गाय कहीं खो गई है। कुछ दिन के पश्चात उस चमड़े से उसकी बाहर की परद से लहसुन का पौधा और अंदर के रक्तवाले परद से प्याज का पौधा जन्म लेता है। तो वो ऋषि को पता चलता है तो वो अपने पत्नी को श्राप देकर मार डालती है। ऐसी अनेकों कहानी है जो प्याज और लहसुन से जुड़ी हुई है। साधारण लोगों को समझाने के लिए ये कहानी बनाई।गई थी क्योंकि चमड़े से पौधों का जन्म संभव नहीं हो सकता। प्रॉब्लम प्याज लहसुन और मसूर के गुण स्वभाव से है। प्याज और लहसुन आयुर्वेद के अनुसार शरीर में ऊष्मा वीर्य बनाती है। जिससे कामुक भाव मतलब सेक्सुअल डिजायर्स को बहुत बढ़ता है। जो अध्यात्म मार्ग का शत्रु है। इसिकरण इसे वैष्णव और सात्विक साधक सेवन नहीं करते है। प्याज और लहसुन में बहुत से औषधि गुण भी रखते है। अतः इसे मांसहार कहना गलत है। हां पर ये तामसिक जरूर है।
बुधवार, 6 सितंबर 2023
रविवार, 20 अगस्त 2023
मृत्यु संस्कार या अंतिम संस्कार का ११ से १३ दिन ही क्यों पालन किया जाता है? इसका वैज्ञानिक रहस्य क्या है?
सोमवार, 13 मार्च 2023
क्या आध्यात्मिक दृष्टि से धन संपत्ति कमाना, संचय या भोग करना पाप है ?
गुरुवार, 9 मार्च 2023
उर्धगमन करना कठिन है और अधोगमन सरल है।
सोमवार, 5 दिसंबर 2022
क्यों इस अति आधुनिक काल में आत्महत्यायों के संख्या बहुत अधिक हो गयी है?
बुधवार, 16 नवंबर 2022
दुर्बल व्यक्ति कभी भी समाज में शांति और संतुलन की स्थापना नहीं कर सकता |
शनिवार, 21 मई 2022
बुद्धिमान मनुष्य को मूर्ख व्यक्ति से बाद विवाद कदापि नहीं करनी चाहिए।
सबके अहंकार का शत्रु समय है।
रविवार, 22 अगस्त 2021
अपने परम शत्रु की कभी निंदा नहीं करनी चाहिए बल्कि उसकी प्रशंसा करनी चाहिए।
रविवार, 25 अप्रैल 2021
"मन चंगा तो कठौती में गंगा" के अनर्थ सोच |
गुरुवार, 25 मार्च 2021
क्यों वृद्ध व्यक्तियों के साथ बैठने से मनुष्य की उम्र बढ़ जाती है ?
अगर अपने शत्रु या प्रतिद्वंदी को असफल करना चाहते हो तो क्या करना चाहिए ?
रविवार, 21 मार्च 2021
क्या शत्रु को क्षमा करना वीरता का काम है?
रविवार, 14 मार्च 2021
किस तरहा के लीगों के साथ संगत करनी चाहिए?
क्यों अपने गुरु से बाद विबाद शत्रुता या गुरु का अपमान नहीं करनी चाहिए?
मंगलवार, 18 सितंबर 2018
किस प्रकार के शत्रुओं से अधिक सतर्क रहना चाहिए ?
