गुरुवार, 25 मार्च 2021

क्यों वृद्ध व्यक्तियों के साथ बैठने से मनुष्य की उम्र बढ़ जाती है ?

साधारणतः ऐसा कहा जाता कि अगर कोई कम आयु का व्यक्ति किसी वृद्ध व्यक्ति के साथ बेठता है और बातचीत करता है तो उसकी उम्र बढ़ जाती है। इसका क्या तात्विक अर्थ है । क्या यह सच है की युवा व्यक्ति की आयु बढ़ जाती है। उम्र का बढ़ने का तात्विक अर्थ यह है कि उस युवा व्यक्ति का अनुभव उस वृद्ध व्यक्ति के बराबर हो जाता है। वो वृद्ध व्यक्ति की आयु अधिक होने पर उन्हें सभी प्रकार का ज्ञान और अनुभव जो जीवन मे मिला वो अधिक होगा। जभी उस ज्ञान और अनुभव को किसी बच्चे या युवा व्यक्ति से आदान प्रदान करते है तो उस बच्चे या युवा व्यक्ति का ज्ञान और अनुभव उस वृद्ध व्यक्ति के बराबर हो जाता है। इसे ही आयु बढ़ना कहते हैं। उस वृद्ध व्यक्ति ने जीवन में कितना कुछ देखा होगा, कितना कुछ सुन होगा और जाना होगा। जब भी वो किसी के साथ ज्ञान और अपना अनुभव बांटता है उस व्यक्ति का आयु भी उस बृद्ध व्यक्ति अनुभव जितना हो जाता है। 

जय महाकाल🙏

अगर अपने शत्रु या प्रतिद्वंदी को असफल करना चाहते हो तो क्या करना चाहिए ?

अगर अपने शत्रु को हर परिस्थिति में हराना चाहते हो। तो कभी भी शत्रु का विरोध नहीं करना चाहिए। सदैब उसकी झूठी प्रशंसा करते ही रहना चाहिए। उसकी झूठी प्रशंसा करने पर शत्रु के मन में अहंकार का जन्म होगा और वही अहंकार उसे नीचे गिराने में सहाय होता है। अहंकारी मनुष्य सभी प्रकार का पाप करने में अग्रशर होता रहता है। जभी उसका पाप बढ़ेगा उसे नीचे गिरने में भी अधिक समय नहीं लगेगा। शत्रु का विरोध करने पर शत्रु को एक लक्ष्य प्राप्त हो जाता है और वो उस लक्ष्य को प्राप्त करने में पूरी एकग्रता से जुड़ जाता है। अतः शत्रु को कभी भी लक्ष्य साधने में सफल नहीं होने देना चाहिए। जो मनुष्य को स्वयं की प्रशंशा सुनना अच्छा लगता है वो मनुष्य जीवन में कभी भी सफल नहीं हो पाता है। सफल व्यक्ति स्वयं को सदैव प्रशंसा से दूर रखता है और अपनी निंदाओ को अवश्य ही सुनता है। जो व्यक्ति सफलता के शिखर पर पहुंचे होते है। वो अपने प्रशंसकों के वजह से नहीं बल्कि अपने निंदकों के वजह से सफलता की शिखर को छूते हैं। स्वयं की प्रशंसा ही सभी पाप की बीज होती है। कभी भी किसी भी मनुष्य को प्रशंसा की इच्छा नहीं करनी चाहिए।

जय महाकाल🙏

रविवार, 21 मार्च 2021

क्या शत्रु को क्षमा करना वीरता का काम है?

अपने हर तरह के शत्रु को क्षमा करना कदापि वीरता का काम नहीं है। हां, अगर कोई शत्रु सच मे बहुत कमजोर है, बीमार है, और जो अपने बराबरी पर खड़ा नहीं हो सकता उसे माफ किया जा सकता है। पर ऐसा शत्रु जो धनवान है और शक्तिशाली भी है और वो आपसे हार गया है । ऐसे शत्रु को कभी माफ नहीं करना चाहिए और कभी भी उसका संगत नहीं करनी चाहिए। भले ही उसकी हत्या तो नहीं कर सकते पर मित्रता भी नहीं करनी चाहिए। जो इस तरह के शत्रु को माफ करता है । वो देर सबेर शत्रु के हाथों भबिष्य में परास्त होता है या अपने जीवन से ही हाथ धो बेठता है। अतः शत्रु को माफ कर देना कतापी बुद्धिमानी नहीं है और नहीं वीरता की निशानी है। सदैब ही अपनी शत्रु पर नज़र रखते रहना चाहिए और उसकी कमज़ोरी को ढूंढते रहना चाहिए। जरूरत पड़ने पर शत्रुकि कमज़ोरी पर वार करना चाहिए।

रविवार, 14 मार्च 2021

किस तरहा के लीगों के साथ संगत करनी चाहिए?