कभी कभी तो मनुष्य का परामर्श दाता या उपदेशक के रूप में भी अज्ञात शत्रु रेह सकते हैं। जो आपको गलत परामर्श या उपदेश भी दे सकते है। अतः मनुष्य को अपने विवेक ओर बुद्धि का प्रयोग करना चाहिए।
शनिवार, 16 जून 2018
क्यों खुद की गलतियों से ज्यादा दुसरतों की गलती से सिख लेनी चाहिए।
ऐसी बहुतसि गलतियां है जिन्हें एक बार करने के बाद सायद हमे उस गलती को सुधारनेका या तो फिर उस गलती से सीखने का समय ही नहीं मिल पाता हैं। अतः जो दूसरे लोग है जो बहुत सि गलतियां की और उन्हें अपना जान माला का लूकसांन उठाना पढ़ा हैं। वो लोग अपनी गलतियों को सुधार नहीं पाये हों। उन लोगो से सीखनी चाहिए। वो मनुष्य अवश्य ही बुद्धिमान होगा जो दुसरो की गलतियों से सिख लेता है। कहा जाता है की मुंह का जला झाश भी फूंक फूंक कर पिता है। सायद वो ठीक भी है। पर अगर दुशरे लोग उस जले को देख कर कुछ नहीं सीखते हैं तो वाकेहि वो निर्बुद्धि हैं।
कुछ गलतियां ऐसी होती हैं जिन्हें करने पर मनुष्य जीवित ही नहीं रेह पाता। अतः दूसरों की की गयी गलती से सीखनी चाहिए । इस से स्वयं की जीवन की भी रक्षा होती हैं। एहि सत्य है और नीति हैं।
पर आज के आधुनिक युग में इस नीतियों का अनुशरण कम ही लोग कर सकते हैं। क्योंकि आज की युवा पीढ़ी पूरी तरह से नसे मे धूत है। उसे ये ज्ञात होने पर की तम्बाकू और सिगरेट के सेवन से कर्कट रोग यानी कैंसर होता है। फिर भी अपनी अदातों को सुधारने की जगह उसे अधिक मात्र मे सेवन करता है। उन्हें इस जिज़ का भी ज्ञान होता है की बहुत से लोग कर्कट रोग से मृत्यु को प्राप्त हो गए पर फिर भी तम्बाकू का सेवन नहीं छोड़ेंगे। ऐसे ही लोगो को निर्बुद्धि कहते है।
गुरुवार, 14 जून 2018
किस प्रकार के कर्मो को स्वयं स्वहस्त से ही करनी चाहिए ?
मनुष्य अपने जीवन में बहुत सा कर्म करता है। कुछ अच्छे होते है और बुरे होते हैं। उन अच्छे और बुरे कर्मो के कारण मनुष्य को उन कर्मो का फल भी अच्छे और बुरे के रूप मे मिलता है। हम बहुत से कर्म स्वयं के लाभ हेतु अन्य किसी से कर्म करवाते है।
पर ऐसे बहुत से कर्म मनुष्य के जीवन मे आते हैं। जिन्हें मनुष्य को स्वयं स्वहस्त से करना चाहिए। जैसे दान, पूजा, सेवा, गुरु की सेवा, यज्ञ आहुति, देव दर्शन, गुरु दर्शन, पूर्वजों को पिंड दान, पितृ ओर मात के मृत देह को मुखाग्नि, तीर्थाटन, अपने बच्चों का पालन, प्रशाशन आदि।
विशेष कर धर्म और आध्यात्मिक कर्मो को स्वयं स्वहस्त से ही करना चाहिए। यदि इस प्रकार के कर्मो को किसी और के हाथो करवाया जाता है तो वो भी उस कर्म का पुण्य का भागी बनजाता है। अतः किये कर्मो का पुण्य घट जाता है। अतः इस प्रकार के कर्म स्वयं स्वहस्त से करना चाहिए अथवा अपनी अर्धांगी य अपने स्व पुत्र से करवाना चाहिए। अगर अपनी अर्धांगिनी या स्वपुत्र से धार्मिक कर्म करवाया जाता है तो अपनी पत्नी या पुत्र को प्राप्त पुण्य देर सवेर स्वयं प्राप्त हो जाती है।
गुरु की सेवा स्वयं स्वहस्त से करने से विशेष कृपा उस सेवक पर होती है। देव दर्शन स्वयं करने से उसका पुण्य भी स्वयं को प्राप्त होता है। यज्ञ आहुति स्वहस्त देने से उस आहुति के देवता को वो आहुति प्राप्त होती और देवता की आयु बढ़ जाती है और उस देवता की आशीर्वाद उस मनुष्य को प्राप्त होता है। अगर इस प्रकार किसी और से करवाया जाये तो वो भी इसका भागी बन जाता है।
अपने संतानों का पालन पोषण स्वयं से अच्छा और कोई नहीं कर सकता। यदि कोई मनुष्य अपने बच्चों का पालन और पोषण किसी और से करवाता है तो ये संभावनाएं अवश्य ही बनी रहती है की उन बच्चों को सही शिक्षा ना मिल सके और सही पोषण भी ना मिल पाये या तो फिर उसे असामाजिक कार्य भी सिखाया जाये।
अपने संतानों और नाति पोतों को भी स्वयं ही लाड़ प्यार करना चाहिए ताकि उनका लगाव उनके माता, पिता, दादा और दादी से बना रहे। अन्यथा अगर कोई ओर उनको लाड प्यार करता है तो उनका लगाब उसे बढ़ जाता है और अपने माता पिता से मोह कम हो जाता है। तब पुत्र और पोत्र अपने माता पिता पितामह और पितामही का श्राद य पिंड नहीं करता और बंचित रखता है।
मंगलवार, 5 जून 2018
अगर किसी भी रोग का निदान औषधी से नहीं होता है तो क्या करें।
शारीरिक पीड़ा भी एक प्रकार का दुःख ही है। इसे आम तोर पर लोग बीमारी या रोग कहते हैं। जब तक मनुष्य इस भौतिक शरीर के साथ इस मृत लोक मे रहेगा । तब तक उसे सभी प्रकार के यातनाओं को भी भोगना पड़ेगा।
ऐसे बहुत से लोग मेने देखा है जो बीमार होने पर डॉक्टर के पास जाते हैं और डॉक्टर उन्हें मेडिसिन्स भी बताता है। वो जब तक मेडिसिन्स खाते रहते हैं तब तक उनका शरीर ठीक रहता है और जब मेडिसिन बंद होता जाता है। फिर से उनका शरीर पूर्व के भांति बीमार या उसे अधिक बीमार हो जाता है। उन्हें कोई उपाय सूझता ही नहीं है । बार बार उन्हें डॉक्टर के पास भागना पड़ता है और डॉक्टर मेडिसिन बदल बदल कर देता है या तो फिर वो मरीज़ डॉक्टर ही बदलता है। अंत मे अगर बीमारी ठीक नही होता तो वो बहुत तनाब में चला जाता है। फिर या तो डॉक्टर को कोसता है या फिर भगवान को।
में उन लोगों को ससे रोग निदान का उपाय आपको स्वतः ही समझ आ जायेगा। जो लोग किसी बीमारी से परेशान हैं। उन्हें ये याद करना होगा की यह बीमारी उनको कब से हुई है और उस समय से अब तक आपकी दिन चर्या में और अपनी जीवन में क्या परिवर्तन हुए हैं पहले के दिनचर्या और जीवन में। क्यों की मनुष्य ऐसे दिनचर्या को अपनी जीवन में ग्रहण कर लेता है जिन से बहुत प्रकार की बीमारियां होने की सम्भावनाएं बढ़ जाती है।
मनुष्य को स्थान और कार्य विशेष को भी ध्यान मे रखना चाहिए। क्योंकि इनसे भी बीमारियां होने की संभावनाएं होती हैं।
उदारहरण स्वरूप कुछ लोगो को सर्दी खासी कभी पीछा नहीं छोड़ती । इसका कारण उनकी जीवन शैली ही होती है। ऐसे बहुत से लोगों को रात में दही, छास य
ठंडी चीज़े खाने की आदत होती हैं। जिनसे इन्हें ये बीमारी होती है। आयुर्वेद में कहा गया है की रात्रि में दही खान विष के समान है।
रोग निदान का ये उपाय मेरे स्वानुभूत है।
बुधवार, 2 मई 2018
किस प्रकार सांसारिक मनुष्यों को भौतिक संसार में जीवन यापन करना चाहिए।
पर संसार में मनुष्य को अगर रहना है तो कमल के फूल के भांति रहना चाहिए। जिस प्रकार कमल पानी में रहकर भी पानी से गीला नही होता उसी प्रकार मनुष्य को संसार के सभी भोगों को भोग कर उन भोगों के मोह से छूट जाना चाहिए। संसार के भोग भोगने की कामना कदापि नहीं रखनी चाहिए। मनुष्य को संसार के सारे क्रिया कलापो को करने के बाद भी उसमे अपना मन का मोह विल्कुल नहीं रखनी चाहिए अर्थात मन के लगाव को प्रभु के प्रति ही लगाना चाहिए।
जब कमल का फूल पानी के कीचड़ में खिलता है और संसार को अपने सुंदरता का परिचय देता है। जिस पानी मे कमल खिलता है वो पानी उसके भोग के समान है। उस पानी के कीचड़ और दल दल उस कमल के फूल के लिए सांसारिक दुःख के समान है। अतः भोग और दुःखो से उप्पर उठना चाहिए।