मनुष्य के जीवन में बहुत से लोग आते हैं और चले जाते हैं। पर कुछ लोगों का प्रभाव उस मनुष्य के जीवन भर रहता ही हैं। यह प्रभाब अच्छे भी हो सकते है और खराब भी हो सकते हैं। जैसे बुजुर्गो ने कहा है अच्छे लोगों के साथ रहोगे तो अच्छा बनोंगे और बुरे लोगों के साथ रहोगें तो बुरा बनोगे। बहुतसिं कहावतें भी हमारे समाज में प्रचालित है । जैसे कि " एक गंदी मछली पूरी तालाब को गंदी कर देती हैं" और "एक खराब आम टोकरी में रखे हुए सभी आमों को खराब कर देती है। अतः किसी भी मनुष्य को समाज स्व बहिस्कृत मनुष्य का संगत कतापी नहीं करनी चाहिए। जिस मनुष्य का समाज में कोई पहचान नहीं सम्मान नहीं उनका संगत कतापी नहीं करनी चाहिए। अगर कोई उसका संगत करता है तो उस मनुष्य की व्यक्तित्व भी वैसा ही माना जाता है। अगर मान लिया जाए कि एक शराबी हैं जो हमेशा नशे में धूत रहता है और उसका एक मित्र है जो उसके साथ हमेशा रहता है। अगर उसका मित्र ये कहता है कि वो शराब नही पिता तो कतापी कोई उसकी बातों पे विश्वाश नहीं करेगा। चोर का मित्र जो हमेशा चोर के साथ रहता है और कहे कि चोरी उसने नहीं कि । तो पुलिस कभी उसकी बात मान नहीं सकते।
यह एक मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि जो मनुष्य जिसके साथ अधिक समय रहता है । उसकी मानशिकता उसके जैसे ही हो जाती है। चाहे वो मनुष्य कितना ही दृढ़ निश्चयी क्यों ना हो। अपराधी प्रबृत्ति के लोगो के साथ रहने से अपराधी जैसे मानशिकता हो जाती है और अंततः आपराधिक प्रवृतियों में सलंग्न हो जाते है। अगर मनुष्य ज्ञानी और आध्यात्मिक विचार वालोँ के साथ अगर अधिक समय गुजारता है तो वो ज्ञानी और अध्यात्म वादी बनता हैं। 
जो मनुष्य सदा दुःखी रहने वाले के साथ समय।व्यतीत करता है । वो मनुष्य भी सदा दुःखी रहता है। एक व्यक्ति की मनोस्थिति दुशरे मनुष्य के मन पर भी पड़ता है। अतः सदा खुश मिज़ाज़ मनुष्य का संगत करें। मनुष्य अगर आपराधिक प्रबृत्ति, दुःखी, चुगल खोर, नीच मानशिकता और समाज से बहिस्कृत मनुष्य का संगत करता है तो उसे भी समाज का तिरस्कार शुननी पड़ेगी और उसकी मानशिकता भी वैसे ही हो जाएगी। अपने संगत को अवश्य ही सुधारना चाहिए और अच्छे लोगों का संगत करनी चाहिए। जैसे ही कोई अच्छे लोगों का संगत चालू कर देता है वैसे ही बुरे संगत का असर खत्म होना सुरु।हो जाता है।

जय महाकाल

क्यों अपने गुरु से बाद विबाद शत्रुता या गुरु का अपमान नहीं करनी चाहिए?

भारतीय वेद, पुराण और शास्त्रों में गुरु को परमेश्वर की संज्ञा दी गयी है। कुछ संत और ऋषियों ने तो गुरु को ईश्वर से भी ऊपर माना है। क्योंकि गुरु प्राप्ति की आवश्यकता ईश्वर प्राप्ति की आवश्यकता से पहले आता है। अतः गुरु को प्रथम स्थान पर रखा गया है और द्वितीय स्थान पर ईश्वर को रखा गया है। 
जब कोई शिष्य गुरु से ज्ञान प्राप्त करता है। तब उस शिष्य को ये नियम अवश्य ही प्राप्त करना चाहिए कि वो गुरु से किसी भी प्रकार का मिथ्य भाषण ना करें। गुरु जैसा कहें वैसा ही करें। 
जब गुरु किसी अपने शिष्य को ज्ञान देता है। गुरु भली भांति यह ज्ञान होता है कि शिष्य की क्या कमज़ोरी है और शिष्य को कैसा ठीक किया जाए। अतः शिष्य को कभी भी गुरु के साथ बगाबत नहीं करनी चाहिए। नहीं तो गुरु के क्रोध होने पर शिष्य के प्राण भी जा सकते है। गुरु उस माली के जैसा है । जिसे अच्छे से पता है किस फुल की बृक्ष को किस प्रकार का खाद देना है। बृक्ष को कितनी कटाई छटाई करनी है। गुरु को अपने शिष्य के बारे में यह भी पता है कि शिष्य को कोनसा ज्ञान या विद्या पचेकि और कोनसा ज्ञान नहीं पचेगी। 
अपने गुरु का कभी भी अपमान नहीं करना चाहिए भले ही गुरु शिष्य को कितना ही दूसरो के सामने अपमानित करें। अगर गुरु अपने शिष्य को अपमानित करता है तो अवश्य ही उसमे शिष्य का हित छिपा हुआ होगा। गुरु के सामने ऊँची आवाज़ में बात करना, गुरु के सामने पैर फैलाकर बैठना, गुरु के खाने से पहले भोजन खा लेना सरासर गलत है। इसे गुरु कुपित होते हैं और गुरु शिष्य को वो ज्ञान नहीं देता है जिस ज्ञान को शिष्य प्राप्त करना चाहता है। अतः नीति के हिसाब से अपने गुरु से किसी भी प्रकार का शत्रुता, बाद विबाद कताहि नहीं करनी चाहिए।
ओम गुरु देवाय नमः

मंगलवार, 18 सितंबर 2018

किस प्रकार के शत्रुओं से अधिक सतर्क रहना चाहिए ?

मनुष्य अपने जीवन काल में बहुत से मित्र और बहुत ज्ञात या अज्ञात शत्रुओं को बना लेता है। कभी कभी तो स्वयं के मित्र भी अज्ञात शत्रु के रूप में रहते हैं। ज्ञात शत्रुओं से अज्ञात शत्रु अधिक प्राणघातक होते हैं। ऐसे शत्रु धर्म ओर नीति कतपि नहीं मानते। ऐसे शत्रु हमेशा गुप्त रूप से आस पास ही रहते हैं और अपने लक्ष्य की प्रतीक्षा करते रहते हैं। जिस मनुष्य को जान से मारने का लक्ष्य रखते हैं। उसके विषय में वो सभी प्रकार के जानकारियां इकठा कर लेते है। जैसे की वह मनुष्य के कब खाता है, कब सोता है, कब भ्रमण करने निकलता है और कब युद्ध का अभ्यास करता है। इस स्थिति में मनुष्य को हमेशा सतर्क रहना आवश्यक होता है।

अज्ञात शत्रु कभी भी सामने से प्रहार नहीं करते वह तो हमेश छूप छूप कर ही वार करते है। अतः इस प्रकार के शत्रुओं से सतर्क रहना चाहिए अथवा इनसे पूर्वानुमान के अनुशार ऐसे शत्रुओं से निपटने के वारे मे सोचन चाहिए। ऐसे अज्ञात शत्रु भेष बतल कर भी लक्षित व्यक्ति के आस पास ही रहते है। जैसे की एक रसोइया के रूप में जो खाने मे विष दे सकता है या वैद्य के रूप में जो रोग के विपरीत किसी प्रकार का औषधि खिला दे जिस से रोग विगड़ जाये और प्राण जाने की संभावना बढ़ जाए। अज्ञात शत्रु किसी प्रिय मित्र या प्रेमिका के रूप में भी हो सकती है। यहां अज्ञात शत्रु का अर्थ सिर्फ उस शत्रु से नहीं है जो अज्ञात अवस्था में आपकी प्राण ले जाये। अज्ञात शत्रु का अर्थ उस शत्रु से भी है जो आपकी सभी गुप्त बातें आपके किसी परम शत्रु या समाज में प्रकशित कर दे। जिस से मान और समान की हानि होने की भी सम्भावना बनी रहती है। ऐसे शत्रु मुख्यतः मनुष्य का कोई मित्र या प्रेमिका होती है। जो गुप्त बातो को आपके परम शत्रु य सामज में प्रकशित करें।
कभी कभी तो मनुष्य का परामर्श दाता या उपदेशक के रूप में भी अज्ञात शत्रु रेह सकते हैं। जो आपको गलत परामर्श या उपदेश भी दे सकते है। अतः मनुष्य को अपने विवेक ओर बुद्धि का प्रयोग करना चाहिए।

शनिवार, 16 जून 2018

क्यों खुद की गलतियों से ज्यादा दुसरतों की गलती से सिख लेनी चाहिए।

अक्शर हम अपने जीवन में कुछ ना कुछ गलत करते हैं और कसम खाते हैं की ऐसी गलती दुबारा नहीं करेंगे। बेशक एक बार गलती का एहसास होने पर हम उन गलतियों को दुबारा सायद नहीं करते। पर इसे ज्यादा महत्वपूर्ण की ये बात है की हम दुसरों की गलतियों से ज्यादा सीखें। अपनी गलती से सिखना अच्छी बात होती है । पर दूसरों की गलती से सीखना बहुत अच्छी बात होती है। 

          ऐसी बहुतसि गलतियां है जिन्हें एक बार करने के बाद सायद हमे उस गलती को सुधारनेका या तो  फिर उस गलती से सीखने का समय ही नहीं मिल पाता हैं। अतः जो दूसरे लोग है जो बहुत सि गलतियां की और उन्हें अपना जान माला का लूकसांन उठाना पढ़ा हैं। वो लोग अपनी गलतियों को सुधार नहीं पाये हों। उन लोगो से सीखनी चाहिए। वो मनुष्य अवश्य ही बुद्धिमान होगा जो दुसरो की गलतियों से सिख लेता है। कहा जाता है की मुंह का जला झाश भी फूंक फूंक कर पिता है। सायद वो ठीक भी है। पर अगर दुशरे लोग उस जले को देख कर कुछ नहीं सीखते हैं तो वाकेहि वो निर्बुद्धि हैं।
कुछ गलतियां ऐसी होती हैं जिन्हें करने पर मनुष्य जीवित ही नहीं रेह पाता। अतः दूसरों की की गयी गलती से सीखनी चाहिए । इस से स्वयं की जीवन की भी रक्षा होती हैं। एहि सत्य है और नीति हैं।

    पर आज के आधुनिक युग में इस नीतियों का अनुशरण कम ही लोग कर सकते हैं। क्योंकि आज की युवा पीढ़ी पूरी तरह से नसे मे धूत है। उसे ये ज्ञात होने पर की तम्बाकू और सिगरेट के सेवन से कर्कट रोग यानी कैंसर होता है। फिर भी अपनी अदातों को सुधारने की जगह उसे अधिक मात्र मे सेवन करता है। उन्हें इस जिज़ का भी ज्ञान होता है की बहुत से लोग कर्कट रोग से मृत्यु को प्राप्त हो गए पर फिर भी तम्बाकू का सेवन नहीं छोड़ेंगे। ऐसे ही लोगो को निर्बुद्धि कहते है।

गुरुवार, 14 जून 2018

किस प्रकार के कर्मो को स्वयं स्वहस्त से ही करनी चाहिए ?

मनुष्य अपने जीवन में बहुत सा कर्म करता है। कुछ अच्छे होते है और बुरे होते हैं। उन अच्छे और बुरे कर्मो के कारण मनुष्य को उन कर्मो का फल भी अच्छे और बुरे के रूप मे मिलता है। हम बहुत से कर्म स्वयं के लाभ हेतु अन्य किसी से कर्म करवाते है।
पर ऐसे बहुत से कर्म मनुष्य के जीवन मे आते हैं। जिन्हें मनुष्य को स्वयं स्वहस्त से करना चाहिए। जैसे दान, पूजा, सेवा, गुरु की सेवा, यज्ञ आहुति, देव दर्शन, गुरु दर्शन, पूर्वजों को पिंड दान, पितृ ओर मात के मृत देह को मुखाग्नि, तीर्थाटन, अपने बच्चों का पालन, प्रशाशन आदि।
विशेष कर धर्म और आध्यात्मिक कर्मो को स्वयं स्वहस्त से ही करना चाहिए। यदि इस प्रकार के कर्मो को किसी और के हाथो करवाया जाता है तो वो भी उस कर्म का पुण्य का भागी बनजाता है। अतः किये कर्मो का पुण्य घट जाता है। अतः इस प्रकार के कर्म स्वयं स्वहस्त से करना चाहिए अथवा अपनी अर्धांगी य अपने स्व पुत्र से करवाना चाहिए। अगर अपनी अर्धांगिनी या स्वपुत्र से धार्मिक कर्म करवाया जाता है तो अपनी पत्नी या पुत्र को प्राप्त पुण्य देर सवेर स्वयं प्राप्त हो जाती है।
गुरु की सेवा स्वयं स्वहस्त से करने से विशेष कृपा उस सेवक पर होती है। देव दर्शन स्वयं करने से उसका पुण्य भी स्वयं को प्राप्त होता है। यज्ञ आहुति स्वहस्त देने से उस आहुति के देवता को वो आहुति प्राप्त होती और देवता की आयु बढ़ जाती है और उस देवता की आशीर्वाद उस मनुष्य को प्राप्त होता है। अगर इस प्रकार किसी और से करवाया जाये तो वो भी इसका भागी बन जाता है।
अपने संतानों का पालन पोषण स्वयं से अच्छा और कोई नहीं कर सकता। यदि कोई मनुष्य अपने बच्चों का पालन और पोषण किसी और से करवाता है तो ये संभावनाएं अवश्य ही बनी रहती है की उन बच्चों को सही शिक्षा ना मिल सके और सही पोषण भी ना मिल पाये या तो फिर उसे असामाजिक कार्य भी सिखाया जाये।
अपने संतानों और नाति पोतों को भी स्वयं ही लाड़ प्यार करना चाहिए ताकि उनका लगाव उनके माता, पिता, दादा और दादी से बना रहे। अन्यथा अगर कोई ओर उनको लाड प्यार करता है तो उनका लगाब उसे बढ़ जाता है और अपने माता पिता से मोह कम हो जाता है। तब पुत्र और पोत्र अपने माता पिता पितामह और पितामही का श्राद य पिंड नहीं करता और बंचित रखता है।

मंगलवार, 5 जून 2018

अगर किसी भी रोग का निदान औषधी से नहीं होता है तो क्या करें।

सनातन हिन्दू शास्त्रों में इस मृत लोक को दुःखों का घर काहा गया है। क्योंकि सभी प्रकार के कष्टो को एहीं भोगने पड़ते है। चाहे वो मानसिक हो या शारीरिक दुःख हो। इस मृत लोग में ऐसा कोई मनुष्य नहीं है जिसे दुःख नहीं हुआ है या आगे उसे दुःख नहीं होगा। वो मानव हो या महामानव या कोई अवतारी पुरुष। कोई भी दुःखों से इस मृत लोक मे वंचित नहीं रेह पाया है।
शारीरिक पीड़ा भी एक प्रकार का दुःख ही है। इसे आम तोर पर लोग बीमारी या रोग कहते हैं। जब तक मनुष्य इस भौतिक शरीर के साथ इस मृत लोक मे रहेगा । तब तक उसे सभी प्रकार के यातनाओं को भी भोगना पड़ेगा।
ऐसे बहुत से लोग मेने देखा है जो बीमार होने पर डॉक्टर के पास जाते हैं और डॉक्टर उन्हें मेडिसिन्स भी बताता है। वो जब तक मेडिसिन्स खाते रहते हैं तब तक उनका शरीर ठीक रहता है और जब मेडिसिन बंद होता जाता है। फिर से उनका शरीर पूर्व के भांति बीमार या उसे अधिक बीमार हो जाता है। उन्हें कोई उपाय सूझता ही नहीं है । बार बार उन्हें डॉक्टर के पास भागना पड़ता है और डॉक्टर मेडिसिन बदल बदल कर देता है या तो फिर वो मरीज़ डॉक्टर ही बदलता है। अंत मे अगर बीमारी ठीक नही होता तो वो बहुत तनाब में चला जाता है। फिर या तो डॉक्टर को कोसता है या फिर भगवान को।
में उन लोगों को ससे रोग निदान का उपाय आपको स्वतः ही समझ आ जायेगा। जो लोग किसी बीमारी से परेशान हैं। उन्हें ये याद करना होगा की यह बीमारी उनको कब से हुई है और उस समय से अब तक आपकी दिन चर्या में और अपनी जीवन में क्या परिवर्तन हुए हैं पहले के दिनचर्या और जीवन में। क्यों की मनुष्य ऐसे दिनचर्या को अपनी जीवन में ग्रहण कर लेता है जिन से बहुत प्रकार की बीमारियां होने की सम्भावनाएं बढ़ जाती है। 

मनुष्य को स्थान और कार्य विशेष को भी ध्यान मे रखना चाहिए। क्योंकि इनसे भी बीमारियां होने की संभावनाएं होती हैं। 

उदारहरण स्वरूप कुछ लोगो को सर्दी खासी कभी पीछा नहीं छोड़ती । इसका कारण उनकी जीवन शैली ही होती है। ऐसे बहुत से लोगों को रात में दही, छास य
ठंडी चीज़े खाने की आदत होती हैं। जिनसे इन्हें ये बीमारी होती है। आयुर्वेद में कहा गया है की रात्रि में दही खान विष के समान है।
रोग निदान का ये उपाय मेरे स्वानुभूत है।

जय महाकाल

बुधवार, 2 मई 2018

किस प्रकार सांसारिक मनुष्यों को भौतिक संसार में जीवन यापन करना चाहिए।

बहुत से आध्यात्मिक गुरु हमेशा ही ये ज्ञान बांटते फिरते हैं की ये संसार दुःखों का घर है। अतः इन सबका त्याग करनी चाहिए। इस भौतिक संसार को छोड़ने की बात करते हैं और कहते हैं। भोगों से दूर रहो। उन मूर्ख आध्यात्मिक गुरुओं को ये ज्ञात भी नहीं की यह मत्य लोक अर्थात भौतिक लोक भोगो के लिए ही बनाई गयी है और मनुष्य ने अनेको प्रकार के भोग के लिए ही जन्म लिया है । ताकि वो अपने भोग कामनाओं को पूरा कर सके। क्योंकि जब तक भोग की इच्छा समाप्त नहीं होती तब तक किसी भी प्राणि को मोक्ष प्राप्त नहीं होता। अतः अवश्य ही सभी प्रकार के भोग को भोगना चाहिए। यंहा सभी प्रकार के भोगो का तातपर्य धर्म युक्त प्राप्त सभी भोगो को।

मनुष्य को अगर संसार में रहना है और जीवन यापन करना है । तो अवश्य ही उसे भोग भोगने पड़ेंगे। अगर वो संसार के खाद्य पदार्थो को त्याग करता है और भोजन को नहीं खाता है तो वो अधिक समय तक जीवित भी नहीं रह सकता।
पर संसार में मनुष्य को अगर रहना है तो कमल के फूल के भांति रहना चाहिए। जिस प्रकार कमल पानी में रहकर भी पानी से गीला नही होता उसी प्रकार मनुष्य को संसार के सभी भोगों को भोग कर उन भोगों के मोह से छूट जाना चाहिए। संसार के भोग भोगने की कामना कदापि नहीं रखनी चाहिए। मनुष्य को संसार के सारे क्रिया कलापो को करने के बाद भी उसमे अपना मन का मोह विल्कुल नहीं रखनी चाहिए अर्थात मन के लगाव को प्रभु के प्रति ही लगाना चाहिए।
जब कमल का फूल पानी के कीचड़ में खिलता है और संसार को अपने सुंदरता का परिचय देता है। जिस पानी मे कमल खिलता है वो पानी उसके भोग के समान है। उस पानी के कीचड़ और दल दल उस कमल के फूल के लिए सांसारिक दुःख के समान है। अतः भोग और दुःखो से उप्पर उठना चाहिए।

रविवार, 14 जनवरी 2018

जंहा वैद्य, वणिक और ब्राह्मण नहीं रहते उस स्थान, राज्य और देश में क्यों कदापि नहीं रहना चाहिए ?

नीति शास्त्र के अंतर्गत ये बताई गयी है की मनुष्य को किस प्रकार के देश प्रदेश गांव या विस्तार में रहना चाहिए। स्थान और जगह का प्रभाव मनुष्य के जीवन पर बहुत पड़ता है। अतः नीति शास्त्र में कहा गया है की जंहा वैद्य वणिक और ब्राह्मण ना हो उस देश प्रदेह य गांव में कदापि नही रहना चाहिए। इसके पीछे एक बहुत है बड़ा रहष्य छूपा हुआ है।
जंहा वैद्य ना हो उस जगह पर अवश्य ही बीमार लोग रहते होंगे और उनके संपर्क में आते ही स्वस्थ व्यक्ति भी बीमार हो जायेगा।

वैद्य ना होने से अवश्य ही साधारण मनुष्य का स्वास्थ्य खतरे में पड़ सकता है और जिसे उसकी मृत्यु भी हो सकती है। अतः जंहा रहते हो वंह वैद्य य चिकित्सा के साधन होना अति आवश्यक है।

दूसरी चीज़ जंहा रहते हो य रहना है वंहा वणिक का होना आवश्यक है। क्योंकि अगर वणिक है तो अवश्य ही वंहा धन या पैसो का आदान प्रदान होगा और अगर धन या पैसो का आदान प्रदान होता है तो वंहा काम मिलनेगी संभावना अधिक होगी और आजीविका चलानेके स्रोत भी होंगे।तो मनुष्य को अजिबिक के साधन सरलता से प्राप्त हो जायेगा।

तीसरी  चीज़ वंहा ब्राह्मणों का होना भी अति आवश्यक है। आज कल के भुद्धि जीवो के मन मे प्रश्न जरूर आएगा की ब्राह्मण का क्या महत्वपूर्णता है। प्राचीन काल मे जो ज्ञानवान होते थे और जिन्होंने वेद शास्त्र, पुराण, उपनिषद ओर नीतियों का ज्ञान होता था । उन्हें वो ब्राह्मण कहते थे। ब्राह्मण के रहने से लोगो को धर्म अधर्म का ज्ञान होता है और वह अच्छा दिशानिर्देश करते है। बहुत से मुश्किल परिस्थितियों मे वो लोगो को सलाह देते है। सायद इसी कारण बहुत से राजाओं के राज्य सभा में उच्चकोटि के ज्ञानी ब्राह्मण हुआ करते थे ताकि वो राजाओ को सलाह दे सके। जिस देश में ब्राह्मण नहीं होते थे। उन देशो के राजाओं ने बहुत से निर्दोषों को सूलि पर चढ़ा दिया गया था। अर्थात उस देश या स्थान मे नहीं रहना चाहिए जिस जगह प्रशासनिक अधिकारियों या मंत्रियों का कोई सलाहकार अगर नहीं होता है।

गुरुवार, 11 जनवरी 2018

किस प्रकार के मनुष्यों को ज्ञान देना चाहिए और किस प्रकार के मनुष्यों को ज्ञान नहीं देनी चाहिए।

नीति शास्त्रों मे अगर ये कहा गया है की किस प्रकार के लोगों से ज्ञान ग्रहण करनी चाहिए । तो नीति शाश्त्र के अंतर्गत ये भी कहा गया है की किस प्रकार के लोगों को ज्ञान देनी चाहिए और किस प्रकार के लोगों को ज्ञान नहीं देनी चाहिए। ज्ञान देना और नहीं देने का प्रयोजन समाज और मनुष्य की सुरक्षा से जुड़ा हुआ मानते है। ज्ञान उसे ही देनी चाहिए जो उस ज्ञान को पानेका सामर्थ्य और योग्यता रखते है। सदैब ये ध्यान रखनी चाहिए की जब हम किसी को विशेष ज्ञान देते है। उस मनुष्य की परीक्षा भी ले लेनी चाहिए की वो उस ज्ञान का अधिकारी है या नहीं। अन्यथा समाज में रहनेवाले लोगों का जीवन अशुरक्षित हो जायेगी। इसी कारण ऋषि मुनियों ने मंत्र और तंत्र आदि रहष्य मई विद्याओं को साधारण मनुष्यों से दूर रखा था।

जिस प्रकार आज किसी भी क्षेत्र में तकनीकी पढ़ाई के लिए विशेष परीक्षाएं देनी पड़ती है। उसी तरह प्राचीन काल में गुरु उनके शिष्यों से विशेष परीक्षा लेते थे। ये परीक्षायें उनके स्वभाव, सोच, उनकी व्यक्तित्व और मानसिकता पर आधारित होती थी। उन परीक्षाओं में उत्तीर्ण होने वाले को ही गुरु विशेष ज्ञान देते थे।

रविवार, 22 अक्टूबर 2017

क्यों क्षमा प्राप्त शत्रु से कतपि मित्रता नहीं करनी चाहिए और पूर्ण विश्वाश नहीं करनी चाहिए ?

नीति शास्त्रो के नियमा अनुशार अगर किसी से शत्रुता होती है तो उसके साथ पूर्ण रूप से शत्रुता निभानी चाहिए और अगर किसी कारण वश शत्रु को क्षमा दान देना पड़े तो क्षमा के पश्चात उसे कतपि पूर्ण रूप से मित्रता और विश्वाश नहीं करनी चाहिए।

जिस प्रकार आस्तीन या घर में रहे हुए सांप पर पूर्ण रूप से यह नहीं कहा जा सकता की सांप नहीं कांटने की संभावना कितनी है। उसी प्रकार शत्रु से मित्र बने हुए लोगो पर स्वयं के प्राण संकट में पड़ने का खतरा बना रहता है। अतः इस प्रकार के शत्रुओ से सचेत रहना आवश्यक होता है।

क्षमा दान के पश्चात हो सकता है की वो शत्रु से बने मित्र व्यक्ति के भाव बदल जाये और उसके मन में प्रतिशोध के भाव जागृत हो जाये। इस प्रकारके से शत्रु कभी भी सामने से प्रहार नहीं करते परन्तु अप्रत्यक्ष रूप मे प्रहार करते है। इससे हो सकता है की आपकी कीर्ति, सम्मान और प्राण खतरे मे पड़ जाये।
बिच्छू का स्वभाव हमेशा डंक मारना होता है। उसी प्रकार किसी प्रकार के शत्रु का स्वभाव अपने शत्रु का विनाश करना होता। चाहे वो प्रतेक्ष हो या अप्रतेक्ष रूप से।
धन्यबाद

सोमवार, 16 अक्टूबर 2017

सफलता की कुंजी क्या है और कैसे सफलता प्राप्त करें

सभी प्रकार की सफलता ध्यान या एकाग्रता से आती है। बिना एकाग्रता से मनुष्य किसी भी काम को करने में सफल नहीं होगा। अतः जीवन में सफलता का होना अति आवश्यक है। तो मन में एक प्रश्न और आती है की किस तरह की एकाग्रता होगी तो सफल का मिलना निश्चित हो जाता है।
मुझे एक कहानी याद आती है जो मैने किसी महान व्यक्ति से सूनी थी की एक साधु था वो बहुत दिनों से कठोर साधना कर रहा था । पर उसे उस साधना का सिद्धि प्राप्त नहीं हो रहा था या उसे कुछ अनुभूति भी नहीं हो रही थी। तब उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था। कुछ दिनों के पश्चात उसने एक स्त्री को देखा जो सुंदर थी पर वो स्वेच्छा चरी थी। वो स्त्री पर किसी प्रकार का नियम या अनुशाशन नहीं था। किसी भी पुरुष के साथ रहना और संग करना उसका स्वभाव था।  एक दिन वो स्त्री जंगल में विचरण कर रही थी और किसी नई पुरुष की तलाश थी ताकि वो अपने कामुक इच्छाओं को पूरा कर सके। जब कोई ना मिले तो तड़प उठती थी। कामुकता की पुष्टि में डूबी हुई थी।


साधु को तब आभाष होता है की एकाग्रता कामुकता के जैसे होनी चाहिए। जब हम अपने मन मे किसी कमुक भाव को लाते है तो हम कामुकता मे डूब जाते है और तब तक उस भाव मे डूबे रहते हैं । जबतक वो पूरी नहीं हो जाती। वो साधु अब समझ गया था की उसकी साधना मे किस चीज की कमी रेह गयी थी। जिस तरह हमार ध्यन स्वतः ही कामुक वस्तुओं पर टिक जाती है । उसी प्रकार हमारा ध्यान होना चाहिए। अतः एकाग्रता का अभ्यास करना चाहिए।
धन्यवाद

रविवार, 15 अक्टूबर 2017

किस प्रकार के लोगों से शत्रुता कभी भी नहीं करनी चाहिए।

नीति शाश्त्र के अन्तगर्त ये भी आती है की मनुष्य को सोच समझ कर किसी से शत्रुता करनी चाहिए। अब कोई ये प्रश्न कर सकता है की ये अपने हाथ मे थोड़े ही है की हम किस से मित्रत करे या शत्रुता । पर ये ध्यान देना आवश्यक है की हम किसे शत्रुता कर रहे हैं। नीति शास्त्र मे कहा गया है की किसी भी परीस्थिति में भी चिकित्सक, नाइ, बाबरचि, राज कर्मचारी (सरकारी कर्मचारी), गहन मित्र और अपने जीवन साथी से कतापि शत्रुता नही रखनी चाहिए। क्योंकि ये सभी को आपके कमजोरी और व्यक्ति गत विषय का ज्ञान होता है। इनसे शत्रुता करने पर ये हो सकता है की वे सब आपके व्यक्ति गत रहस्य समाज और शत्रु के सामने प्रकाशित कर दे। इस तरह आपके इज़्ज़त और प्राण दोनो ही खतरे में पड़ सकते हैं। मनुष्य को जंहा तक हो सके इन सब से शत्रुता करने से बचना चाहिये।


अगर चिकित्सक से शत्रुता किया जाये तो चिकित्सक आपके रोग का पूरा ज्ञान रखता है और ये संभावना बनी रहती है की वो आपके रोग को बिगाड़ कर आपकी जान ले सकता है। राज़ कर्मचारी (सरकारी कर्मचारी) अपने पद, शक्ति और सामर्थ्य का उपयोग कर आपको दंड दिला सकता है। नाइ के साथ भी शत्रुता नहीं करनी चाहिए क्योंकि नाइ के सामने जब आप बाल य दाढ़ी काटते हैं। उसके पास पूरा अवशर होता है की आप के अनजान अवश्था में आप पर किसी प्रकार का प्राण घातक आक्रमण कर दे। अपने बाबरचि से शत्रुता करने पर वो आपके खाने में विष मिला कर मार सकता है। नीति शास्त्र का ये कहना है की हमे उन सबसे कभी भी शत्रुता नहीं करनी चाहिए जिन्हें हमारी व्यक्तिगत रहस्यों की जानकरी होती है। क्योंकि इनसे हमारी मान, शम्मान और प्राणो का खतरा बना रहता है। 

धन्यवाद

शनिवार, 14 अक्टूबर 2017

मनुष्य को किस से ज्ञान लेना चाहिए और किस से ज्ञान नहीं लेना चाहिए?

नीति शास्त्र के अनुशार ज्ञान ग्रहण किसी से भी किया जा सकता है। चाहे वो छोटी जात्त को हो या भी गरीब हो। अधिक वयस्क वाला हो य अल्प वयस्क का हो। मानो तो ज्ञान ऐसी एक मूल्यवान वस्तु है जो कजरे के ढेर से भी चूना चा सकता है। नीति शाश्त्र केहत है ज्ञान देने वाला अगर चांडाल भी हो तो भी उसे वो ज्ञान ले लेनी चाहिए। ज्ञान मे कोई ऐसा भेद नहीं है की ऐसा कहा ज सके की ये अशुद्ध है और ये ज्ञान सूद्ध है। ज्ञान कभी असूद्ध हो ही नही सकता और ज्ञान छुत अछूत से परे मानी जाती है। जब कभी भी कोई ज्ञान मिल रहा हो उसे बिना हिचकिचे ग्रहण करना चाहिए। जैसे हीरा भले ही कोयले की खान से पाई जाती है। फिर भी लोग उसे अति मूल्यवान समझकर ग्रहण तो करते ही हैं। उसी  प्रकार ज्ञान का महत्व होता है। कमल भी कीचड़ मे खिलता है । अतः कमल की सुंदरता से लोग मोहित रेहते हैं । पर उसका उद्गम स्थली का इतना महत्व नहीं होता। सर्वथा सर्व अवस्थाओं मे ज्ञान को ग्रहण करनी चाहिए। अगर सत्रु से भी ज्ञान की प्राप्ति हो रही हो तो बिना संकोच के उस वो ज्ञान भी सीखना चाहिए। ज्ञान प्रकाश स्वरूप है और थोड़ा स भी प्रकाश अंधेरे को दूर करने में सक्षम होता है।हरी ओम, हरी ओम हरी ओम ।

रविवार, 1 अक्टूबर 2017

किसी समस्या या रोग का समाधान कैसे करें?

जो मनुष्य इस मत्य लोक मे जन्म लेता है । उसे किसी ना किसी प्रकार की विपति, रोग, समस्या य संसय आना स्वभाविक है। पर इन सब से छुटकारा पाना बुद्धि मान मनुष्य के लिए बहुत सरल होता है। नीति शास्त्रो और चिकित्सा शास्त्रो मे कहा गया है की जहां जिस तरहा की समस्याएं, रोग, सोक और दुःख आते हैं। वहीं इसका इलाज़ और निराकरण पाया जा सकता है।
सांप का जहर ही सांप के जहर का निराकरण करती है और दूसरी चीज़ जंहा सांप रहता है। वहीं उसी इलाके के वृक्ष और जड़ी बुट्टी उस जहर का भी इलाज़ कर सकते है।
गर्मी के मौसम में होने वाली विमारीयों का इलाज़ गर्मी के मौसम में होने वाले फलों में होता है। सर्दी में होने वाले फल सर्दी के मौसम के रोगों का औसध होता है।
मधमखि दंश का इलाज़ मध से ही हो सकता है। नीति शाश्त्र केहत है। प्रकृति अगर हमे किसी प्रकार की विपति या रोग देती है तो साथ ही वो हमे इसका निराकरण और औसध भी प्रदान करती है।
जिस तरह प्रकृति रेगिस्तान के जीवों में पानी सरक्षण के  गुण विकसित करवा लेती है। उसी प्रकर सभी दुःख और विमरीयों का इलाज़ भी विकसित कर लेती हैं।

शनिवार, 20 मई 2017

मध्यम मार्ग क्या है और मध्यम मार्ग का ही अनुशरण क्यों करना चाहिए

जो मनुष्य किसी भी क्षेत्र मे सफल होना चाहते है तो उसे मध्यम मार्ग का अवश्य ही अनुशरण करना चाहिए।
तो हमे यह जानना जरूरी है की क्या है ये माध्यम मार्ग। मध्यम मार्ग का अर्थ है किसी भी चीज़ का ना बहुत ज्यादा करना है और ना ही बहुत कम करना है। मध्यम ही करना है।
मध्यम मार्ग सर्व प्रथम भगवान कृष्ण के द्वार श्रीमद् भागवत गीता में अर्जुन को बताया गया। जिसमें कृष्ण अर्जुन से कहते है। है अर्जुन तो योगी बन, और तु योगआरूढ़ हो। योग उसीका सिद्ध होता है जो माध्यम मार्ग को अपनाता है। अर्थात जो अधिक निद्रा लेता है और जो बिल्कुल निद्रा लेता ही नहीं। जो अधिक भोजन करता है और जो बिल्कुल भोजन नहीं करता। इन दोनों ही तरहा के लोगो का योग कदापि सिद्ध नहीं होते । योगी तो वही बनता है या योग सिद्ध वही बनता है जो पर्याप्त निद्रा लेता है ओर जो पर्याप्त भोजन करता है । ना आवश्यकता से अधिक और नही आवश्यकता से कम। इसे ही मध्यम मार्ग कहते है।
भगवान बुद्ध को भी माध्यम मार्ग के कारण ही महाज्ञान की प्राप्ति हुई थी। एक समय बुद्ध की जीवन में ऐसा आया की बुद्ध भोजन ओर निद्रा का पूरी तरह त्याग कर दिए थे। इस कारण उनका सरीर क्षिण होने लगा और बुद्ध का ज्ञान का प्यास पूरा नहीं हो पाया। उन्हें इसका आभास तब हुआ जब वो वीणा बजा रहे थे। जब वो वीणा का तार भीड़ रहे थे तब वीणा का तार बहुत तन जाता जिसे तार जल्दी है टूट जाती थी और जब तार को थोड़ा ढ़िल देकर बांधा जाता तो उस वीणा का वादन सही से नही होता था। कुछ प्रयत्न के पश्चात तार सही से बंध गयी। जो ना ही बहुत ही ज्यादा भीड्डा गया था और नही बहुत ही ढ़िल दि गयी थी। उस वीणा से मधुर स्वर निकल रहे थे और नही तार जल्दी टूट रही थी। इस तरह बुद्ध को ज्ञान हुआ की साधना मार्ग की सफलता माध्यम मार्ग के अनुशरण से ही है।
तो मनुष्य को अगर किसी भी क्षेत्र मे सफल होना चाहता है तो अवश्य ही उसे माध्यम मार्ग का अनुशरण करना चाहिए।
एक और कहानी से भी मध्यम मार्ग की सिख मिलती है। जिस मे दो लकड हरा रहते है । वो दोनो मित्र साथ रहते है और साथ ही जंगल मे लकडिया काटते हैं। एक लकड़हारा सुबह से साम तक बिना रुके लकड़ी काटता है और दूसरा लकड़हारा एक वृक्ष काटने के बाद विश्राम करता है। साथ ही साथ अपनी कुल्हाड़ी की धार को भी तेज़ करता था। अंत मे देखने पर ये पता चलता है की दूसरे लकड़हरा ने पहले वाले से ज्यादा लकड़ी काटि है। जब हम किसी काम को लगातार करते हैं। उसे करते करते शरीर थक जाता है। जिसे कार्य करने की क्षमता पर पडता है। अतः किसी भी कार्य को करने में माध्यम मार्ग का अनुशरण ही उचित है।

शनिवार, 13 मई 2017

मनुष्य को कभी भी अत्यधिक कठोर क्यों नहीं होना चाहिए ?

Pनीति शास्त्र के नियमों के अनुसार जो अत्यधिक कठोर होता है । उसे एक दिन जरूर टूटना पड़ता है और उसकी आयु भी बहुत कम होती है। ये भी प्रकृति का एक तरह का नियम है। जीभ प्रत्येक मनुष्यों में जन्म से होता है और दांत उसके बाद आता है। पर जीभ मनुष्य के मृत्यु तक उसके साथ रहता है और दांत कुछ समय के पश्चात झड़ जाते है। अतः मनुष्य को कभी भी अधिक कठोर नहीं बनना चाहिए।
दांत का टूटने का कारण उसके कठोर स्वभाव है और जीभ की आयु अधिक होने की कारण उसका लचीला स्वभाव है। मनुष्य को सदेब जगह, माहोल और आसपास के लोगो के अनुशार अपने स्वभाव मे लचीलापन लाना चाहिए। वैज्ञानिक सिद्धान्त के अनुशार वही जिव इस पृथ्वी पर जीवित रेह पाये जो पर्यावरण के साथ लचीला बन पाये अर्थात परिवर्तित हो पाये। बकि के जिब विलुप्त हो गए जो पर्यावरण के साथ बदल ना सके।
जीवन के नियम भी कुछ इसी प्रकार के हैं । समुद्र में जब कोई तैराकी तैरता है । वो समुद्र के लहरो के साथ तैरता है तो वो जीवत बचता है और अगर लहरो के विपरीत दिशा में अगर तैहरता है तो अवश्य ही उसे मृत्यु का सामना करना पड़ेगा। नाविक हमेसा लहरो की दिशा मे ही नाव को चलाता है अन्यथा वो अपने लक्ष्य तक कभी नहीं पहुंच सकता।
एक उदाहरण ओर भी है। जल का स्वभाव भी लचीला होता है । इस कारण वो किसी भी मार्ग से बहने का रास्ता ढूंढने में सफल हो जाता है।
पानी जब लचीला होता है उसे काटा या तोड़ा नहीं जा सकता । पर वही पानी जब कठोर और ठोश बन जाता है। तब उसे तोड़ना या काटना बहुत ही सरल बन जाता है। अतः मनुष्य को सदैब सरल और लचीला होना चाहिए।
हरी औम

शुक्रवार, 12 मई 2017

मनुष्य को कभी भी अति सरल क्यों नहीं होनी चाहिए ?

चाणक्य का एक सुंदर कहावत सुनने या जानने में मिलता है । जिसमें चाणक्य केहता है की सीधा वृक्ष को लकड़हारा जल्दी काटने को चाहता है और टेढ़े मेढ़े वृक्ष को वो ऐसे ही छोड़ देता है ये सोच कर की वो उसे बाद मे काटेगा और सोच समझकर काटेगा। मनुष्य के इस समाज में भी कुछ ऐसे ही नियम लागू होते है। कोई भी मनुष्य किसी भी सक्त और कटु वाक्य बोलने वाले व्यक्ति से कभी भी नहीं उलझता है क्यों की उसे किसी तरह अपने बातो में फ़साना और उसे धोका देना कभी सरल नहीं होगा। उसे कुछ बोलने के बदले स्वयं की भी कुछ हानि हो सकती है। सादे और सरल स्वभाव के व्यक्ति को अपने बातो मे फ़साना और उसे किसी प्रकार धोका देना अत्यंत सरल होता है।
ये नियम सिर्फ मनुष्य समाज मे ही लागू होता है ऐसा नहीं है। ये तो प्रकृति का नियम है। आप निश्चित ही जानते होंगे की कांटो से भरा फूल को तोड़ना सरल नहीं है और उसे कोई तोड़ना चाहता भी नहीं क्योंकि कोई कांटो से उलझना चाहता ही नहीं।
दूसरा भी एक इस नियम का प्रमाण है की कोई भी व्यक्ति विषधर और हींशक जीवों से स्वयं को दूर ही रखता है और सरल स्वभाव के जीवों को मारकर खाता है। बलि हमेशा बकरे या भेड़ो की ही चढ़ति है नाकि शेर, वाघ या चीताह की।
भले ही मनुष्य कितना भी बुद्धिमान हो पर वो किसिना किसी बात पर दुशरे मनुष्य से लड़ता जरूर है। ये साबित करता है की मनुष्य भी एक तरह का पशु ही है। कभी भी किसी भी समय शत्रु बना लेता है ।अपने शत्रु को परास्त करने के लिए उसे हमेशा सतर्क रहना चाहिए। अपने सरलता का हमेशा प्रदर्शन नहीं करना चाहिए। शदैब वार्तालाप मे गंभीर भाव लान अति आवश्यक होता है।
धन्यवाद